एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

विश्लेषण : क्यों बचती है कांग्रेस बड़े मुकाबलों से ?

प्रियंका गांधी की बनारस से उम्मीदवारी को हवा देकर न लड़ाने का फैसला करके कांग्रेस ने मोदी को ज़ोर का झटका धीरे से दे दिया है. मतलब शहर में एक दिलचस्प मुक़ाबले का डंका बज गया, टिकट बिक गए और स्टेडियम भी भर गया लेकिन बॉक्सिंग रिंग में दस्ताने पहने मोदी अकेले खड़े हैं. अब मोदी अजय राय और शालिनी यादव के त्रिकोणीय मुक़ाबले में किसकी दिलचस्पी होगी.
मोदी का आज का रोड शो बनारस में उनका पहला और आखिरी इवेंट होगा जिसमे मीडिया और बनारस के बाहर के लोगों की कोई उत्सुकता होगी. अब वहां तीन सप्ताह तक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का डेरा नहीं होगा और न ही दिल्ली-मुंबई से "सेक्यूलर ब्रिगेड" के सिपाहियों का चुनाव टूरिज़म होगा जो आजकल बेगुसराय में अपने कैमरों के साथ गली गली घूम रहा है.
क्यों बचती है कांग्रेस स्टार मुकाबलों से:

कांग्रेस ने क्यों बनारस के चुनाव को ठंडा कर दिया उसकी कई वजह हो सकती हैं लेकिन एक बड़ी वजह है स्टार मुक़ाबले ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस के विरुद्ध गए हैं.2014 में अरविंद केजरीवाल ने बनारस से मोदी को चुनौती दे डाली. केजरीवाल चुनाव हार गये लेकिन दिल्ली के चुनाव में आम आदमी पार्टी को बनारस से लड़ने का फायदा मिला. लेकिन उत्तर प्रदश के मैदान में एसपी बीएसपी और कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा. देश दुनिया का मीडिया बनारस में जमा रहा और बीजेपी को पहले से मौजूद ध्रुवीकरण को प्रसारित करने का एक बड़ा प्लेटफॉर्म बनारस से मिल गया.
और पीछे जायेंगे तो 1977 के रायबरेली का चुनाव भी इंदिरा गांधी और राज नारायण के बीच स्टार मुक़ाबला था. उस चुनाव में इंदिरा गांधी अपनी सीट भी हारीं और दिल्ली की सत्ता से भी गई. 1988 का इलाहाबाद का उपचुनाव भी ऐसी ही मिसाल है. बोफोर्स का मुद्दा उठा रहे वीपी सिंह के खिलाफ कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी. नतीजा कांग्रेस के सुनील शास्त्री चुनाव हारे और अगले ही साल 404 सीटें जीत कर आये राजीव गांधी सत्ता से बाहर हो गये. 2004 और 2009 के चुनाव में जिसमे कांग्रेस सत्ता में वापिस आई और बनी भी रही ऐसा एक भी मुक़ाबला नहीं हुआ.
एजेंडे से भटकाव का खतरा:
यूपी और बिहार में इन चुनाव में एजेंडा सामाजिक न्याय की ताकते तय कर रही हैं. यूपी में एसपी-बीएसपी गठबंघन और बिहार में आरजेडी और उसके सहयोगी दल सामाजिक न्याय के मुद्दों और समीकरण से बीजेपी के ध्रुवीकरण को कड़ा मुक़ाबला दे रहे हैं. कांग्रेस इन दोनों राज्यों में राष्ट्रीय मुद्दों पर मैदान में है लेकिन सामाजिक न्याय की ताकतों से एक सामंजस के साथ. बनारस की एक गलती तुरंत एक दूसरी लकीर खींच देती जिससे कांग्रेस ने अपने आप को बचा लिया.
मोदी और बीजेपी शिद्दत से चाहते थे कि चुनाव मुद्दों की जगह व्यक्तियों पर हो यानि मोदी के सामने कौन के सवाल पर. गांधी परिवार से प्रियंका के बनारस से लड़ने से बढ़िया मौका और कहां मिलता मोदी को ये बायनरी स्थापित करने के लिए.
फिलहाल तो बनारस बागपत, मैंनपुरी, रायबरेली, अमेठी जैसी एक और वीआईपी सीट ही रह गई है. मोदी ये ज़रूर कह सकते हैं कि "देखने हम भी गये थे पर  तमाशा न हुआ" पर मन मसोज कर.
प्रशांत टंडन,दिल्ली में दिग्गज पत्रकार