एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

किस्सा : आजादी के 43 साल बाद संसद के सेंट्रल हॉल में बाबा साहेब की तस्वीर लगी

एक किस्सा सुनाता हूं, जो पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह सुनाते थे। अपने राज में जब उन्होंने संसद के सेंट्रल हॉल में संविधान निर्माता डॉक्टर अंबेडकर की तस्वीर लगानी चाही तो विरोध शुरु हो गया। ये दलील दी गई कि दीवार पर जगह नहीं है। वीपी सिंह का जवाब था कि दिल में जगह बनाओ तो दीवार में भी जगह बन जाएगी। वीपी के दिल में अंबेडकर के लिए जगह थी तो उन्होंने दीवार में भी जगह बना दी और आजादी के 43 साल बाद संसद के सेंट्रल हॉल में अंबेडकर की तस्वीर लगी। उन्हें भारत रत्न भी तभी मिला।
आज जो लोग अंबेडकर के नाम की दुहाई दे रहे हैं, जिनकी जुबान पर अंबेडकर का नाम रहता है, क्या उनके दिल में भी अंबेडकर हैं? अगर होते तो ऊना में दलितों की खाल नहीं उधेड़ दी जाती। कोई रोहित वेमुला आत्महत्या करने को विवश नहीं होता और दलितों के आरक्षण पर ही सवाल नहीं उठाया जाता, जैसा हो रहा है।
आज अंबेडकर की दीक्षा भूमि हिंदुत्व का गौरव केंद्र बन गया है, जबकि ये हम सब हिंदुओं के लिए लज्जा की बात होनी चाहिए थी कि जिसने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी, जिसने देश का संविधान बनाया, जिसने आधुनिक भारत को एक सभ्य कायदे कानून की पवित्र पुस्तक दी, वो बाबा साहेब अंबेडकर 14 अक्टूबर 1956 के दिन 61 साल पहले हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध हो जाने को मजबूर हो गए। जीवन के 65वें साल में, अपनी मृत्यु से 7 महीने पहले अगर कोई अपमान, अवज्ञा और अनादर में अपना धर्म छोड़ने को मजबूर हो तो हमें बार बार अपने अंदर झांकने की जरूरत है कि कमी कहां रह गई। वो कमी आज भी है, लेकिन हमारे भाषणवीर सिर्फ बोलते हैं, कुछ करने का इरादा नहीं दिखता। अंबेडकर राजनीति के शोरूम में सजा कर रख दिए गए हैं एक दलित नेता के रूप में।
- Bichitramani Rathor