उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवायें बीमार-बदहाल हैं, डाक्टर पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं हैं, सरकारी अस्पताल दम तोड़ रहे हैं, जच्चा-बच्चा को लेकर भी सरकार संजीदा नहीं है, प्राइवेट अस्पताल मरीजों की जेब काट रहे हैं । यह सब खबरें इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि सरकार अब इन खबरों से परेशान भी नहीं होती । सच तो यह है कि आम आदमी भी यह पढ़-सुन कर पक चुका है । मालूम है कि व्यवस्थाएं बनने के बजाय दिनोंदिन गर्त की ओर जा रही हैं, लेकिन हालात के आगे वह घुटने टेकने को मजबूर है । तकलीफ तो अब यह है कि सरकार भरोसे के साथ खिलवाड़ पर उतर आयी है, उसे किसी की कोई परवाह नहीं । बिगड़ती स्वास्थ्य सेवाओं के मर्ज की दवा सरकार प्राइवेट पार्टनरों में ढूंढ रही है । डाक्टर पक्ष में नहीं हैं, आम जनता विरोध में है, पुराने अनुभव इसकी इजाजत देने को तैयार नहीं हैं, फिर भी सरकार सरकारी अस्पतालों को पीपीपी के तहत निजी हाथों में सौंपने पर आमादा है ।
प्रदेश में जो सरकारी अस्पताल चालू हालत में सुगम स्थानों पर हैं, एक के बाद एक उन्हें निजी हाथों में सौंपा जा रहा है । तमाम विरोध के बावजूद रामनगर, टिहरी, पौड़ी और अल्मोड़ा के जिला अस्पतालों को निजी हाथों को सौंपा जाना तकरीबन तय है। इसके साथ ही कई सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी निगाहें हैं । आश्चर्यजनक यह है कि यह सब सुगम स्थानों के अस्पताल हैं, जिनमें करोड़ों रुपये के उपकरणों के साथ ही अच्छी खासी संख्या में चिकित्सक भी तैनात हैं ।
जिन अस्पतालों में संसाधनों के साथ चिकत्सक भी उपलब्ध हैं, उन अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपा जाना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है । दरअसल सरकारी अस्पतालों को पीपीपी पर दिये जाने का खेल वर्ल्ड बैंक के उस प्रोजेक्ट के तहत खेला जा रहा है, जिसके तहत दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त किया जाना है ।
सरकार की मंशा साफ होती तो पीपीपी का यह फार्मूला सरकार वहां लगाती, जहां डाक्टर और अन्य जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। जाहिर है कि वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट की आड़ में सरकार निजी अस्पतालों को फायदा पहुंचाने की फिराक में है । जबकि सरकार के इस फैसले से प्रदेश को दोहरा नुकसान होने जा रहा है । एक तो वर्ल्ड बैंक के पैसे का दुरूपयोग और दूसरा प्रदेश के अपने संसाधनों का नुकसान । मसला गंभीर है ,सरकार न अतीत से सबक लेना चाहती है और न उसे भविष्य का ही खौफ है ।
याद कीजिये तकरीबन साल भर पहले मौजूदा सरकार ने राजधानी के डोईवाला अस्पताल को निजी हाथों में दिया था। बड़े-बड़े वायदे किये गए उस वक्त, लेकिन आज जाकर देखिये वहां क्या स्थिति है ? कभी जिस अस्पताल में आपरेशन तक की सुविधा थी आज वहां सामान्य इलाज की सुविधा भी नहीं है । पिछली सरकारों के कार्यकाल में राज्य भर में जिन 12 अस्पतालों को पीपीपी मोड पर दिया गया, वहां के हालात से सरकार पूरी तरह वाकिफ है । प्रदेश को उसमें नुकसान ही उठाना पड़ा, इसके बाद भी सरकारी अस्पतालों को पीपीपी पर देने का मोह सरकार नहीं छोड़ पा रही है । आज उत्तराखंड में छोटे-बड़े प्राइवेट अस्पतालों की संख्या 600 से ऊपर पहुंच चुकी है। सैकड़ों करोड़ रुपये का कारोबार कर रहे ये अस्पताल आम लोगों के लिए भरोसे का प्रतीक नहीं मजबूरी जरूर बने हुए हैं । इसमें कोई शक नहीं कि सरकारी अस्पतालों की बदहाली की कीमत पर निजी अस्पतालों की दुकानें फलफूल रही हैं । यकीन नहीं होता तो दून मेडिकल कालेज के बाहर खड़े होकर देखिये तमाशा, कैसे इन अस्पतालों के बिचौलिये यहां मरीज और उनके तिमारदारों पर झपटते हैं । विडम्बना देखिये, कभी सस्ते और भरोसेमंद इलाज के लिए विख्यात रहे दून अस्पताल, दून महिला अस्पताल, श्रीनगर बेस अस्पताल आज खत्म हो चुके हैं । सरकारी मेडिकल कालेज के नाम पर इन चलते हुए अस्पतालों की बलि दी गयी । इन मेडिकल कालेजों के भी क्या हाल हैं यह किसी से छिपे नहीं हैं ।
एक वक्त था जब सरकारी अस्पताल भरोसे के प्रतीक थे, सरकारी अस्पताल के डाक्टर की अहमियत प्राइवेट डाक्टर से कई गुना ज्यादा थी । राज्य बनने के कुछ समय बाद तक आलम यह था कि वीआईपी मरीज भी सिर्फ सरकारी अस्पताल पर ही भरोसा करते थे । आज हालात विपरीत हैं सरकारी सिस्टम मजबूत होने के बजाय धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है और प्राइवेट अस्पतालों की चमक दिनोंदिन बढ़ रही है । हाल यह है कि हर साल औसतन राज्य के तीन लाख से अधिक लोग इलाज के फेर में लाखों के कर्जदार हो रहे हैं । इस पर भी भरोसेमंद इलाज की कोई गारंटी नहीं । क्या गुजरती होगी ऐसे में, यह सरकार नहीं एक आम मरीज और तिमारदार ही इस दर्द को ज्यादा बेहतर समझ सकता है । सरकारी आंकड़े स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के खुद गवाह बने हुए हैं ।
केंद्रीय नीति आयोग ने अभी कुछ माह पहले 21 राज्यों का स्वास्थ्य सूचकांक जारी किया, जिसमें एकमात्र उत्तराखंड ऐसा है जिसका प्रदर्शन बेहतर होने के बजाय और बदतर होता जा रहा है । उत्तराखंड इस सूचकांक में 15वें स्थान पर हैं । उत्तर प्रदेश तक ने अपनी स्थिति में सुधार किया है । हमसे भी अधिक विषम भौगोलिक परिस्थतियों वाला हिमाचल प्रदेश तो स्वास्थ्य सेवाओं में उत्तराखंड से बहुत ऊपर पांचवे स्थान पर है। लेकिन अपने यहां सरकार को कोई फिक्र नहीं । अफसोस यह है कि सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से आम आदमी का सरकार पर से भरोसा उठ रहा है । मौजूदा सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति बेपरवाही अंदाजा तो इससे ही लगाया जा सकता है कि सरकार गठन के दिन से आज तक स्वास्थ्य महकमे के पास एक अलग से मंत्री तक नहीं है ।
सरकार के रवैये से साफ है कि सरकार को जनता की फिक्र नहीं है । न ही स्वास्थ्य सेवाओं को दुरूस्त करने की चिंता । सरकार को फिक्र है तो निजी अस्पतालों की, निजी मेडिकल कालेजों की और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कारोबारियों की । सरकारें ईमानदार होती, नीति नियंताओं की नीयत साफ होती, राजनेताओं में इच्छा शक्ति होती तो क्या डेढ़ दशक में सरकार एक स्वास्थ्य संस्थान तैयार नहीं कर पाती ? जिन अस्पतालों के लिए सरकार ने सरकारी अस्पतालों की बलि दी है, वहां हाल यह है कि राज्य के लोगों को सस्ता इलाज तो दूर एक रुपए का डिस्काउंट तक नहीं मिलता । राज्य के संसाधनों और सुविधाओं का भरपूर इस्तेमाल करने के बावजदू सरकार का इन अस्पतालों पर कोई नियंत्रण नहीं है। इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है कि राज्य में स्थित इन संस्थानों में केंद्र के कर्मचारियों और कार्पोरेट्स को तो सेवाओं में डिस्काउंट दिया जाता है लेकिन राज्य के लोगों से पूरा पैसा वसूला जाता है । राज्य की स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ देने में भी ये अस्पताल आनाकानी करते हैं ।
कुल मिलाकर निजी अस्पताल राज्य के सिस्टम पर हावी हैं । सरकार की यह हिम्मत नहीं कि उनसे कहे कि उन्हें अपने संसाधनों से राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाएं देनी होंगी । अफसर स्वास्थ्य सेवाएं सुधारने की चिंता इंग्लैण्ड दौरे में करते हैं, लेकिन कभी पहाड़ का रुख नहीं करते । राजधानी के अस्पताल में ही फर्श पर कभी बच्चा तो कभी जच्चा दम तोड़ देते हैं लेकिन सरकार और उसके अफसर दोनो ही नहीं पसीजते । एक के बाद एक हादसे होते हैं, दुर्घटनाएं होती है, अफसर जांच जरूर बैठाते हैं मगर हासिल कुछ नहीं होता । डेढ़ दशक से अभी तक अफसर यह पता नहीं लगा पाए हैं राज्य की सेहत के लिए जरूरी है क्या ? राज्य बनने के बाद से बढ़ती हुई बाल मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर से भी सरकारें चेत नहीं रही हैं । ऐसे में सवाल वाजिब है कि जब सब कुछ निजी हाथों में सौंपा जाना है तो फिर क्या काम है सरकार का, और क्या जरूरत है उसके भारी भरकम स्वास्थ्य महकमे की ?
- साभार योगेश भट्ट, पत्रकार ,निवासी देहरादून.