चोर और चौकीदार की बात चुनाव के शोर तक ही सीमित रहती तो ठीक था । यूं तो इन दिनों बड़े बड़े ‘चोर’ भी‘चौकीदार’ होने का दावा कर रहे हैं, पता ही नहीं कि मालिक कौन है, कौन चोर और कौन चौकीदार? चोर चौकीदार का वायरल सरकार तक पहुंच चुका है । उत्तराखंड की भी पूरी सरकार का प्रोफाइल इन दिनों बदला नजर आ रहा है, मुख्यमंत्री से लेकर तमाम मंत्री और सत्ता पक्ष के विधायक ‘मैं भी हूं चौकीदार’ का तमगा लगाए घूम रहे हैं ।
ऐसा नहीं है कि प्रदेश में सबकुछ ठीक चल रहा है, भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस, धर्मयुद्ध और सुशासन के जो दावे किये जा रहे हैं वह सही हैं । माना लुटना उत्तराखंड की नीयति है, लेकिन बीते दो साल में जिस बड़े बड़े‘खेल’ बिना किसी हो-हल्ले के खेल लिए गए वह अपने आप में आश्चर्यजनक है ।
सच यह है कि जनता जिन्हें चुनकर भेजती है उनकी कोई हैसियत ही नहीं है । व्यवस्था चंद उन नौकरशाहों के हाथ में है जिन्हें इस प्रदेश का भूगोल तक सही से नहीं मालूम । बताइये कहां कहां खेल नहीं हुआ? जमीनों में खेल हुआ, शराब के कारोबार में खेल हुआ । भांग की खेती के नाम पर खेल हुआ तो इन्वेस्टर मीट के नाम पर भी छला गया । हाईकोर्ट के फैसलों पर भी खेल हुए तो खनन और सरकारी योजनाओं में बंदरबांट हुई । ‘
मुद्दे बेहिसाब हैं मगर फिलवक्त जिक्र उनका जो ‘चौकीदारी’ पर बड़ा सवाल हैं । जमीन के मुद्दे को लें, क्या कम बड़ा खेल था नगर निकायों की सीमा विस्तार के बहाने राज्य की हजारों हेक्टअर भूमि को भू कानून के दायरे से बाहर कर देना ? चौकीदार होने का दावा कर रही सरकार ने सुशासन का दावा करते हुए आते ही यह ‘खेल’ खेल डाला और कहीं ‘चूं’ तक नहीं हुई । चूं होतीभी कैसे मालिक, चोर, चौकीदार सभी के हित जो सध रहे थे,लेकिन सिलसिला यही नहीं रुका । कुछ समय बाद ‘चौकीदार’सरकार ने भू कानून में बदलाव कर सीलिंग की व्यवस्था को भी खत्म कर डाला ।
सवाल उठता है कि क्या जरूरत थी भू कानून में संशोधन करते हुए सीलिंग खत्म करने की ? क्या यह फैसले प्रदेश या प्रदेश की जनता के हित में थे? नहीं, सरकार के इन दो फैसलों से फायदा जनता या प्रदेश को नहीं बल्कि जमीनों के सौंदागरों और उन नौकरशाहों और सफेदपोशों को हुआ, जिन्हें राज्य में बड़े पैमाने पर जमीनों की खरीद फरोख्त करनी है.
उत्तराखंड में जमीन की लूट को चौकीदार सरकार ने बढ़ावा देने का काम किया । भू कानून में ऐसे मनमाने संशोधन कर दिए मानो यह राज्य उनकी बपौती हो । कहां तो राज्य में मांग उठ रही थी कि जमीनों का नए सिरे से बंदोबस्त करो, चकबंदी शुरू कराओ, पहाड़ हो या मैदान खेती की जमीनों को बचाओ, मैदान में कृषि और पहाड़ में बागवानी को बढ़ावा दो , लेकिन सरकार तो कुछ और ही ठाने हुए थी ।
बहुत संभव है कि राज्य के भू कानून के साथ यह खिलवाड़ दिल्ली में बैठे बड़े 'चौकीदारों' के इशारे पर हुआ हो । क्योंकि जमीनों पर सरकार की मनमानी झेलने वाला राज्य उत्तराखंड अकेला नहीं था, भाजपा शासित दूसरे राज्यों से भी इस तरह की खबरें आ रही हैं । पड़ोसी हरियाणा का तो उदाहरण सामने है ।
जिस दौरान उत्तराखंड में भू कानून में संशोधन किया गया, लगभग उसी दौरान हरियाणा विधानसभा में अरावली के एक बड़े क्षेत्र में निर्माण की इजाजत के लिए कानून बदल दिया गया । भाजपा शासित हरियाणा में सरकार ने अरावली क्षेत्र में 60 हजार एकड़ वन क्षेत्र में निर्माण को इजाजत देने वाला कानून पास कराया । कहा जा रहा है कि सरकार ने यह फैसला बिल्डरों और जमीन के सौंदागरों के लिए लिया था । लेकिन हरियााणा सौभाग्यशाली रहा, उच्चतम न्यायालय हरियाणा की खट्टर सरकार के मंसूबों को भांप गया । इस फैसले से होने वाले नुकसान के प्रति उच्चतम न्यायालय ने संवेदनशीलता दिखायी और सरकार के मंसूबों को पूरा नहीं होने दिया।
उच्चतम न्यायालय ने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए इस फैसले के अमल पर रोक लगायी हुई है । अपना उत्तराखंड इतना भाग्यशाली नहीं था, वहां सरकार अपने मंसूबों में आसानी से कामयाब हो गयी । विपक्ष ने सिर्फ रस्मअदायगी सरीखा विरोध किया तो जनता भी बेसुध, बेखबर रही । बताइये विपक्ष ईमानदार होता तो जमीन के मुद्दे पर ही 'चौकीदार सरकार' को बेनकाब नहीं करता ? कम से कम चुनाव में तो यह मुद्दा बनता ।
सवाल यही है कि मुद्दा बनता कैसे, जमीन की लूट राज्य में नयी नहीं है । सत्ता में आने वाले सब इस लूट में बराबर के भागीदार हैं । तभी 9 नवंबर 2000 से शुरू हुई जमीनों की लूट 18 साल बाद भी जारी है । राज्य बनने के बाद लगभग एक लाख हेक्टेअर कृषि भूमि खत्म हो चुकी है । हर साल औसतन पांच हजार हेक्टेअर कृषि भूमि खत्म हो रही है, पहाड़ में खेती की भूमि नहीं के बराबर रह गयी है ।
बगल में हिमाचल है, बहुत कुछ उत्तराखंड जैसा है लेकिनद उससे सीख नहीं लेते । वहां कृषि और बागवानी उत्पादन बढ़ रहा है और हमारा लगातार घट रहा है । कारण सभी को मालूम है वहां एक मजबूत भू कानून है जो कृषि बागवानी के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन हमारे यहां भूमि सुधार कानून की बात सरकारें कभी नहीं करती । बहरहाल सरकार 'चौकदार' कतई नहीं क्योंकि जमीन की लूट में वह 'भागीदार' है ।
चलिये, जमीन के बाद अब बात शराब के कारोबार की। उत्तराखंड में आबकारी हर सरकार का पसंदीदा विषय रहा है , इसलिए इसमें खेल कोई नयी बात नहीं । अब तो शराब के कारोबार से सरकार की राजस्व कमाई का लक्ष्य ही तीन हजार करोड़ से ऊपर का है । हर साल सरकार नये सिरे से नीति तैयार करती है, लेकिन 'चौकीदार सरकार' ने उम्मीद से हटकर खेल खेला । पिछली सरकारें विरोध या बदनामी के डर से जिसकी हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं, वह फैसला 'चौकीदार सरकार' ने जीरो टालरेंस जीरो टालरेंस जपते जपते ले लिया । सरकार ने आते ही चुपके से शराब के कारोबार में लाटरी व्यवस्था खत्म कर नीलामी शुरू करा दी । जनता का इससे सीधे कोई लेना देना नहीं था और विपक्ष खामोश रहा इसलिए सरकार को कोई दिक्कत भी नहीं हुई ।
दिक्कत इस फैसले से अब होनी शुरू होगी, जो छोटे लेाकल कारोबारी पिछले डेढ़ दशक में पनपे हैं उनका बुरा दौर शुरू हो चला है । उनकी बर्बादी की बुनियाद पर ही आने वाले सालों में इस फैसले के चलते किसी सिंडिकेट या माफिया का एकाधिकार होगा । बताते चलें कि उत्तर प्रदेश के साथ रहते हुए दुकानों का आवंटन नीलामी के जरिये होता था, जिसमें पूरे कारोबार पर माफिया का एकाधिकार था। उत्तराखंड अलग राज्य बनने के बाद अंतरिम सरकार का सबसे पहला अहम फैसला शराब के कारोबार से सिंडेकट के एकाधिकार को खत्म करना था ।
स्वर्गवासी हो चुके तत्कालीन मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने शराब की दुकानों का आवंटन नीलामी के बजाय लाटरी के जरिये करने का फैसला लिया था। प्रदेश में दुकानों का आवंटन लाटरी से होने का बड़ा फायदा यह हुआ कि डेढ़ दशक में सिंडिकेट पूरी तरह से बाहर हो गया । माफिया की पकड़ भ्री कमजोर हो गयी और कारोबार स्थानीय छोटे छोटे कारोबारियों के हाथों में आ गया । विपक्ष की खामोशी तो बयां कर ही रही है कि वह सरकार के इस फैसले के साथ है, लेकिन सवाल 'चौकीदार सरकार' के फैसले है, आखिर 'चौकीदारी' किसके हितों की हो रही है ?