एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

ईरान : अमेरिका का दांव उलटा पडऩे के आसार

पश्चिम एशिया का संकट और भी गहराता जा रहा है। ईरान तो खैर सीधे मुकाबले में खड़ा हुआ है लेकिन अब ईराक ने भी अमेरिका को आँखें दिखानी शुरू कर दीं। उसकी संसद ने प्रस्ताव पारित करते हुए अपने देश में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को देश छोडऩे का आदेश दे दिया। उल्लेखनीय है अमेरिका द्वारा ईरान के फौजी जनरल सुलेमानी की ह्त्या ईराक के बग़दाद हवाई अड्डे पर ही ड्रोन से हवाई हमला कर की गई थी। कुछ दशक पूर्व ईराक और ईरान के बीच बहुत लम्बी जंग चली थी जिसमें लाखों लोग मारे गये। लेकिन मौजूदा हालात में दोनों पड़ोसी देश अमेरिका के विरुद्ध एकजुट हो रहे हैं जो इस अंचल में आया बड़ा बदलाव है। जैसी जानकारी मिली है.
 उसके मुताबिक सऊदी अरब, कुवैत, कतर, ईराक, बहरीन जैसे अनेक खाड़ी देशों में अमेरिका के सैनिक और अस्त्र-शस्त्र मौजूद हैं। वैसे तो दूसरे महायुद्ध के बाद शीतयुद्ध के मद्देनजर अमेरिका ने एक तरह से पूरी दुनिया में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाई है। उसके समुद्री बेड़े जगह-जगह तैनात हैं। कई देशों में तो उसके स्थायी सैन्य अड्डे हैं। हालांकि पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और इजरायल ही उसके परम समर्थक रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे कुछ और देश भी उसकी शरण में आते गए। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अमेरिका ने अपनी कूटनीति, सैन्य बल और आर्थिक सम्पन्नता से इस्लामिक देशों के बीच भी फूट डालने में कामयाबी हासिल कर ली।
 
बीती सदी के अंत में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर बलात कब्जा किया तब अमेरिका को इस्लामिक देशों के बीच बतौर संरक्षक बनकर घुसने का अच्छा अवसर मिल गया। स्मरणीय है सद्दाम ने इस्लाम को मानने के बावजूद ईराक को आधुनिक बनाने में काफी योगदान दिया था। जबकि शाह पहलवी के रहते आधुनिकता की राह पर चलने वाला ईरान अयातुल्ला खोमैनी का राज आते ही कट्टरवादी इस्लामिक देश बन बैठा। अमेरिका ने समय रहते अरब जगत में आ रहे वैचारिक बदलाव का फायदा उठाया और छोटे-छोटे अनेक अरबी देशों को कट्टरपंथी पड़ोसियों का भय दिखाकर वहां अपनी सैन्य टुकडिय़ां तैनात कर दीं। जिन अरबी मुल्कों में अभी भी पुराना शाही शासन चला आ रहा है.
 उन्हें भी इस्लामिक आतंकवाद के नाम पर आ रहे बवंडर में अपनी सत्ता खतरे में नजर आई और वे अमेरिका की छतरी के नीचे आ गए। लेकिन ईरान पर उसका जादू नहीं चल पाया और उसने अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखते हुए अमेरिका के झंडे तले आने से इंकार कर दिया। दरअसल 1979 में जब खोमैनी ने शाह पहलवी की सत्ता लटकर घड़ी की सुइयां उल्टी घुमाते हुए ईरान को कट्टरवादी इस्लामिक देश बना दिया तभी से अमेरिका की नजर में वह खटक रहा था। लेकिन उसे खाड़ी में घुसने का मौका और बहाना नहीं मिल रहा था। कुवैत पर सद्दाम के हमले ने अमेरिका को वहां जमने का रास्ता दे दिया।
 उसी के बाद से राजशाही से संचालित अनेक अरबी देश वाशिंगटन को अपना रहनुमा मानकर शरणागत हो गये। ये कहना भी प्रासंगिक होगा कि फिलीस्तीन की आजादी के लिए लडऩे वाले यासर अराफात की मौत के बाद तो अरब जगत में अमेरिका से ऊंची आवाज में बात करने वाला कोई व्यक्तित्व बचा ही नहीं। एक दौर था जब सोवियत संघ अमेरिका को पश्चिम एशिया में शह दिया करता था लेकिन उसके विघटन के बाद रूस में वह दमखम नहीं बचा। यद्यपि ब्लादिमीर पुतिन के सत्ता में आने के बाद उसने एक बार फिर अमेरिका को चुनौती देने का साहस दिखाया जिसका प्रमाण सीरिया को दिया गया उसका संरक्षण है किन्तु उसका प्रभावक्षेत्र अमेरिका जैसा व्यापक नहीं हो सका। मौजूदा संकट के पीछे अमेरिका की सोच काफी दूरगामी है।