एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

उत्तराखंड: हैवीवेट 'हरदा' बचा पायेंगे अपना 'कद'?

उत्तराखंड के कद्दावर नेताओं में शुमार हरीश रावत ऐसे राजनीतिज्ञ माने जाते है जो अपने प्रतिद्वंदियों से मात खाने के बाद भी हर बार और मजबूत होकर उभरे हैं। लगातार चार लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने खुद को स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2009 में हरिद्वार से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद केंद्र में कैबिनेट मंत्राी पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद अंततः 2014 में प्रदेश के मुख्यमंत्राी की कुर्सी तक पहुंचना उनके रणनैतिक कौशल को दर्शाता है। 
जब उत्तराखंड का उदय हुआ था तब तत्कालीन यूपी में भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में थी और उत्तराखंड में भी भाजपा की ही सरकार बनी। तब उत्तराखंड गठन को लेकर यहां की जनता में भी भाजपा के प्रति माहौल भी था। तब कांग्रेस हाईकमान ने उत्तराखंड में बिखरी कांग्रेस को एकजुट करने का जिम्मा हरीश रावत को सौंपा गया। 2001 में उन्हें प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई जिसके बाद उन्होंने कांग्रेस को संजीवनी ही नहीं बल्कि 2002 के विधनसभा चुनाव में सूबे से भाजपा का सूपड़ा ही सापफ कर दिया। यही वह दौर था जब हरीश रावत की काबिलियत का लोहा मनवाया जाने लगा।
 2002 क विधनसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत का सेहरा न केवल रावत के सिर पर बंधा .बल्कि उन्हें सीएम का प्रबल दावेदार भी माना जाने लगा। लेकिन ऐन वक्त पर एनडी तिवारी की ताजपोशी हो जाने से वह मन मसोस कर रहे गए। इसी के बाद उन्हें राज्य सभा भेज दिया गया। 2009 के लोकसभा चुनाव के लिए हरदा ने हरिद्वार से चुनाव लड़ा और लोकसभा जा पहुंचे। यूपीए सरकार में जल संसाधन एवं संसदीय कार्य मंत्रालय संभाल चुके रावत को वर्ष 2014 में कांग्रेस आलाकमान ने तत्कालीन मुख्यमंत्राी विजय बहुगुणा के विकल्प के तौर पर उत्तराखंड भेजा। रावत लगभग तीन साल उत्तराखंड के मुख्यमंत्राी रहे। यह बात दीगर है कि उनकी ताजपोशी उत्तराखंड कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं को रास नहीं आई। पहले सतपाल महाराज ने कांग्रेस छोड़ी और पिफर पूर्व मुख्यमंत्राी विजय बहुगुणा व कैबिनेट मंत्राी डा. हरक सिंह रावत समेत दस विधायक पार्टी छोड़ भाजपा में चले गए। पिछले साल विधानसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस के एक और दिग्गज तथा रावत कैबिनेट के सदस्य यशपाल आर्य ने भी कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। अधिकांश दिग्गजों के पार्टी छोड़ने के बाद उत्तराखंड में कांग्रेस की चुनावी नैया के अकेले खेवनहार बने हरदा को विधानसभा चुनाव में करारा झटका लगा। न केवल कांग्रेस 70 सदस्यीय विधानसभा में महज 11 सीटों तक जा सिमटी, बल्कि वह स्वयं हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से चुनाव मैदान में उतरने के भी दोनों जगहों से चुनाव हार गए। मोदी लहर में भाजपा ने पूरे सूबे में 57 सीटें झटक कर तीन चैथाई से ज्यादा बहुमत हासिल कर लिया। 
विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त कीजिम्मेदार भी हरीश रावत ने ही ली। हालांकि उन्होंने विधनसभा चुनाव में हुई करारी हार के बाद खुद को सक्रिय राजनीति से दूर कर लिया लेकिन कभी आम पार्टी, कापफल पार्टी और हरेला पर्व के बहाने उन्होंने जनता के बीच अपनी सक्रियता को बरकरार रखा। हरिद्वार से लेकर तराई तक और पहाड़ तक में अपनी सक्रियता बढ़ाने के बावजूद हरदा ने खुद को चुनाव से अलग रखने का ही मन बनाया हुआ था। वहीं उनके सुपुत्रा आनंद रावत की सक्रियता ने कई कयासों को भी जन्म दिया कि वह अपने सुपुत्रा आनंद रावत के लिए सियासी जमीन भी तैयार कर रहे हैं।
 जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव का समय नजदीक आया वैसे-वैसे उनकी सक्रियता बढ़ती गई। खासकर उन्होंने अपना पफोकस तराई पर केंद्रित करना शुरु कर दिया। हालांकि के इसके बाद भी वह कहां से चुनाव लड़ेंगे के सवाल पर चुप्पी ही साध्े रहते। हरदा ने ट्विटर के माध्यम से चुनावी महासमर में उतरने का ऐलान किया था। उन्होंने ट्वीटर पर कहा था कि ‘मैं राहुल जी के आदेश पर कहीं से भी चुनाव लड़ने की सोच सकता हूं। मुझे अवसर मिला था, मैंने गंवा दिया। इसी ट्वीट में आगे उन्होंने आगे लिखा, ‘2019 के धर्मयु( में लोकतंत्रा पक्ष के कमांडर राहुल जी हैं।
 महाभारत में बर्बरीक ने अपना सर कटवाकर भी युद्ध  में भागेदारी की थी। मैं भी इस महायुद्ध  में बर्बरीक बनने को तैयार हूं मगर युद्ध से अलग नहीं रह सकता, चिंता न करें।’ ट्वीट की भाषाशैली ने साफ कर दिया कि यह संदेश उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेताओं को दिया कि भले ही वह विधनसभा चुनाव हार गए हों लेकिन वह अभी भी चूके नहीं हैं और उत्तराखंड की सियासत में उनकी अहमियत अब भी बनी हुई है। दरअसल, इन दिनों उत्तराखंड कांग्रेस में एक बार फिर वर्चस्व की जंग चल रही है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश पार्टी में सबसे ताकतवर नेता के तौर पर स्थापित हैं। लेकिन इसके बावजूद हरीश रावत ने अपने आप को स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
यही वजह भी है कि हरीश रावत जहां अपने दम पर सीएम बने वहीं तमाम विरोधें के बाद भी नैनीताल-यूएसनगर संसदीय सीट से टिकट लाने में सफल रहे। यहां पर यह भी बता देना जरूरी है कि 2017 के विधनसभा चुनाव में रावत किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण सीट से चुनाव लड़ रहे थे। ये दोनों ही सीटें भाजपा प्रत्याशियों ने जीतीं। हरिद्वार ग्रामीण सीट पर उन्हें बीजेपी के यतीश्वरानंद ने 12,000 वोटों से शिकस्त दी तो किच्छा में वह भाजपा के राजेश शुक्ला से महज 2127 वोटों से हार गए। अब जबकि हरदा नैनीताल-यूएसनगर संसदीय सीट से किस्मत आजमा रहे हैं, यह देखना दिलचस्प होगा कि वह हारी बाजी जीतने में कामयाब होते हैं या पिफर वह यहां पर भी ‘चूक’ वाले साबित होते हैं।
राजनैतिक पारी की शुरुआत
विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने भारतीय युवक कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। 1973 में कांग्रेस की जिला युवा इकाई के प्रमुख चुने जाने वाले वे सबसे कम उम्र के युवा थे। हरीश रावत पहली बार 1980 में केंद्र की राजनीति में शामिल हुए, जब वे लेबर एंड इम्प्लाॅयमेंट के कैबिनेट राज्यमंत्राी बने। उन्होंने 7वें लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर उत्तराखंड की हरिद्वार लोकसभा सीट से जीत हासिल की जिसके बाद से वे लगातार उस सीट से जीतते चले आ रहे हैं। 1990 में वे संचार मंत्राी बने और मार्च 1990 में राजभाषा कमेटी के सदस्य बने। 

1999 में हरीश रावत हाउस कमेटी के सदस्य बने। 2001 में उन्हें उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। 2002 में वे राज्यसभा के लिए चुन लिए गए, 2009 में वे एक बार पिफर लेबर एंड इम्प्लाॅयमेंट के राज्यमंत्राी बने। वर्ष 2011 में उन्हें राज्यमंत्राी, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण इंडस्ट्री के साथ संसदीय कार्यमंत्राी का कार्यभार सौंपा गया। 1980 में वे पहली बार अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ लोकसभा क्षेत्रा से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए।उसके बाद 1984 व 1989 में भी उन्होंने संसद में इसी क्षेत्रा का प्रतिनिधित्व किया। 1992 में उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का महत्वपूर्ण पद संभाला, जिसकी जिम्मेदारी वे 1997 तक संभालते रहे। 
1990ः जनसंचार मंत्रालय के कमेटी में सदस्य चुने गये।
2001-2007ः उत्तराखंड कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष रहे। 
2002ः राज्यसभा के लिये चुने गये। 
2009ः 15वीं लोकसभा चुनाव में चैथी बार लोकसभा सदस्य चुने गये। 
2011ः राज्य मंत्राी चुने गये।
2012ः केंद्र में कैबिनेट मंत्राी बने।
2014ः उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने।