"..उनके साथ रोहित शेखर भी कभी कभी लखनऊ आते थे । रोहित तब 17-18 साल के ही थे और बड़े शर्मीले थे ज्यादा किसी से बात-चीत नही करते थे पर उनके अंदर तिवारी जी के प्रति पिता का भाव आ चुका था साथ ही उनमे अपने अधिकार को हासिल करने की दृणता भी आना शुरू हो चुकी थी ।थोड़ा और समय बीता तिवारी जी उज्वला से पिंड छुड़ाने की निरंतर असफल कोशिस करते रहे । एक दिन ऐसा आया कि रोहित के साथ उज्वला ने घर के अंदर तूफान खड़ा कर दिया और उसी दिन वो तुरंत रोहित को सार्वजनिक रूप से पुत्र स्वीकार करने पर अड़ गईं ।

अधिवेशन के दिन उज्वला शर्मा के नाम से तालकटोरा स्टेडियम के बाहर सुबह सुबह पोस्टर तो चिपक गये पर एक अकेली महिला के लिये ये सम्भव नहीं था । हालांकि एजेंडा उनका ही था और इसके लिये उनका सहयोग भी जरूरी था, पर शक की सुई दो तरफ घूमी, पहली तिवारी जी के उस काकस की तरफ जो उनको मुट्ठी में करने की चाहत रखता था । दूसरी अर्जुन सिंह की तरफ क्योंकि उसी दिन के अधिवेशन में विभाजित कांग्रेस का अध्यक्ष भी चुना जाना था जिसपर काबिज होने की होड़ नारायण दत्त और अर्जुन सिंह दोनो में ही थी । हालांकि देश भर से आये कार्यकर्ताओं की पूरी फौज का समर्थन तिवारी जी को था पर तिकड़म में अर्जुन सिंह माहिर थे और उनके समर्थन में फोतेदार, शीला दीक्षित आदि भारी भरकम नेता भी थे ।
तिवारी जी डरे डरे और सहमे हुये बड़ी देरी से अर्जुन सिंह के मुश्तण्डों के सुरक्षा घेरे में मंच पर पहुंचे । अर्जुन सिंह के समर्थक और लठैत किसी को भी नारा लगाने से मना करने की उद्घोषणा मंच से कर रहे थे और चेतावनी दी जा रही थी कि किसी ने भी कोई नारा लगाया तो उसे बाहर फेंक दिया जाएगा । वस्तुतः ये तिवारी समर्थकों को चेतावनी थी ताकि नारों से तिवारी समर्थकों का जोश न बढ़े ऊपर से उज्वला का डर दिखा तिवारी जी पर भी दबाव बनाने का प्रयास था ताकि अध्यक्षी पर जब प्रस्ताव आये तो अर्जुन बाजी मार लें । पर तिवारी भी ठहरे धुरंधर खिलाड़ी वो दोपहर बाद 4 बजे अपना भाषण शुरू कर रात 8 बजे तक लगातार बोलते रहे क्योंकि तब तक कौन अध्यक्ष बनेगा इस पर सहमति नही बन सकी थी ।
अर्जुन सिंह के लठैत सुबह 9 बजे से जमे हुये थे ऊपर से 4 से भी अधिक घंटों का नारायण दत्त तिवारी का लंबा भाषण झेल नहीं पाये, तब तक थक कर चूर-चूर हो वो सब कोई न कोई कोना पकड़ लंबलेट हो चुके थे । तिवारी गुट की तरफ से अपने कार्यकर्ताओं के बीच कार्यक्रम स्थल पर लगातार मौजूद रहने का संदेश तो पहले से ही भेजा जा चुका था, तिवारी जी ने एका एक मौका ताड़ा और झट अपने खेमे की मोहिसना किदवई को माइक दे चटपट अध्यक्ष का नाम प्रस्तावित करने को कहा ।मोहिसना ने माइक संभालते ही तुरंत नारायण दत्त का नाम प्रस्तावित कर कार्यकर्ताओं से समर्थन की अपील की, भारी संख्या में मौजूद तिवारी समर्थकों के नारों से सभास्थल गूंज उठा ।
शोरगुल के बीच मोहिसना ने प्रस्ताव के पास होने का उद्घोष करते हुऐ उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया, तिवारी जी ने तुरंत माइक मोहिसना से छीन अध्यक्षीय भाषण शुरू कर दिया । घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि अर्जुन सिंह ठगे से देखते रह गये ।तिवारी कांग्रेस का गठन हो गया और पार्टी काम से वो ज्यादातर लखनऊ में माल एवेन्यू के अपने आवास पर ही रहने लगे । उज्वला भी दिल्ली छोड़ लखनऊ ही उनके आवास पर आ धमकीं । उनके साथ रोहित शेखर भी कभी कभी लखनऊ आते थे । रोहित तब 17-18 साल के ही थे और बड़े शर्मीले थे ज्यादा किसी से बात-चीत नही करते थे पर उनके अंदर तिवारी जी के प्रति पिता का भाव आ चुका था साथ ही उनमे अपने अधिकार को हासिल करने की दृणता भी आना शुरू हो चुकी थी ।
थोड़ा और समय बीता तिवारी जी उज्वला से पिंड छुड़ाने की निरंतर असफल कोशिस करते रहे । एक दिन ऐसा आया कि रोहित के साथ उज्वला ने घर के अंदर तूफान खड़ा कर दिया और उसी दिन वो तुरंत रोहित को सार्वजनिक रूप से पुत्र स्वीकार करने पर अड़ गईं । तिवारी जी बुरे फंसे थे पर उनके दिमाग मे क्या चल रहा है और वो दिखा क्या रहे हैं ये समझ पाना किसी के वश की बात नही थी । उन्होंने शाम को घोषणा करने की बात कह कर लखनऊ में ही किसी कार्यक्रम में सम्मिलित होने की बात कह थोड़ी देर की मोहलत ली ...पर ये क्या उज्वला और रोहित को वो वहीं छोड़ सीधे लखनऊ एयरपोर्ट पहुंच गए और वहां से दिल्ली की फ्लाइट पकड़ चम्पत हो लिये ।
उधर उज्वला को जब खबर हुई तो वो भी रोहित संग दूसरी फ्लाइट पकड़ दिल्ली भागी , उन्हें उसी दिन तिवारी जी से सार्वजनिक स्वीकरोक्ति जो करानी थी । तिवारी जी अभी तिलक लेन नई दिल्ली स्थित अपने आवास पहुंचे ही थे कि लखनऊ से उज्वला विरोधी कैम्प ने खबर दी कि वो दिल्ली रवाना हो चुकी हैं ।
नारायण दत्त को हड़बड़ाहट में कुछ नही सूझा और वो बिना किसी को कोई जानकारी दिए अपनी सुरक्षा को भी चकमा दे अकेले ही किसी अन्य की गाड़ी से वहां से नौ दो ग्यारह हो गये । सभी ने उन्हें तिलक लेन आते तो देखा था पर जाते किसी ने नही देखा । थोड़ी देर में उज्वला भी रोहित संग वहां पहुंच गई पर तिवारी जी को वहां न पा सारे स्टाफ पर बरस पड़ीं कि वो हैं कहाँ ? स्टाफ भी हक्का बक्का था कि तिवारी जी आखिर गए कहाँ जमीन खा गई या आसमान निगल गया ।
उज्वला ने अर्जुन , फोतेदार , शीला , सोनिया के सहायक वी जॉर्ज यहां तक प्रधानमंत्री आवास सबका फोन खड़-खड़ा दिया पर तिवारी जी का कहीं पता नही चला । सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया । तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पर भी संदेह के बादल घिर गए कि कहीं उन्होंने तो अपहरण नही करा लिया । आननफानन में सुरक्षा एजेंसियों को उन्हें ढूंढने पर लगा दिया गया । तत्कालीन गृह राज्यमंत्री राजेश पायलट ने फौरन ही पंजाब के सुपर कॉप के. पी एस. गिल को भी सुरक्षा एजेंसियों से कोऑर्डिनेट कर तिवारी जी की खोज करने को कहा ।
अगले दिन देश भर के अखबारों में "नारायण दत्त तिवारी लापता" आदि हेडलाइन के साथ खबर छप गयी । देश भर में सहानुभूति और चिंता की लहर उबाल लेने लगी । अगले दिन दोपहर बाद खबर आई कि नारायण दत्त तिवारी जी गजरौला के "वैम ओर्गानिक" के गेस्ट हाउस में अपनी किसी अन्य शिष्या के साथ एकांतवास में हैं । पता नही तिवारी जी का उज्वला से छुटकारा पाने के लिए ये कोई सियासी ड्रामा था या फिर प्रकृति ही उनकी मदत कर रही थी । इस घटना के बाद सारा दोष उज्वला पर आ गया और तिवारी जी उनसे लंबे समय तक छुटकारा पाने में सफल रहे - जारी
Political Analyst लखनऊ निवासी
मनोज कुमार मिश्रा द्वारा यह लिखा गया है .किसी भी तरह की तथ्यात्मक भूल के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होंगे.M7News इसे प्रमाणित नहीं करता है.