जीरो टोलरेंस की सरकार चाहे हज़ार दावे कर ले.माफियाओं के आगे दंडवत झुकी हुई है.खनन माफियाओं का ऐसा प्रभाव है कि जिलाधिकारी तक को बदल दिया गया.लूट की इस छूट में सरकार की मंशा भी किसी से छिपी नहीं है.
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से ही राज्य का सीना चीरने की कवायद जारी है.जो वक्त के साथ तेजी से आगे बढ़ रही है.बागेश्वर जनपद के 'कपकोट विकासखंड बटालगाव सौरली'में माफियाओं को किसी का भय नहीं है.बगैर अनुमति के हरे पेड़ों को गिराया जा रहा है.यहाँ तक की कृषि भूमि का दोहन भी हो रहा है.स्थानीय जनता का कहना है कि लम्बे वक्त से कानूनी लड़ाई लड़ रहें है लेकिन माफियाओं के हाथ कानून को भी अपने कब्जे में किये हुए है.स्थानीय जनता निराश है.
स्थानीय लोगों ने बताया कि रात के अँधेरे में बांज के पेड़ों को गिराया जा रहा है.उजाले से पहले ही मिट्टी से ढकने के लिए पूरा माफिया गिरोह सक्रीय है. स्थानीय 'गोस्वामी परिवार' के लोगों का कहना है कि उनके घरों की नीचे गड्डे बन गये है. साथ ही उनके आस-पड़ोस के परिवेश का काफी नुकसान हुआ है. बरसात में भयंकर तबाही से आम जनता भयभीत है.
स्थानीय जनता के अनुसार इस मसले पर पूरा प्रशासन आँख बंद कर बैठा है.अभी तक किसी प्रकार की जांच और कारवाई तक नहीं की गई.पूरे देश भर में आम चुनावों का हल्ला है और ग्रामीण परिवेश में खनन माफियाओं का आतंक आम जनता के लिए दुश्वारियों को बढ़ा रहा है.गौरतलब है कि पूरे राज्य में आचार सहिंता भी लागू है लेकिन आम जनता को इन्साफ दूर की कौड़ी ही नजर आ रहा है.पूर्व में खनन माफियाओं पर कारवाई के चलते जिलाधिकारी बागेश्वर का स्थानातरण तक कर दिया गया.अब सवाल उठता है आम जनता की इन माफियाओं के आगे क्या बिसात है?
वहीँ बीते कई साल से खड़िया पर आधारित उद्योग लगाने के लिए सरकारें आश्वासन देती रही हैं लेकिन आज तक इस दिशा में ठोस प्रयास नहीं हो सके हैं.गौरतलब है कि बागेश्वर से प्रतिवर्ष हजारों टन खड़िया खोदकर मैदानी जिलों में पहुंचाई जाती है.जिले में खड़िया पर आधारित उद्योग लगते तो जिले से पलायन पर रोक लगाने में मदद मिल सकती थी. जिले से अधिकांश युवा रोजगार के लिए बाहरी जिलों में पलायन करते हैं.
वर्तमान खनन प्रक्रिया से सिर्फ मजदूर तबके को ही रोजगार मिल रहा है. शिक्षित व उच्च शिक्षित युवाओं को इससे खास लाभ नहीं हो रहा है खड़िया से सौंदर्य प्रसाधन सहित अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं. कार्यरत खदानों से ही सरकार को प्रतिवर्ष 10 करोड़ से अधिक का राजस्व मिलता है लेकिन स्थानीय जनता को सिर्फ तकलीफे?रोजगार के नाम पर आज भी सरकार के हाथ खाली है.पर्यावरण का दोहरा नुकसान स्थानीय लोगों को भुगतना पड़ रहा है.
सवाल फिर उठता है क्या ग्रामीण जनता सिर्फ कृषि भूमि के दोहन और बांज जैसे धरोहर वृक्षों को मिट्टी में दफ़न होते देखने मात्र के लिए है?कहाँ है रोजगार? कहाँ है खड़िया फैक्ट्री?कहाँ है स्थानीय युवाओं के लिए नीति और नियत?
- मयंक सिंह नेगी