1919 उत्तराखंड के इतिहास का बेहद सक्रिय और गौरवशाली साल रहा भारत सुरक्षा कानून के तहत जब इसे बगैर सुनवाई के कार्रवाई का रौलट एक्ट का दमनकारी रूप दिया गया तो 13 अप्रैल 1919 जालियवाला से भी पहले उत्तराखंड में इस काले कानून का विरोध शुरू हो गया . फरवरी 1919 मैं सत्याग्रह लीग की स्थापना हुई और 21 मार्च 1919 को श्रीनगर में गढ़वाल परिषद की सभा में स्थानी प्रश्न उठे इसी प्रकार रौलट एक्ट का विरोध और स्थानीय प्रश्नों को कुमाऊं परिषद की भी अनेक इकाइयों में उठाया गया जगह-जगह रौलट एक्ट का विरोध प्रारंभ हुआ चोरगलिया हल्द्वानी काशीपुर देहरादून अल्मोड़ा में यह विरोध जालियावाला बाग कांड से भी पहले शुरू हुआ 7 अप्रैल 1919 को अल्मोड़ा का विरोध प्रदर्शन बहुत व्यापक था
11 मई 1919 को नन्दा देवी अल्मोड़ा के प्रांगण में रौल्ट एक्ट पर ,18 अगस्त 1919 को बानडी देवी अल्मोड़ा में बेगार तथा जंगलात की समस्याओं पर केंद्रित एक बड़ी सभा हुई जून 1919 में मल्ला कश्मीर के किसानों ने पटवारियों को दिया जाने वाला खाजा बंद कर दिया . 22 से 24 दिसंबर 1919 को कुमाऊं परिषद का तीसरा अधिवेशन कोटद्वार में हुआ ,इस अधिवेशन की अध्यक्षता राय बहादुर बद्री दत्त जोशी ने की इसमें कुमायूं के गोविंद बल्लभ पंत, बद्री दत्त जोशी ,मोहन सिंह मेहता ,इंद्र लाल शाह ,जयलाल शाह दुर्गादत्त पंत ,रामदत्त ज्योतिष ,प्रेम बल्लभ पांडे भोला दत्त पांडे ,बद्री दत्त पांडे ,मोहन जोशी गढ़वाल से बैरिस्टर मुकुंदी लाल, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, गिरजा प्रसाद नैथानी प्रताप सिंह, धनीराम मिस्रा ,विशंभर दत्त चंदोला ,मथुरादास नैथानी आदि बड़ी संख्या में लोगों ने इस अधिवेशन में भागीदारी की ,इस अधिवेशन में कुल प्रतिनिधि 500 से अधिक थे. जो कि अब तक के अधिवेशन ओं में सबसे बड़ी संख्या थी ।कोटद्वार के इस अधिवेशन ने कुमाऊं और गढ़वाल के बीच की दूरी को पाटने का भी काम किया.
तब कुमाऊं और गढ़वाल मंडल में परिवहन के साधन नहीं के बराबर थे ,लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन में चेतना का जो स्तर था वह देश के अन्य भागों से ज्यादा प्रभावी इस क्षेत्र में देखा जाने लगा था यह निश्चित रूप से उत्तराखंडी समाज की उच्चतर चेतना को दर्शाता है । उत्तराखंडी समाज में राष्ट्रीय चेतना के इस स्तर को बनाए रखने में अल्मोड़ा से प्रकाशित अल्मोडा अखबार शक्ति , पौड़ी से प्रकाशित गढ़वाल समाचार "पुरुषार्थ "ने बड़ी भूमिका निभाई.

इलाहाबाद तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षारत् छात्रों ने अपने घर लौट कर समाज निर्माण के आंदोलन में बड़ी भागीदारी निभाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र प्रयाग दत्त पंत ने पिथौरागढ़ में काम किया वही काम भैरव दत्त धूलिया भोला दत्त चंदोला जीवानंद बडोला गोवर्धन बडोला धोलादा गबराल आदि ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से लौटकर गढ़वाल में काम किया गढ़वाली के संपादक विश्वंभर दत्त चंदोला का अपने गांव में काम बहुत सराहनीय रहा.. 1919 के चेतना के वर्ष ने 1921 के कुली बेगार आंदोलन की सफलता की बुनियाद रख दी थी इस सफलता का पूरे उत्तराखंड में व्यापक असर हुआ और जनता का मनोबल बेहद पड़ गया 1922 में असहयोग आंदोलन के वापस लेने के बाद जब देश में स्वतंत्रता संग्राम की धार कमजोर पड़ रही थी तब 1926 तक उत्तराखंडी समाज उद्वेलित था . बेगार के तुरंत बाद जंगलात मे परंपरागत हक हकूक की वापसी व्यापक आंदोलन हुए जिसने कालांतर में वन अधिकारों के संबंध में विशेष समिति का गठन किया बल्कि 1 पंचायतों के विचार को भी जन्म दिया उत्तराखंड के वन आंदोलनों का प्रभाव 1926 के वन अधिनियम में भी दिखाई देता है। उत्तराखंड में 1 आंदोलन के दौरान 2.4 6 लाख एकड वन आग के हवाले किए गए .819 बन अपराध पंजीकृत हुए 549 व्यक्ति दंडित किए गए ।बनअधिनियम के साथ ही उत्तराखंडी समाज ने आयन की बहाली ( न्याय के अधिकार) आंदोलन भी जारी रखा.
सितंबर 1916 मैं कुमाऊं परिषद की स्थापना हुई और 1926 में इसका विलय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में कर दिया गया .लेकिन कुमायूं परिषद के 10 वर्षों का गौरवशाली इतिहास उत्तराखंड की चेतना का भी गौरवशाली इतिहास रहा है जिसने उत्तराखंड के छोटे-छोटे कस्बों में 5 से 10 हजार तक की संख्या में आंदोलनकारियों के जुलूस बड़ी संख्या में निकालें, लोगों के भीतर ब्रिटिश राज का भय लगभग समाप्त कर दिया और साथ ही नायक सुधार अछूत उद्धार जैसे सामाजिक आंदोलनों से भी उत्तराखंडी चेतना के उच्चतम स्तर को प्रदर्शित किया.
100 वर्ष बाद जब हम उत्तराखंडी समाज को देखते हैं तो पाते हैं जहां आजादी के आंदोलन में सामाजिक कारणों से दसियो हजार लोग सड़कों पर उतर आते थे वहीं आज तमाम संसाधनों के बाद भी सामाजिक चेतना लगभग विलुप्त प्राय है तब यह बात स्थापित होती है की समय के साथ समाज की चेतना हमेशा आगे बढ़ने वाली नहीं होती है यह पीछे भी जाती है जैसा कि उत्तराखंडी समाज के साथ इन दिनो दिखता है.. जिस समाज ने अपने बनो के लिए आवाज उठाई वहां उत्तराखंड के गांव बंदर और सुंअर के आतंक से त्रस्त हैं और पलायन उत्तराखंड के अस्तित्व को ही खतरे में डाले हुए है. तब यह सन्नाटा चिंता जनक तो है ही..।
( स्रोत उत्तराखंड स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास सरफरोशी की तमन्ना )
- साभार प्रमोद शाह,हल्द्वानी निवासी