एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

उफ़्फ़ ये पुरुष 'नामर्द' !


इन दिनों राजनीति, प्रशासन, न्यायपालिका, ग्लैमर उद्योग और धर्म-अध्यात्म से जुड़े बड़े-बड़े लोगों पर स्त्रियों के यौन शोषण के लगातार लग रहे आरोपों से बहुत हैरान होने की जरुरत नहीं है। ये घटनाएं पहले भी होती थीं। औरतों के शिक्षित, सजग और मुखर होने के बाद इन दिनों ये घटनाएं प्रकाश में आने लगी हैं। जिन लोगों पर ये आरोप लगते हैं, वे लोग व्यक्ति से ज्यादा हम पुरुषों के भीतर की दमित इच्छाओं और यौन विकृतियों की अभिव्यक्ति हैं।
 थोड़े-बहुत प्रायः सभी पुरुषों के भीतर ऐसे यौन अपराधी मौजूद हैं। अपवादों को छोड़ दें तो संपति, प्रभुत्व और अवसर प्राप्त होने के बाद आम तौर पर पुरुषों की दो ही प्रबल महत्वाकांक्षाएं होती हैं- ऐश्वर्य के तमाम साधन जुटा लेना और ज्यादा से ज्यादा स्त्रियों से शारीरिक संबंध बनाना। धन, भय या प्रलोभन के बल पर अधीनस्थ या अपने संपर्क में आने वाली जिन स्त्रियों का ये शारीरिक और मानसिक शोषण करते हैं, वे उनके लिए मनोरंजन या पुरुष अहंकार को सहलाने का ज़रिया ही नहीं, स्टेटस सिंबल भी हैं। 
ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन और मध्यकालीन दुनिया में राज्य के आकार के अलावा हरम में रानियों और दासियों की संख्या किसी भी किसी राजा, बादशाह या सामंत की सामाजिक प्रतिष्ठा तय किया करती थी। तमाम नैतिक और कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद दुनिया के ज्यादातर मर्दों की आंतरिक इच्छा आज भी कमोबेश ऐसी ही बनी हुई है। साधनसंपन्न लोग नैतिकता औऱ कानून को धत्ता बताकर यही करते रहे हैं। उनमें से गिनती के जो लोग पकडे जाते हैं, अपराधी उन्हें ही माना जाता है। जिनको अवसर नहीं मिला अथवा जिनका भांडा अब तक नहीं फूटा, वे सब पुण्यात्मा हैं।

'ध्रुव गुप्त' पूर्व आइपीएस अधिकारी