"...हम अक्सर किसी ऊंची चट्टान पर आकर अपनी टिहरी को डूबते हुए देखते। कभी मुंह छुपाकर रोते तो कभी किस्सा कहानी सुनाते। लेकिन एक दिन टिहरी पूरी डूब गई। बस रह गया घंटाधर का ऊपरी कुछ हिस्सा। जो शायद डूबते हुए रो रहा हो। जैसे कोई बिछड़ने पर रोता है या अंतिम सांस गिनता हुआ कोई मरीज बिस्तर पर अपने परिजनों को देखता हुआ।"

दुनिया में पहली समाजवादी क्रांति और एक नई सर्वहारा व्यवस्था देने वाले वाल्दमीर लेनिन का आज जन्मदिन है। मेरे जीवन में लेनिन की दशतक तब हुई, जब हम हंस, नंदन और पंचतंत्र की कहानी पढ़कर नई टिहरी में सर्दियों की उबाऊ छुट्टियों में किसी तरह समय काटते थे। उसी समय को याद करते हुये एक किस्सा याद आ रहा है। जब टिहरी बांध के पॉवर हाउस निर्माण का कार्य कर रहे केसीटी थॉपर कंस्ट्रक्शन कंपनी के एक मजदूर नेता और मेरे पिता के तमिल मूल के मित्र कामरेड नरेंद्र बोरा ने मेरी फालतू बातों से प्रभावित होकर मुझे लेनिन की जीवनी पढ़ने को दी। उस समय में कक्षा आठवीं में था। वो किताब आज भी मेरे पास सुरक्षित है। इन सभी बातों को पुरानी टिहरी पर लिख रहा किताब में शामिल किया है। जिसका एक अंश यहां लेनिन के जन्मदिवस पर साझा कर रहा हूं। जिसे आज आपके सामने पेश कर रहा हूं।
भिलंगना तुम याद आती हो
नई टिहरी में सर्दियों की बोरियत जरूर कुछ ऐसी ही रही होगी, जैसे रूस के साइबेरिया में राजनीतिक बंदी एक खालीपन से जूझते होंगे। लेनिन की जीवनी पढ़ने के बाद अब में रूस, वोल्गा और साइबेरिया की विषमता समझने लगा था। लेनिन की जीवनी मुझे अच्छी लगी। वो मास्को के रादूका प्रकाशन से 1991 में आखिरी प्रति के रूप में मेरे पास सुरक्षित थी। 1991 में रूस विघटन के बाद रादूका पब्लिकेशन भी इतिहास में कहीं गुम हो गया। उस किताब में लेनिन की जीवनी का आखिर तीसरा सेक्शन ‘इंजन नंबर 293’ उव वक्त का जीवंत अहसास कराता था। किताब का ये अंतिम हिस्सा लेनिन की मृत्यु के बाद उनके शव को रूस के विभिन्न कस्बों मसलन, लेनिन ग्राड से घुमाते हुए क्रेमलिन, सेवास्तपोल, जेलेनोग्राड होते हुए मॉस्को तक लेकर जाने पर लिखा गया था। इस दौरान रशियन, साइबेरियन, स्लॉग, भोमास लोग ट्रेन के आगे लेट जाते और रोते। ट्रेन का ड्राइवर नूरागोर्वोचोव भी रोते हुए नीचे उतरता और लोगों का आहवान करता कि, ‘रूस के मेरे कॉमरेड साथियों, मैंने महान नेता और अध्यापक कामरेड लेनिन से कभी वादा किया था कि वक्त पर मुसाफिरों को गंतव्य तक पहुंचाउंगा। कभी देर नहीं करूंगा। आज वो खुद ट्रेन में अंतिम सफर कर रहे हैं। कृपया, मुझे मेरी ड्यूटी करने दें। उसके बाद ड्राइवर फिर रोने लगता और ट्रेन के इंजन पर चढ़ जाता।
बहरहाल, लेनिन की जीवनी पढ़ने के बाद अब पिताजी की वो अलमारी में रखी किताबें मुझे कुछ अपनी सी लगने लगी। एक हफ्ते लेनिन की जीवनी पढ़ने के बाद मेने दूसरी किताब निकाली। ये काफी मोटी किताब थी। लेकिन पहले जितना में लेनिन की किताब को निकालने से घबरा रहा था, अब मुझे वैसी खबराहट नहीं हो रही थी। मैं आश्वस्त था कि कुछ ठीक ही किताब होगी। ये किताब चीन क्रांति के सालों के जनाआंदोलन पर थी। इसका शीषर्क था ‘चीनी संघर्ष से जनमुक्ति संघर्ष तक’। अब ये किताब गार्गी प्रकाशन प्रकाशित करती है। मेरी समझ से उस समय इसके हीरो थे माओ त्से तुंग थे।
चीन से ही माओवाद की शुरूआत हुई थी। माओ भी कम्यूनिट थे और रूस की क्रांति से प्रभावित थे। ये किताब लेनिन की जीवनी से दुगनी मोटी थी, लेकिन इसको मैंने महज चार दिन में समाप्त कर दिया। इस किताब को पढ़कर मंै द्धितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और रूस के बीच कई दशकों तक चले कोल्ड वॉर की बुनियादी कारणों से भी मुखातिब हुआ। इस उम्र के हिसाब से मैं ज्यादा तो नहीं समझ सका, लेकिन इतना जान गया कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक गरीब और दूसरे अमीर। इन दो तरह के लोगों के बीच ही प्रागेतिहासिक काल से लड़ाई होती आई है। उसके बाद मेने वियेतनाम युद्ध, हो-चीन्ह-मीं, क्यूबा क्रांति के फिदेल कास्त्रो, चे ग्वेरा, हीगल, आदि पढ़ा।
इन किताबों ने मेरे दिलों दिगाम में गहरा असर डाला। मैं पाठ्यक्रम की किताबों से दूर होता गया। पाठ्यक्रमों की किताबों के बीच अक्सर मेने अर्नेस्टो चे ग्वेरा की ‘मोटरसाइकिल डायरीज’ दबा रखी होती। इन किताबों को पढ़कर मेरे जीवन में कई बदलाव आ गये। मैं अक्सर अकेला सोचने लगा। मैं दोस्तों के बीच भी रहता, लेकिन अब मैं दूनिया को केवल एक ही चश्मे से देखने लगा। चश्में का एक लैंस गरीबी दिखाता और दूसरे को अमीर। मैं अब लोगों को वर्ग के तौर पर देखता। अब मेरे लिए मेरे दोस्त राजपूत, ब्राहमण, पिछड़ी जातियां नहीं रह गई थी। लेकिन उनकी हालात जातीवाद और तमाम कर्मकांडों से जुड़ी हुई थी। हालांकि वो सभी मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखते थे। लेकिन नजरिया अब कुछ और बयां करने लगा।
आठवीं के बाद मेरा दाखिला केंद्रीय विद्यालय में हो गया। यहां के टीचर मुझसे खासे परेशान रहे। खासकर हिस्ट्री की टीचर के लिए मैं आजतक शर्मिंदा हूं। अगर वो अध्यापिका कभी इस किताब को पढ़े तो मैं दिल से उनसे माफी मांगता हूं। असल में, दसवीं में तीसरी पाली हिस्ट्री की होती थी। हमारी हिस्ट्री की टीचर एक खूबसूरत नवविवाहिता थी। जो ट्रांसफर होकर साउथ इंडिया से टिहरी आई थी। उन्हें इस बात का दुख भी था, जो वक्त वक्त पर गढ़वाली लोगों के लिए व्यंग्यात्मक टिप्पणी के रूप में निकलता भी रहता । बहरहाल, एक दिन ऐसी ही क्लास चल रही थी। उस समय हमारी स्कूल की प्रिंसिपल भी एक साउथ की टीचर थी। उनकी एजुकेशन क्वालिटी कंट्रोल करने की एक तरकीब थी। वो अक्सर क्लास में छात्रों के पीछे चुपचाप बैठ जाया करती थी। ये देखने के लिए की टीचर कैसे पाठ्यक्रम पढ़ा रही है।
तो क्लास चल रही थी। प्रिंसिपल मेम आई और पीछे बैठ गई। एनसीआरटी की हिस्ट्री की किताब में तीसरा पाठ रूस की क्रांति ही थी। उस नवविवाहिता टीचर को इस बात का पूरा अंदेशा था कि कोई भी छात्र रूस के इतिहास से वाकिफ नहीं होगा। मैम ने केरल मूल की महिला प्रिंसिपल सीसी रॉव मैथ्यू को प्रभावित करने के लिए किताब एक तरफ रख दी और क्रांति के बारे में पढ़ाने लगी। वो बताने लगी कि कैसे थॉमस लेनिन ने रूस में क्रांति की। वो पढ़ा रही थी कि कैसे 11 मई 1910 को जार निकोलश द्वितीय ने खूनी रविवार की घटना को अंजाम दिया। तकरीबन 20 मिनट तक सुनने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और मेने हाथ ऊपर उठा कर कुछ अर्ज करने की आज्ञा मांगी। मैम ने दे दी।
आज्ञा मिलते ही मैंने कहा, मैम वो थॉमस लेनिन नहीं हैं। थॉमस नाम रशियन नस्लों के नहीं रखी जाती। लेनिन का पूरा नाम ‘वाल्दमीर इलियच उल्यानोव लेनिन है’ और मेम एक बात और। ब्लडी संडे या खूनी रविवार 11 मई को नहीं, बल्कि रशियन कलेंडर के हिसाब से 22 जनवरी 1905 को हुआ था। मेम को काटो तो खून नहीं। उसके बाद प्रिंसिपल सीट से उठ गई और जाते हुए मेम को अपने आफिस में आने को कहा। अगले दिन से कोई बुजुर्ग शिक्षक हमे हिस्ट्री पढ़ाने आये। दसवीं करने के दौरान ही टिहरी में अंतिम सुरंगों टी-3 और टी-4 के शटर भी गिरा दिये गए।
हम अक्सर किसी ऊंची चट्टान पर आकर अपनी टिहरी को डूबते हुए देखते। कभी मुंह छुपाकर रोते तो कभी किस्सा कहानी सुनाते। लेकिन एक दिन टिहरी पूरी डूब गई। बस रह गया घंटाधर का ऊपरी कुछ हिस्सा। जो शायद डूबते हुए रो रहा हो। जैसे कोई बिछड़ने पर रोता है या अंतिम सांस गिनता हुआ कोई मरीज बिस्तर पर अपने परिजनों को देखता हुआ। भिलंगना फिर कभी टिहरी में नहीं दिखी। कभी देखी भी नहीं जाएगी। कोई गुंजाइस नहीं अब। अब वो बहुत किलोमीटर ऊपर घनसाली की तरफ दिखती है। लेकिन वहां उसके किनारे टिहरी नहीं है। आजाद मैदान नहीं है। हमारी साइकिले नहीं है। साम्य भी नहीं है। एक जीवंत सभ्यता भी नहीं है।
- मनमीत,देहरादून निवासी,हिदुस्तान अखबार में कार्यरत