एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

प्यार किया तो डरना क्या...

'मुगल-ए-आज़म' में बड़ी मशक्कत के साथ शीश महल का सेट तैयार हो चुका था। कैमरा, लाइट आदि सभी का एडजस्टमेंट हो रहा था। साथ साथ पेश हो रही तमाम दुश्वारियों को दूर करने के लिए रास्ते तलाशे जा रहे थे। इस बीच डायरेक्टर के.आसिफ ने म्युज़िक डायरेक्टर नौशाद साहब से पूछा, गाना रिकॉर्ड हो गया? नौशाद साहब ने बताया, कल सुबह रिकॉर्डिंग है। 
मगर हक़ीक़त ये थी कि अंदर हाल बुरा था। नौशाद साहब परेशान थे। शक़ील बदायुनी का लिखे गाने के मुखड़े से वो कतई मुतमुईन नहीं थे। उन्होंने शक़ील से कहा, शाम घर पर तशरीफ़ ले आएं। मुखड़ा फ़ाइनल करें। 
शाम शक़ील वक़्त पर हाज़िर हो गए। दरवाज़े बंद कर दिए गए, खिड़कियां परदों से ढक दी गयीं ताकि बाहर की कोई आवाज़ डिस्टर्ब न करे और अंदर की आवाज़ बाहर न जाए। घर में सबको ताक़ीद भी कर दी गयी, कोई भीतर न घुसने पाए। कोई ज़रूरत होगी तो खुद बता दूंगा। 
और काम शुरू हुआ। शक़ील ने सफ़े पर कुछ लिखा, मगर नौशाद को पसंद नहीं आया। फिर दूसरे और तीसरे सफ़े पर कुछ लिखा। लेकिन नौशाद साहब बोले, जमा नहीं। कुछ नौशाद साहब ने सुझाया। मगर शक़ील ने नकार दिया। एक बाद एक फ़र्श पर भर गया नकारे और फाड़े गए सफ़ों से। शाम से रात हुई और फिर सुबह। इस बीच न कुछ खाया गया और न पीया गया। इसकी फ़िक्र ही नहीं थी।
दोनों इल्म के गहरे सागर में गोते पर गोते लगा रहे थे, मुखड़े की तलाश में। 
और आख़िर में अचानक नौशाद साहब को एक पूर्वी गाने का मुखड़ा याद आया, 
प्रेम किया का कोई चोरी करी...
और शक़ील ने पर बनाया, 
प्यार किया तो डरना क्या 
प्यार किया कोई चोरी नहीं की... 
नौशाद साहब ने कई बरस पहले एक इंटरव्यू में बताया था कि सुबह जब फर्श पर बिखरे सफ़ों की गिनती हुई तो उनकी तादाद 110 निकली। 
और भी बहुत मुश्क़िलात पेश आयीं थीं इसके पिक्चराइज़ेशन में। ये एक अलग और लंबी दास्तां है। मुख़्तसर में ये जानना ज़रूरी है कि करीब तीस दिन और दस लाख रूपए खर्च हुए थे। इतने रुपयों में चार फ़िल्में बन जाती थीं उस दौर में। बहरहाल, दुनिया जानती है इस गाने के और इसके जन मानस पर पड़े इसके इफ़ेक्ट के बारे में। 
एक और ख़ास बात। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से आये जनाब ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो उन दिनों बम्बई में थे और के.आसिफ़ के ख़ास दोस्तों में थे। वो इस गाने के पिक्चराइज़ेशन के दौरान हर दिन मौजूद रहे। यूनिट के मेंबर्स के साथ बैठ कर लंच किया और चाय भी पी। अब किसी को क्या मालूम था कि ये बन्दा कुछ साल बाद पाकिस्तान का प्राइम मिनिस्टर बनेगा और फिर क़त्ल के इलज़ाम में फांसी पर भी चढ़ा दिया जाएगा। 
- वीर विनोद छाबड़ा