
देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्लूआईआई) द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन और पलायन के कारण पिछले एक दशक में पिथौरागढ़ जिले में 30 पारंपरिक फसलों की खेती को ख़त्म हो चुकी है.
यह अध्ययन ‘Conservation of indigenous crop varieties and vulnerability assessment of agro-ecosystem’ के विषय पर किया गया. इस अध्ययन के अनुसार जिले में पिछले एक दशक में कृषि योग्य भूमि उपयोग में 19% की कमी आई है. इसके अलावा 28 फसलों के उत्पादन वाला हिस्सा अब वीरान है. वहां कोई भी फसल का पिछले एक दशक में उत्पादन बंद हो चुका है. अध्ययन के अनुसार, जिले के 70% से अधिक किसानों ने बाजरा की खेती छोड़ दी, जिसे स्थानीय रूप से कोनी कहा जाता है. किसानों ने लगभग 27% अन्य पौष्टिक मोटे अनाजों की खेती करना बंद कर दिया है. यह अध्ययन 31 गांवों में किये गये सर्वे पर आधारित है.
जलवायु परिवर्तन के परिणाम जैसे मानसून में देरी, अनियमित वर्षा, मानसून में कमी, फसल उत्पादन में किसानों की हतोत्साहित कर रही है. इसके अलावा, वन्यजीवों द्वारा फसल को होने वाले नुकसान की बढ़ती घटनाओं के भी पिछले एक दशक में काफी मामलें आये है. वीरान होते जंगलों से वन्यजीव का ग्रामीणों के घरों व खेतों की तरफ आना आम बात हो गयी है. पारंपरिक फसलों की खेती छोड़ने के पीछे एक अन्य महत्वपूर्ण कारण खाद्य आदतों में परिवर्तन भी है.
संस्थान अब आसपास के जिलों में भी अध्ययन का विस्तार करने की योजना बना रहा है. 2016 में शुरू किया गया, पूरा शोध 201 9 में पूरा होगा .हालांकि, वैज्ञानिक अल्मोड़ा, चमोली और चंपावत जिलों में पैटर्न में बदलाव का अध्ययन करने के इच्छुक हैं,ताकि कृषि की जटिल समस्याओं का कोई सकारात्मक परिणाम निकाला जा सकें .
इस वर्ष के आरम्भ में किये गए ‘ग्राम्या फेज टू’ की मशीनरी का अनुभव व अध्ययन इस बात की तस्दीक करती है कि उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में जलवायु परिवर्तन के असर और उनका प्रभाव तेजी से फैल रहा है. इससे खेती और इससे जुड़े रोजगार पर काले और घने बादल मंडरा रहे हैं.
पहाड़ के सत्तर फीसदी किसान जलवायु परिवर्तन के कारण भयानक खतरे में हैं. बारिश होने की पद्धति में आए बदलाव से पहाड़ के किसान बरबाद हो रहे हैं. अगर विभिन्न एजेंसियों ने युद्धस्तर पर बहुत तीव्र गति और व्यवस्थित तरीके से काम नहीं किया तो हालात बेकाबू हो जाएंगे.
जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) मध्य हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी और वनस्पतियों के लिए खतरा साबित हो रहा है. क्लाइमेट चेंज से यहां ट्री लाइन (वह सीमा जिसके आगे अथवा ऊपर वृक्ष नहीं उगते) प्रभावित हुई है तो सदाबहार बांज के वनों में कार्बन अभिग्रहण क्षमता में कमी दर्ज की गई है,
इस प्रभाव की चपेट में राज्य वृक्ष बुरांश (रोडोडेंड्रोन) भी शामिल है. सूबे में इसकी सर्वाधिक विविधता है और यहां इसकी चार प्रजातियां हैं. इसके सुर्ख फूल बेहद आकर्षक दिखते हैं. फूलों के जूस को हृदय रोग के उपचार में सहायक माना जाता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि का असर इस पर दिख रहा है और यह वक्त से पहले खिल रहा है.
भूमि संरक्षण में अहम हिसालू प्रजाति पर भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है. इसके फल, जड़ व तने का इस्तेमाल औषधि के रूप में होता है. 2500 से 7000 फीट की ऊंचाई पर मिलने वाले हिसालू में पुष्पण व फलन चक्र में बदलाव देखा गया है.