एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

मोदी है तो 'लूट' और 'झूट' दोनों मुमकिन है?


इस समय सबसे अधिक गालियां पत्रकारों पर बरस रही है.कोई 'गोदी मीडिया' कहता है कोई 'बिकाऊ मीडिया' लेकिन सच्चाई इस से अलग है. देश के 95 % मीडियाकर्मियों के लिए 'पत्रकारिता महज जॉब है.सरकारी कर्मचारियों को सरकार के आदेशों का पालना करना है.और पत्रकारों को 'संपादकों के वेशभूषा में चम्पाद्कों' की जी हज्रूरी करने की विवशता है.जैसे एक सरकारी कर्मचारी सरकारी आदेशों का पालन हेतु बाध्य है पत्रकार भी बाध्य है.देश का जवान,किसान ,पत्रकार तीनों जमीन पर काम करते है.किसानों की कमाई 'दलाल' खा जाते है.
जवानों की शहादत पर "राष्ट्रवादी कीड़े' वोट पा जाते है. जमीनी पत्रकार की 'पत्रकारीय मूल्यों' को बेच कर,दबा कर,कुचल कर 'चम्पादक' सत्ता के कीड़ों के सिरमौर बन जाते है.इसलिए आज के दौर में 'आम इंसान' को भी हर मसलें पर चिन्तनशील होना पड़ेगा.अगर 'चम्पाद्कों' के आदेशों पर ख़बरें नहीं चलेंगी तो उसकी नौकरी गई?उसके बच्चे कौन पालेगा?घर कैसे चलेगा?तमाम मजबूरियों के बीच इस देश का जवान किसान पत्रकार काम करता है.उनकी विवशता को कौन समझता है? एक उदाहरण से समझिए.
पिछलें 20 दोनों का अमर उजाला पलटिए.मोदी सरकार का प्रतिदिन औसतन चार पेज फुल पेज विज्ञापन है.सर्जिकल स्ट्राइक के दिन तो 22 पेज के अखबार में 18 पेज का 'मोदिनामा' छपा था.लगभग एक पन्ना 'प्लांट ख़बरें' प्रतिदिन है.मोदी सरकार के हर छोटे-बड़े आयोजन पर एक-एक पन्ने के खबर है.इसके अलावा उत्तर प्रदेश के योगी सरकार के काम काज के विज्ञापनों का लेखा जोखा भी उत्तराखंड एडिशन में छप रहा है.अब सवाल है जब बेहिसाब विज्ञापन रोज छपेंगे तो 'जनसरोकारी' ख़बरों को जगह कौन देगा? मालिक और चम्पादक को 'मोदी जी के हरे पीले नीले गुलाबी' नोटों से मतलब है.मोदी सरकार का विज्ञापन कौन सा स्पेस खा रहे है? 
वहीँ स्पेस खा रहे है जो 'पत्रकार' दिन भर की मेहनत से करता है.फायदा पत्रकारों को नहीं होगा.फायदा होगा मोदी सरकार और अखबार मालिकों और एक चम्पादक को.तीन से चार लोगों के फायदे से पूरी पत्रकार बिरादरी को गाली देंगे? असल में गाली देने के बजाय चिंतन करना चाहिए.आखिर क्यों मोदी सरकार आम जनता का पैसा अख़बार मालिकों को विज्ञापन देकर कूड़ा कर रहीं है? क्या मोदी प्रचार और विज्ञापन के दम पर फिर सरकार बनाना चाहते है?चुनाव के दो महीनें पहले से एक अखबार में हर दिन चार पेज का विज्ञापनदेकर क्या साबित करना चाहती है ? क्या मोदी सरकार को अपने काम-काज पर भरोसा नहीं है?
वर्तमान परिपेक्ष्य में निसंदेह में 'प्रचार' और 'विज्ञापन' जरुरी मसला है.लेकिन इसकी सीमाओं को कौन तय करेगा? इस हिसाब से तो लगता है मोदी सरकार सारें अखबारों चैनलों को खरीद कर चुनावों में एकतरफा 'प्रोपोगैंडा' चलाएगी. इसमें पीसेगा आम पत्रकार और देश की आम जनता.गला घोट दिया जायेगा लोकतंत्र का.सवाल नहीं तो लोकतंत्र दफ़न.
हाल ही में 'बेटी पढाओ,बेटी बचाओ' योजना का संसद में एक आकड़ा रखा गया. आकड़ा देख कर हर कोई हैरान हो जाएगा लेकिन वो आकड़ा पब्लिक डोमेन में प्रचारित हो ही नहीं सका.मोदी सरकार के 'नामुकिन ,अब मुमकिन' है 'जुमलें को सार्थक करते हुए.600 करोड़ बजट का कुल 356 करोड़ 'बेटी पढाओ,बेटी बचाओ' योजना के प्रचार में खर्च कर दिया.
आधे से अधिक बजट का हिस्सा मोदी सरकार के पाखंड में चला गया.अब समझिए इस योजना का आम जनता को क्या फायदा हुआ होगा? संसद में एक सवाल के जवाब में बीजेपी सांसद ने यह आकड़ा स्वयं दिया.अब देश की जनता को सोचना है ' नामुमकिन को मुमकिन वो किस कीमत पर चाहते है'?
- मयंक सिंह नेगी