एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

रोजगार: ग्रामीण भारत 'मनरेगा' के भरोसे



मोदी सरकार के पिछले साल के आंकड़े दिखाते हैं कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत नौकरियों की मांग में बढ़ोतरी हुई है.
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2018-19 में 2017-18 की तुलना में काम की मांग में 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इसके साथ ही साल 2018-19 में साल 2010-11 के बाद से इस योजना के तहत व्यक्ति कार्य दिवस की सबसे अधिक संख्या दर्ज की गई.
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मौजूदा वित्त वर्ष (25 मार्च तक) में मनरेगा के तहत 255 करोड़ व्यक्ति कार्य दिवस पैदा किया गया जिसके और भी बढ़ने की संभावना है. आंकड़े दिखाते हैं कि इस योजना के तहत 2017-18 में 233 करोड़ व्यक्ति कार्य दिवस पैदा हुआ था जबकि 2016-17 और 2015-16 में 235 करोड़ व्यक्ति कार्य दिवस पैदा हुआ.
मौजूदा मोदी सरकार के कार्यकाल के पहले साल 2014-15 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मनरेगा को यह कहते हुए खारिज़ कर दिया था कि वह यूपीए सरकार की विफलता का जीता-जागता सबूत है. उस साल मात्र 166 करोड़ व्यक्ति कार्य दिवस पैदा हुआ था.
इस योजना के तहत सामान्य तौर पर एक व्यक्ति कार्य दिवस की इकाई का मतलब आठ घंटे का काम होता है.योजना को लागू करने वाले सरकारी अधिकारी मनरेगा के तहत व्यक्ति कार्य दिवस बढ़ने का कारण सूखा या बाढ़ जैसे जलवायु परिवर्तन से संबंधित घटनाओं को बताते हैं जो खेती से होने वाली आय में नुकसान का मुख्य कारण बनते हैं. वहीं योजना की जमीनी स्थिति पर निगरानी रखने वाले बताते हैं कि यह वृद्धि मनरेगा का काम बेरोजगारी की समग्र स्थिति को भी दर्शाता है.
बता दें कि मनरेगा एक मांग आधारित सामाजिक सुरक्षा योजना है जो कि प्रति ग्रामीण घर को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराता है. वहीं सूखा, बाढ़ या अन्य समान आपदाओं के मामले में कार्य दिवस की संख्या को बढ़ाकर सालाना 150 दिन किया जा सकता है.
मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) के निखिल डे ने कहा कि बेरोजगारी और सूखे के हालात में लोग कोई भी रोजगार अपनाने को तैयार हो जाएंगे.
उन्होंने कहा, बेरोजगारी के कारण मनरेगा के काम की भारी मांग है, लेकिन वित्त मंत्रालय द्वारा इस योजना के लिए अपर्याप्त धन आवंटित किए जाने के कारण अक्सर सही मात्रा में काम उपलब्ध नहीं कराया जा पाता है. व्यक्ति कार्य दिवस में यह वृद्धि दर्शाती है कि आखिरकार सरकार ने इस मांग को समझा है.
मनरेगा के तहत जहां सामान्य तौर पर 100 दिन के काम की व्यवस्था है तो वहीं सूखे के हालात में 150 दिन की लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि 2018-19 में प्रत्येक परिवार को सालाना औसतन 49 दिन का ही रोजगार मिल सका जो कि पिछले सालों की तुलना में अधिक है. इससे पहले मनरेगा के तहत उपलब्ध कराए जाने वाले काम की संख्या में बढ़ोतरी 2009-10 में यूपीए-दो के कार्यकाल में हुई थी.
2009-10 में भयंकर सूखे के हालात में मनरेगा के तहत 283 करोड़ व्यक्ति कार्य दिवस पैदा किया गया था.
- साभार  वायर.कॉम