"..इस बीच एनडी तिवारी के अपने काकस और स्टाफ में तीन खेमे बन चुके थे । एक वो जो डॉ सुशीला तिवारी के लॉयलिस्ट थे , दूसरा वो जो उज्वला तिवारी के माध्यम से तिवारी जी को मुट्ठी में करना चाहता था और तीसरा वो जो न्यूट्रल था । तिवारी जी भी अपनी सुविधानुसार इन खेमों को बैलेंस रखते थे ।"

1991 में तिवारी जी की पहली पत्नी डॉ सुशीला तिवारी जो पेशे से स्त्रीरोग विशेषज्ञ थीं, का निधन हो गया । उनके निधन के बाद उज्वला तिवारी को लगा कि अब उचित अवसर आ चुका है जब तिवारी जी पर दबाव बना कर अपनी भी राजनैतिक पहचान बनाएं और भविष्य में उनके राजनीतिक विरासत पर भी दावेदारी का हक मिले हालांकि तब तक वो तलाकशुदा नहीं थीं । तिवारी जी येनकेन प्रकारेण उनसे दूरी बनाने की कोशिश करते रहे ।
उस समय देश के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव थे किंतु नारायण दत्त तिवारी उनको फूटी आंख नही सुहाते थे क्योंकि राजीव गांधी की हत्या के बाद नारायण दत्त प्रधानमंत्री पद के बड़े दावेदार बन कर उभरे थे किंतु उस समय चल रहे आम चुनावों के जब परिणाम आये तो वो नैनीताल से चुनाव हारने की वजह से रेस से बाहर हो गये । ऐसे में अपना बोरिया बिस्तर बांध कर अपने गृह प्रदेश में अपने पैतृक गांव जाने की तैयारी कर चुके रुग्ण और शारीरिक रूप से क्षीण हो चुके राव की जैसे लाटरी लग गयी ।
कांग्रेस के घाघ नेताओं को लगा कि इनका भी स्वर्गविमान का टिकट जल्द ही कट जाएगा और दूसरों को सत्ता हथियाने का अवसर मिलेगा इसलिए इस बीमार दक्षिण भारतीय को ही फिलहाल पीएम की कुर्सी सौंप दी जाय ।राव के सलाहकारों खास कर जितेंद्र प्रसाद ने उन्हें चेताया कि नारायण दत्त बड़ा कुशाग्र बुद्धि का है इसको जरा भी सत्ता का जूस मिला तो ये तख्ता पलट देगा, लिहाजा राव ने 3 साल तक तिवारी जी को हासिये पर रखा ।
इस बीच तिवारी के अपने काकस और स्टाफ में तीन खेमे बन चुके थे । एक वो जो डॉ सुशीला तिवारी के लॉयलिस्ट थे , दूसरा वो जो उज्वला तिवारी के माध्यम से तिवारी जी को मुट्ठी में करना चाहता था और तीसरा वो जो न्यूट्रल था । तिवारी जी भी अपनी सुविधानुसार इन खेमों को बैलेंस रखते थे । 3 वर्षों बाद राव बड़ी मुश्किल से नारायण दत्त को उत्तर प्रदेश का प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने को राजी हुए ये सोच कर वहां मुलायम सिंह का वर्चस्व हो चुका है और कांग्रेस वहां कचरे का ढेर बन चुकी है अतः ये वहीं फंसा रहे तो सांप भी मर जायेगा और लाठी भी नही टूटेगी ।
पर इसी बीच उत्तराखंड बनाने की मांग को लेकर चर्चित रामपुर तिराहा कांड हो गया जिसमें अनेको आंदोलन कारी पुलिसिया जुल्म के शिकार हो गए और कई अबलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं हुई । फिर क्या था राजनीति के माहिर खिलाड़ी नारायण दत्त ने उसी कचरे के ढेर में ऊर्जा पैदा कर दी और मुलायम की बर्खास्तगी को पूरे प्रदेश में माहौल बना डाला । पर राव टस से मस नहीं हुए उधर मुलायम ने नारायण दत्त तिवारी के व्यग्तिगत जीवन की पोल खोलने की धमकी दे डाली । तिवारी जी दबाव में आ गए और उन्होंने तोप का मुंह मुलायम सिंह से घुमा कर राव की तरफ कर दिया ऐसे में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर टकटकी लगाये अर्जुन सिंह भी फोतेदार, शीला दीक्षित, कुमारमंगलम मोहिसना किदवई आदि के साथ उनके समर्थन में आ खड़े हुए ताकि राव को कमजोर कर खुद की मुराद पूरी कर सकें ।तेजी से बदलते घटनाक्रम की वजह से उज्वला का दबाव कुछ समय के लिए ढीला पड़ गया पर उनके महत्वाकांक्षा में कोई कमी नही आई ।
उधर कांग्रेस की खींचतान इतनी बढ़ी की उसके दो फाड़ हो गए । नारायण दत्त,अर्जुन सिंह, फोतेदार, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, शिवचरण माथुर, कुमारमंगलम, मोहिसना, शीला दीक्षित आदि ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में असली और नकली कांग्रेस के फैसले के लिए कांग्रेसियों का सम्मेलन आयोजित किया ।अधिवेशन के दिन बड़े सुबह सुबह अधिवेशन स्थल के आस पास उज्वला शर्मा ने " नारायण दत्त तिवारी मेरे पुत्र को न्याय दो" पोस्टर छपवा कर भारी संख्या में चिपकवा दिये ।
- जारी
Political Analyst लखनऊ निवासी
मनोज कुमार मिश्रा द्वारा यह लिखा गया है .किसी भी तरह की तथ्यात्मक भूल के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होंगे.M7News इसे प्रमाणित नहीं करता है.