एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

सिनेमा : तेरे बग़ैर ज़िंदगी उजड़ी हुई बयार है



"...जयदेव की ज़िंदगी में बड़ा ब्रेक आया देवानंद की 'हम दोनों' (1961) से। सारे गाने सुपर हिट। जहां में ऐसा कौन है जिसको ग़म मिला नहीं...मैं हर शोक को हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया...लेकिन सबसे सुपर रहा, अल्लाह तेरो नाम...लता जी ने इसे बड़ी शिद्दत से गाया और बरसों तक अपने बेस्ट गाये गीतों में गिनती रहीं। 'हम दोनों' के गीत जयदेव के पुराने दोस्त साहिर ने लिखे थे।"

जयदेव, एक खामोश संगीत साधक 
तेरे बग़ैर ज़िंदगी उजड़ी हुई बयार है...जब ग़मे इश्क सताता है तो जी लेता हूँ...अभी न जाओ छोड़ कर...कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया...जहाँ में ऐसा कौन है जिसको ग़म मिला नहीं...अल्लाह तेरो नाम...हर शोक को हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...जैसे सूरज की गर्मी में जलते हुए तन को...ये दिल और उनकी निगाहों के साये...सीने में जलन आँखों में तूफां सा क्यों है...तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूँ...रात भी है कुछ भीगी भीगी...नदी नारे न जाओ शाम पइयाँ पडूँ...अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन आज़ाद है...दो दीवाने शहर में...एक अकेला इस शहर में...तू चंदा मैं चांदनी...आपकी याद आती रही रात भर...कहना एक दीवानी तेरी याद में आहें भरता है...सुरमई रात है सुबह का इंतज़ार कौन करे...शायद ही कोई संगीत प्रेमी हो जिसने ये गाने न सुने हों। इन गानों का यादगार संगीत जयदेव वर्मा ने तैयार किया था। कभी खुद जयदेव ने भी कल्पना नहीं की होगी कि वो ऐसी कालजई रचनाएं रचेंगे। संगीत के ज्ञान के नाम पर उनके पास सिर्फ़ एक गिफ्टेड माउथ ऑर्गन था जिसे बजाना उन्होंने खुद ही सीखा था। 

1930 में मां की मृत्यु के बाद जयदेव 1932 में चौदह साल की उम्र में लुधियाना से भाग कर बंबई भाग आये थे। उन्होंने सपना देखा था, हीरो बनने। सोचा था, ट्रेन से जैसे ही बाहर निकलूंगा तो प्लेटफॉर्म पर सुलोचना रिसीव करने के लिए खड़ी होंगी जो उन्हें लम्बी कार में बैठा कर अपने हवेलीनुमा घर ले जाएंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जिस्म पर एक जोड़ी कपड़ा, जेब में तीस आने की रकम और पैर को काटता हुआ नया जूता। आख़िर कितने दिन कटते? लेकिन संयोग कुछ ऐसा बना कि उन्हें वहां उनकी चाची मिलीं और फिर नैरोबी से लौट रहे पिता भी। उन्हें समझा-बुझा कर लुधियाने वापस लाया गया। उस्ताद बरकत राय से संगीत सिखने लगे। मगर मन से वो बम्बई में रहे। परिणाम, कुछ महीनों बाद वो फिर बम्बई की ख़ाक छानने लगे। इस बार उन्हें कुछ सफलता भी हासिल हुई। जीबीएच वाडिया की 'वामन अवतार' हंटरवाली, मिस फ्रंटियर मेल आदि कुछ स्टंट फिल्मों में काम किया। ये दौर ही पौराणिक और स्टंट फिल्मों का था। 

मगर कुछ साल बाद जयदेव को फिर लुधियाना वापस जाना पड़ा। उनके पिता को दिखना बंद हो गया था। वो पिता की सेवा में जुट गए। उन्हें हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू अख़बार पढ़ कर सुनाने लगे। जब कभी वो ग़लत उच्चारण करते या मतलब ग़लत बताते तो पिता जी उन्हें दुरुस्त करते और इसी बहाने उन्होंने तीनों भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इसी दौर में उनकी भेंट साहिर लुध्यानवी से हुई। दोनों अच्छे मित्र बन गए। तभी पिता की मृत्यु हो गयी। जयदेव के जीवन में सूनापन आ गया। इसे भरने के लिए वो अल्मोड़ा चले आये, उदय शंकर कल्चरल सेंटर ज्वाइन कर लिया, जहाँ उन्होंने सरोद मास्टर अल्लाउद्दीन खां के सानिध्य में संगीत की विवधताओं के बारे में ज्ञान हासिल करना शुरू किया। लेकिन जयदेव का मन यहां से जल्दी ही उचट गया, जिस लक्ष्य की प्राप्ति की आकांक्षा थी, वो यहाँ पूरी होती नहीं दिखी। कुछ लोगों से विवाद भी हुआ। वो अल्मोड़ा छोड़ लखनऊ आ गए, अल्लाउद्दीन खां के बेटे अली अकबर खां के पास। उनके साथ लखनऊ रेडियो स्टेशन पर काम करने लगे। 

एक दिन अली अकबर खां साहब को बम्बई से चेतन आनंद का संदेसा आया, आईये और 'आंधियां' फिल्म का म्युज़िक कंपोज़ करें। जयदेव भी उनके साथ बम्बई आ गए। मगर अफ़सोस कि 'आंधियां' (1952) फ्लॉप हुई और अगली फिल्म 'हमसफ़र' भी। खां साहब निराश होकर लौट गए। लेकिन जयदेव बम्बई में ही रहे। सचिन देव बर्मन के असिस्टेंट बन गए। उनके साथ कई फ़िल्में कीं। 'चलती का नाम गाड़ी'(1958) में जयदेव और राहुल देव बर्मन दोनों ही बर्मन दा के असिस्टेंट थे। चेतन आनंद ने जयदेव को भी पहला स्वतंत्र असाइनमेंट दिया, 'जोरू का भाई' जो फ्लॉप हो गई। लेकिन लता जी के स्वर में ये गाना ज़रूर कानों को भला लगा, सुबह का इंतज़ार कौन करे...

जयदेव की ज़िंदगी में बड़ा ब्रेक आया देवानंद की 'हम दोनों' (1961) से। सारे गाने सुपर हिट। जहां में ऐसा कौन है जिसको ग़म मिला नहीं...मैं हर शोक को हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया...लेकिन सबसे सुपर रहा, अल्लाह तेरो नाम...लता जी ने इसे बड़ी शिद्दत से गाया और बरसों तक अपने बेस्ट गाये गीतों में गिनती रहीं। 'हम दोनों' के गीत जयदेव के पुराने दोस्त साहिर ने लिखे थे। हालांकि उनकी पुनः भेंट 'जोरू का भाई' में हो चुकी थी। तब तक साहिर बड़ा नाम हो चुके थे। लेकिन दोनों में पटरी नहीं खाई। बताते हैं कि बी.आर.चोपड़ा ने 'साधना' (1958) के लिए पहले जयदेव से बात की, संगीत पर लम्बा विमर्श भी किया। मगर साहिर ने बात बिगाड़ दी। 'हम दोनों' में फिर मुलाक़ात हुई। गिले-शिकवे दूर हुए। मगर दिल मिले नहीं। 1963 में सुनील दत्त की 'मुझे जीने दो' जयदेव और साहिर का फिर मिलन हुआ। लेकिन दिल की दूरियां बढ़ती ही गयीं। 

एक स्टेज ऐसी आई कि दत्त साहब ने जयदेव को अलग करने का मंसूबा बना ही लिया था कि बीच में नरगिस जी ने आकर हालात को बिगड़ने से बचा लिया। इसके सारे गाने सुपर हिट हुए। तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूँ... रात भी है कुछ भीगी भीगी...अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन आज़ाद है...लेकिन साहिर से जयदेव का हमेशा के लिए अलगाव हो गया। दोनों में अनबन का सही-सही कारण तो पता नहीं, लेकिन साहिर कहते थे, अगर अच्छे गाने न हों तो संगीत कुछ नहीं कर सकता। इसी कारण से साहिर का 'प्यासा' में संगीतकार एस.डी.बर्मन से टकराव हुआ था। बर्मन दा बोले थे, गानों की चर्चा ज़्यादा हो रही है, संगीत को अपेक्षित भाव नहीं मिल रहा है। बर्मन दा ने दोबारा साहिर के साथ काम नहीं किया। जयदेव ने कहा, मैं साहिर के योगदान को भुला नहीं सकता, लेकिन ये बात भी नहीं कि उन्होंने मुझे नुक्सान ज़्यादा पहुँचाया। हो सकता है इस अनबन से साहिर, एस.डी. बर्मन और जयदेव को कोई फ़र्क न पड़ा हो, लेकिन अच्छा गीत-संगीत सुनने वालों को नुक्सान ज़रूर हुआ। 

'मुझे जीने दो' के दौरान एक गाने के सिलसिले में सुनील दत्त और जयदेव में ठन गयी। जयदेव ने कहा, डाकू लोग न फ़िराक को जानते हैं और न साहिर को, उन्हें लोकगीत और संगीत ज़रूर अच्छा लगता है। तब जयदेव ने इन लोकगीतों पर मधुर धुनें कम्पोज़ की थीं, नदी नारे न जाऊं श्याम पैंयां पडूँ...मोहे पीहर में मत छेड़ बालमवा....सुनील दत्त ने जब 1971 में 'रेश्मा और शेरा' बनाने का मंसूबा बनाया तो उन्हें फिर जयदेव की याद आई। जयदेव को शिकायत रही जब किसी को कम बजट में फिल्म बनानी होती है तो जयदेव की याद आती है। चाहे दत्त रहे हों या ख्वाजा अहमद अब्बास या फिर अमोल पालेकर। बहरहाल, जयदेव ने मन लगा 'रेश्मा और शेरा' की धुनें तैयार कीं, तू चंदा मैं चांदनी... और इसके लिए उनको बेस्ट म्युज़िक का नेशनल अवार्ड मिला। उन्हें आगे चल कर मुज़फ्फ़र अली की 'गमन' के लिए भी नेशनल अवार्ड मिला। 'सीने में जलन आखों में तूफां सा क्यों है...आपकी याद आती रहे रात भर, चश्मे नम मुस्कुराती रही रात भर...

मगर अफ़सोस जब मुज़फ्फ़र 'उमराव जान' बनाने लगे तो जयदेव को छोड़ ख़य्याम को ले आये। मगर जयदेव को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। वो बद्दस्तूर संगीत साधना में लगे रहे। उन्होंने हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला', दिनकर की 'उर्वशी' के एल्बम में संगीत दिया और ग़ालिब, जिगर और फ़िराक की ग़ज़लों और नज़्मों के एल्बम में भी संगीत दिया। अमोल पालेकर की 'अनकही' (1981) के उम्दा संगीत के लिए जयदेव को तीसरी बार नेशनल अवार्ड मिला। उनके इस रिकॉर्ड को कई साल बाद ए.आर.रहमान ने तोड़ा। उन्होंने कुल 41 फिल्मों में संगीत पिरोया। यादगार फ़िल्में रहीं, जोरू का भाई, समुद्री डाकू, हम दोनों, किनारे किनारे, मुझे जीने दो, माइतीघर घर(नेपाली में), हमारे ग़म से मत खेलो, जीयो और जीने दो, आषाढ़ का एक दिन, दो बूँद पानी, फासले, एक थी रीता, रेश्मा और शेरा, प्रेम पर्वत, परिणय, आलाप, घरौंदा, दूरियां, गमन, रामनगरी, अनकही, त्रिकोण को चौथा कोण और आतिश। उन्होंने कभी खुद को रिपीट नहीं किया। हर बार नई और विविध धुनें दीं। 
3 अगस्त 1918 को नैरोबी में जन्मे जयदेव ने शादी नहीं की, संगीत ही उनकी संगनी रही। उनके नज़दीकी रिश्तेदार लंदन में रहे और जयदेव यहाँ बम्बई में एक कमरे के अपार्टमेंट में संगीत साधना करते रहे, उससे पैसा नहीं कमाया। इसीलिए फक्कड़ रहे। बोरिया-बिस्तर बांध कर पलंग के नीचे रखे रहते थे, जाने कब मकान मालिक फ्लैट खाली कराने आ जाए। 6 जनवरी 1987 को उन्हें खून की उल्टियां होने लगीं। अस्पताल में भर्ती कराये गए, मगर तीन दिन बाद दम तोड़ दिया। संगीत साधना में लीन एक अकेला और खामोश सितारा अनंत में गुम हो गया। 
- वीर विनोद छाबड़ा