"...उत्तराखंड में ऐसे मंत्रियों की संख्या और भी बड़ी है. इनमें सतपाल महाराज, हरक सिंह रावत और यशपाल आर्य जैसे प्रमुख नेता शामिल हैं.दस की कैबिनेट में चार कांग्रेस के नेता शामिल है.देश की जनता के सम्मुख बड़ा सवाल है कि जिन कांग्रेस के नेताओं की आलोचना मोदी अपनी रैलियों में खुले तौर पर करते है सत्ता की भागीदारी में कांग्रेस के वहीं नेता कैसे 'जनवादी और सरोकारी' बन जाते है? पार्टी के ही उन जमीनी नेताओं तक क्या सन्देश जाता होगा जिन्होंने पार्टी के लिए दिन रात एक किये होंगे? आज सत्ता में तक़रीबन 25 प्रतिशत कांग्रेस के पुराने नेताओं की भागीदार क्या भाजपा के अन्य नेताओं को नहीं कचोटती होगी?"
मयंक सिंह नेगी
इस समय इन 12 राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं: अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, मणिपुर, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड. इन राज्यों के कुल 180 मंत्रियों में 53 ऐसे हैं जिन्होंने अपना राजनीतिक सफर अन्य दलों में शुरू किया था.असम में 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा ने पहली बार राज्य की सत्ता संभाली. पार्टी वहां एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही है. इसके 11 मंत्रियों – कैबिनेट और राज्यमंत्री – में से करीब 45 प्रतिशत कांग्रेस से आए नेता हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य में भाजपा ने कुछ समय से कांग्रेस के नेताओं को अपने पाले में लाने का काम तेज़ कर दिया है, खास कर लोकसभा चुनावों के कारण ऐसा देखा जा रहा है. राज्य में 24 मंत्रियों में से सात बाहरी नेता हैं.उत्तराखंड में ऐसे मंत्रियों की संख्या और भी बड़ी है. इनमें सतपाल महाराज, हरक सिंह रावत और यशपाल आर्य जैसे प्रमुख नेता शामिल हैं.दस की कैबिनेट में चार कांग्रेस के नेता शामिल है.
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा – प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र – ने उत्तराखंड में एक राजनीतिक बगावत की अगुआई की थी जो कि 2016 में राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के विभाजन का कारण बनी. इसके बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस में शीर्ष पर रही उनकी बहन रीता बहुगुणा ने भी भाजपा का रुख कर लिया. वह इस समय योगी आदित्यनाथ सरकार के गैर-भाजपाई पृष्ठभूमि वाले नौ कैबिनेट मंत्रियों में से एक हैं.
वहीँ त्रिपुरा में, सात कैबिनेट मंत्रियों में से चार – 55 फीसदी से भी ज़्यादा – ऐसे नेता हैं जो 2017 में कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए थे. ये मंत्री हैं: रतनलाल नाथ, सुदीप रॉय बर्मन, प्रणजीत सिंह रॉय और मनोज कांति देब है. इसके अलावा गोवा में, जहां भाजपा मनोहर पर्रिकर के देहांत के बाद अपने सरकार बचाने में कामयाब रही है, पार्टी के पांच में से दो कैबिनेट मंत्री विश्वजीत राणे और मौविन गोडिन्हो पूर्व में कांग्रेस में रह चुके हैं.
इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में 12 कैबिनेट मंत्रियों में से मात्र एक अनिल शर्मा ही गैर-भाजपाई पृष्ठभूमि के हैं. उन्होंने अक्टूबर 2017 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामना थामा था.वहीँ महाराष्ट्र एकमात्र ऐसा राज्य दिखता है जहां भाजपा के सारे मंत्रियों का अतीत पार्टी से ही जुड़ा रहा है. राज्य में पार्टी और शिवसेना का गठबंधन सत्ता में है.झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास की अगुवाई वाली सरकार के 10 भाजपाई मंत्रियों में दो दूसरी पार्टी से आए नेता हैं.ये दो राज्य सबसे कम दलबदलुओं वाले राज्य है.
जहाँ देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी 'कांग्रेस मुक्त' भारत की बात करते है वहीँ जमीनी तौर पर उनकी पार्टी इसके विपरीत 'कांग्रेस युक्त' होने की राह पर है.इस से कहीं न कहीं उनकी करनी और कथनी का फर्क भी सामने आ रहा है.देश की जनता के सम्मुख बड़ा सवाल है कि जिन कांग्रेस के नेताओं की आलोचना वह अपनी रैलियों में खुले तौर पर करते है सत्ता की भागीदारी में वह कैसे 'जनवादी और सरोकारी' बन जाते है? पार्टी के ही उन जमीनी नेताओं तक क्या सन्देश जाता होगा जिन्होंने पार्टी के लिए दिन रात एक किये होंगे? आज सत्ता में तक़रीबन 25 प्रतिशत कांग्रेस के पुराने नेताओं की भागीदार क्या भाजपा के अन्य नेताओं को नहीं कचोटती होगी?
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