एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

देशप्रेमी बनिए, राष्ट्रवादी नहीं



ये लेख उन नवजवानों के लिए है, जो राष्ट्रवाद की लहर में बह रहे हैं। अंध राष्ट्रीवादी होना चाहते हैं, इसके खिलाफ कुछ सुनने या पढ़ना नही चाहते।
आप राष्ट्रवादी बनिए, हाँ, बिलकुल बन जाइये। लेकिन एक बार इसकी परिभाषा समझ लीजिए। राष्ट्रवाद कभी भी देशप्रेम या देशभक्ति नही होती। राष्ट्रवाद (Nationalist) शब्द में भले ही राष्ट्र या Nation शब्द जुड़ा होता है, लेकिन इसका अर्थ सही मायनों में बड़ा विध्वंसक होता है। ऐसा भी नही है कि भारत में ही राष्ट्रवाद शब्द का जन्म हुवा हो। या इसकी लहर यहीं बह रही हो। इतिहास के निर्मम पन्नों को अगर पलटें तो मुख्य तौर पर जर्मनी का हिटलरवाद (Nazism) या इटली का मुसोलिनिवाद (Fascism) सामने आ जाता है। जिसमे जर्मनी के अति राष्ट्रवाद के कारण दुनिया विश्व युद्ध में गयी और अंत में जर्मनी के दो टुकड़े हो गए। इटली के राष्ट्रवाद का भी कुछ परिणाम ऐसा ही हुवा। वहाँ की जनता ने खुद ही मुसोलिनी को फांसी के फंदे पर चढ़ा लिया था।

इसी तरह, 1921 में ऑस्ट्रिया में हाइमरवाद, 1925 में हंगरी में हरी कुर्ती वाले जलासी और एरोक्रोसवाद, 1931 में स्पेन में जोन्सवाद, हॉलैंड में 1935 में मुसर्ट और बेल्जियम में फ्लेमिश नाजी पार्टी ने अपने अपने देशों में राष्ट्रवाद का सहारा लेकर सत्ता पर लोकतांत्रिक तरीकों से कब्जा किया। ये तो कुछ यूरोप के उद्धाहरण है, बाकी दुनिया के भी अपने अपने फासीवाद या राष्ट्रवादी दौर रहा है।

भारत भी फासीवादी आंदोलन और फासीवाद रुझानों से अलग नही रहा। वस्तुतः इटली में फासीवाद के सत्तारूढ़ होने के कुछ वर्ष बाद ही हमारे देश में यह आंदोलन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के रूप में शुरू किया गया। बाद में खाकसार, राजकार, आनंद मार्ग और जमाते इस्लामी इस आंदोलन के मैदान में आये। आखिर में पिछले कुछ दशक के अंदर खुद इंडियन नेशनल कांग्रेस ने फासीवाद के रास्ते पर तेज़ी के साथ चलना शुरू किया और देश के कुछ भागों में अर्ध फासीवादी राज्य स्थापित किये। कालांतर में भाजपा ने राष्ट्रवाद या फासीवाद का पूर्ण चेहरा लागू किया और सत्ता प्राप्त की।
 अब सवाल उठता है कि किस देश के लिए राष्ट्रवाद या फासिज्म क्यों खतरनाक होता है? लेकिन, उससे पहले ये जानना भी जरूरी है कि राष्ट्रवाद को जड़ जमाने में कौन से देश ज्यादा माकूल रहते है ? यूरोप में जिन देशों में राष्ट्रवाद आया था, मसलन जर्मनी, इटली, पोलैंड आदि में। वहां की उस समय की सामाजिक तानेबाने को अगर देखा जाए तो उससे कई प्रश्नों के जवाब मिल जाते हैं। फासीवादी दर्शन उन लोगों को जल्दी चपेट में लेता है, जो बेरोजगार, अशिछित, साक्षर होते है। ऐसे लोगों को मुगली घुट्टी पिलाई जाती है कि उनके तमाम दुःख दर्द की वजह देश की अल्प संख्यक जनता है। ऐसे लोगो के आँखों में फासीवाद का मजबूत चश्मा लगाया जाता है, जिसके बाद वो अपने देश के अल्पसंख्यक समुदायों को उसी नजर से देखतें हैं, जैसे कभी हिटलर के भक्तों ने यहूदियों को, सर्बिया में मुस्लिमो को और अमेरिका में निग्रोस को देखा जाता था।
असल में, राष्ट्रवाद महज नस्लवाद या धार्मिक उन्माद के जरिये जनता के जेहन में सफर करता है। इसका नशा इतना खतरनाक हो सकता है, की जनता बुनियादी मुद्दों को छोड़ युद्ध उन्माद, अल्प संख्यकों के साथ हिंसा, मारपीट पर उतर आती हैं। अंत में देश उस आगार पर खड़ा हो जाता है, जहाँ कभी जर्मनी विश्व युद्ध के बाद खड़ा हो गया था।

- मनमीत  (हिंदुस्तान अखबार, देहरादून )