
आज हम जिक्र करेंगे ‘चौकीदार सरकार’ की उस उपलब्धि का जिसका जिक्र न नेताओं के भाषणों में होता है और न सरकार के विज्ञापनों में । जी हां, बात राज्य में भांग की खेती को लीगल स्टेटस देने की ही हो रही है । उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन चुका है जहां भांग की खेती का लाइसेंस दिया गया है । आश्चर्य यह है कि ‘चौकीदार सरकार’ ने अपने इस फैसले को उपलब्धि के तौर कभी नहीं गिनाया । जबकि लाइसेंस जारी करते वक्त दावा यह किया गया कि इससे किसानों की आय दोगुनी होगी और एक लाख युवाओं को रोजगार मिलेगा । जब सरकार इसे अपनी उलब्धियों की फेहरिस्त में दर्ज करने बच रही है तो सवाल उठेगा ही, उठन भी चाहिए कि आखिर सरकार ने दूसरी योजनाओं और फैसलों की तरह इसके बड़े विज्ञापन क्यों जारी नहीं किये ? क्यों इस पर फिल्में तैयार नहीं हुईं ? क्या भांग की खेती का लाइसेंस दिये जाने के फैसले में कोई झोल है ? खैर जो भी हो, बात यहां भांग की खेती के लाइसेंस में ‘खेल’ या ‘झोल’ की नहीं बल्कि बात सरकार की संवेदनशीलता और दूरदर्शिता की है । भांग की लाख व्यवसायिक व औषधीय उपयोगिताएं हो लेकिन सच यह है कि उत्तराखंड में भांग ‘नशे’ का पर्याय है । सवाल भांग की खेती में उत्तराखंड का भविष्य तलाशने का नहीं, बल्कि भविष्य की चिंता का है । सरकार यह भूल रही है कि जिस पीढ़ी से उत्तराखंड का भविष्य जुड़ा हुआ है वह तो ड्रग्स के दलदल में धंसती चली जा रही है ।
मुद्दा यह है कि सरकार की बड़ी चिंता इस वक्त ‘उड़ता उत्तराखंड’ होना चाहिए था । पड़ोसी पंजाब को देखिए क्या हाल हैं वहां, ड्रग्स की समस्या विकराल रुप ले चुकी है । आज अगर पंजाब सरकार नशे के तश्करों को फांसी की सजा देने का प्रस्ताव केंद्र को भेज रही है तो हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है । वहां सरकारी कर्मचारियों के लिए डोप टेस्ट अनिवार्य किया गया है तो इसके मायने यह हैं कि ड्रग्स ने सिस्टम को तबाह कर दिया है। उत्तराखंड में हालात अभी पंजाब जितने खराब तो नहीं हैं लेकिन समस्या पंजाब से कम भी नहीं । जिस तेजी से ड्रग्स की खपत उत्तराखंड में बढ़ रही है और नशीले पदार्थों का अवैध कारोबार फैल रहा है, उसे देखते हुए लगता है पंजाब को पीछे छोड़ने में उत्तराखंड को ज्यादा वक्त नहीं लगेगा । मादक पदार्थों की तस्करी पर पुलिस का बढ़ता आंकड़ा और नशा मुक्ति केंद्रों की बढ़ती संख्या इसका प्रमाण है कि पिछले पांच साल में ही उत्तराखंड ड्रग्स की मंडी बन चुका है । अकेले राजधानी देहरादून में सौ से भी अधिक नशा मुक्त केंद्र चल रहे हैं। चिंताजनक यह है कि तेजी से बढ़ रही इस समस्या पर सरकार को जितना गंभीर होना चाहिए, सरकार उतनी गंभीर है नहीं । निसंदेह पुलिस ड्रग्स के खिलाफ कार्यवाही करती है, मगर वह कार्यवाही ड्रग्स पर अंकुश लगाने और अवैध करोबार के खात्मे के लिए प्रभावी नहीं है ।
साल दर साल मादक पदार्थों की जब्ती और ड्रग्स की तस्करी में गिरफ्तारी के आंकड़े बढ़ रहे हैं । कुछ साल पहले पूरे प्रदेश भर में बामुश्कित सालाना चार करोड़ के करीब के मादक पदार्थ पुलिस पकड़ती थी, अब सालाना बीस करोड़ से ऊपर के मादक पदार्थ तो राज्य की पुलिस जब्त कर रही है । सालभर में एक हजार से ज्यादा लोग पकड़े जा रहे हैं । आश्चर्य यह है कि पकउ जाने वाले या तो मादक पदार्थों को इधर से उधर ले जाने वाले या फिर इस्तेमाल करने वाले होते हैं । ऐसा नहीं है कि इस कारोबार के ‘बड़े मगरमच्छों ’ तक नहीं पहुंचा जा सकता। पुलिस जिन्हें साल भर गिरफ्तार करती है अगर उन्हीं से कड़ियां जोड़नी शुरू कर तो उन तक पहुंचा जा सकता है, लेकिन आज तक ड्रग्स का बड़ा तस्कर या सप्लायर आज तक हाथ नहीं लगा । प सच्चाई से पूरा सिस्टम वाकिफ है, राज्य का हर बड़ा शिक्षण संस्थान नशे के कारोबारियों की गिरफ्त में है । स्कूल, कालेज, यूनिवर्सिटी कैंपस और हास्टलों से लेकर होटल, ढाबे, रेस्टोरेंट, पब, मेडिकल स्टोर और पान के खोखे तक ड्रग्स के अड्डे बने हुए हैँ । आंकड़े बताते हैं कि औसतन हर तीसरा युवा ड्रग्स की जद में आ चुका है । सरकार भले ही गंभीर न हो, उच्च न्यायालय नैनीताल तक को इसकी खबर है । कुछ समस्या पहले उच्च न्यायालय नैनीताल ने सरकार को इस संबंध में निर्देश भी दिये । उच्च न्यायालय ने केंद्रीय ड्रग नियंत्रण संगठन द्वारा प्रतिबंधित 434 किस्म की दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया । सभी निजी और सरकारी संस्थानों में ‘ड्रग कंट्रोल क्लब’ और जिला अस्पतालों में ‘नशा मुक्ति सेल’ गठित करने को कहा । इतना ही नहीं नशीले पदार्थों की जांच के लिए स्पेशल टीम गठित करने और एंटी नारकोटिक स्क्वायड गठित करने को भी कहा ।

सरकार ने उच्च न्यायालय के निर्देशों पर कितना अमल किया यह कहा नहीं जा सकता, क्योंकि सरकार उच्च न्यायालय के फैसलों पर अपनी सहूलियत के मुताबिक अमल करती आयी है । लेकिन यह साफ है कि उत्तराखंड के भविष्य को ‘चौकीदार सरकार’ लेकर पूरी तरह बेफिक्र है । सरकार बेफिक्र न होती तो मौजूदा हालात में भांग की खेती का फैसला कतई नहीं लेती । सरकार अपने इस फैसले के पक्ष में लाख दलील दे, लेकिन यह फैसला ‘चौकीदार सरकार’ की मंशा और दूरदर्शिता पर बड़ा सवाल है । क्या सरकार को यह नहीं मालूम कि उत्तराखंड हो या हिमाचल भांग सिर्फ और सिर्फ नशे का पर्याय है ? क्या सरकार इससे अनजान है कि उत्तराखंड नशे की दलदल में धंसता जा रहा है, ड्रग्स, भांग, अफीम, गांजा, चरस आदि मादक पदार्थों की यहां सिर्फ तस्करी ही नहीं होती बल्कि भांग और अफीम की खेती भी होती है ? यह सही है कि सरकार ने लाइसेंस हालांकि औद्योगिक भांग के लाइसेंस का दिया है, लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि इसकी आड़ में नशे की पौध नहीं पनपेंगी ?
बहरहाल भांग की खेती में ही सरकार को किसानों और युवाओं का भविष्य और प्रदेश का विकास नजर आ रहा है । मुख्यमंत्री के गृह जनपद पौड़ी में इसके लिए एक कंपनी को इसके लिए लाइसेंस दिया जा चुका है । इस लाइसेंस पर राज्य में कुल दस हजार हेक्टेअर जमीन पर अगले पांच साल के लिए भांग की खेती की जाएगी । इंडियन इंडस्ट्रियल हेंप एसोसिएशन नाम की यह कंपनी औद्योगिक भांग के बीज तैयार करेगी और फिर उसे किसानों में बांटेगी । ‘चौकीदार सरकार’ का दावा है कि भांग की खेती से अगले पांच सालों में 1100 करोड़ का निवेश होगा, इससे किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी और 90 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। उड़ती चर्चा तो यह भी है कि यह ड्रीम प्रोजेक्ट सत्ता के कुछ बेहद करीबियों के हितों से जुड़ा है, इसीलिए ‘चौकीदार सरकार’ को कुछ नहीं दिखायी देता। भू कानून में जो संशोधन हुआ उसे भी इसी से जुड़ा बताया जा रहा है । वाकई ऐसा है तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है । छोड़िये मुद्दे पर मुद्दे पर लौटते हैं और मुद्दा सिर्फ यह है कि जिस राज्य के युवा का भविष्य नशे की गिरफ्त में फंसा हो, उसका भविष्य आखिर कोई भी सरकार भांग की खेती में कैसे देख सकती है ? खासकर वह जो खुद के ‘चौकीदार’ होने का दम भरती हो
योगेश भट्ट,पत्रकार,देहरादून निवासी.
फोटो-साभार गूगल.