राहुल गाँधी ने कोर्ट में बयान दिया है कि चुनावी उत्तेजना में उन्होंने 'चौकीदार चोर है' बोल दिया था...
सिर्फ आज की ही घटना को ही क्यों लें ! अगर राहुल गाँधी को समग्रता से देखें तो पाएंगे कि वो रैलियों के लिए ना तो कुछ नया कर रहे हैं और ना ही कह रहे हैं। 'चौकीदार' एक पेशा है - आपके नारे देश के एक कामकाजी वर्ग के विरोध में कैसे हो सकते हैं। 'चौकीदार चोर है' ना केवल नकारात्मक नारा है बल्कि किसी पेशे के लिए बेहद अपमानजनक भी है।
ऐसी पार्टी जिसने मौलाना आज़ाद को 35 साल की उम्र में अध्यक्ष चुन लिया था। नेहरू जी 40 साल की उम्र में जिस पार्टी के अध्यक्ष बन गए। वही कांग्रेस जिसने सुभाष चंद्र बोस समेत दादा भाई नौरोजी, सरदार पटेल, गोपाल कृष्ण गोखले, महात्मा गाँधी, जेबी कृपलानी, के. कामराज और इंदिरा गांधी जैसे दिग्गज अध्यक्ष देखे हैं। उसी पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष लंदन में डोकलाम मुद्दे पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहते हैं कि 'मुझे मुद्दे की पूरी जानकारी नही।' और ऐसा तब था कि जब राहुल गाँधी लोकसभा में उस समय एक्सटर्नल अफेयर्स की स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य थे।
एक राजनेता के तौर पर सबसे खराब स्थिति क्या होती है - जब किसी को ये कहना पड़े की इस मुद्दे की उसको जानकारी नही है और मुद्दा भी कोई फौरी नही बल्कि ऐसा मुद्दा जिसको वो व्यक्ति लोकसभा के अपने भाषणों में इस्तेमाल करता हो। ऐसी स्थिति ना केवल उस राजनेता की बेहद कमजोर सामाजिक सहभागिता को दिखाती है बल्कि ये भी समझ मे आता है की वो व्यक्ति टी.वी. या न्यूज़ पेपर्स के आर्टिकल्स से कितना दूर रहते हैं।
ऐसा राहुल गाँधी के साथ पहली बार नही हुआ है। इसके पहले भी वो NCC के विषय मे भी पूछे गए एक सवाल के जवाब में ठीक ऐसा ही बोल चुके हैं। अगर आप देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और बावजूद इसके आप देश की विदेश नीति के एक बड़े पड़ाव से अनिभिज्ञ हैं, तो आप शौक़िया और अध्ययन से कोसो दूर रहने वाले राजनेता नजर आते हैं।
अगर राहुल गाँधी जी को अपने ऊपर किये जाने वाले तंज और 'पप्पू' नाम पता है लेकिन NCC और डोकलाम के मुद्दे नही पता, रैलियों में बोले गए जुमलों के साइड इफेक्ट नही पता तो इससे उनकी प्राथमिकताएं, दोस्त और विमर्श के विषय जाहिर होते हैं। वो पार्टी जिसने लाला लाजपत राय को उनके अध्यक्ष पद पर रहते हुए सस्पेंड किया था, वही कांग्रेस जिसके अध्यक्ष पद से सुभाष चंद्र बोस ने इस्तीफ़ा दे दिया था उसी कांग्रेस के पास आज अगर ऐसा अध्यक्ष है.
जिसने तमाम अवसरों के बाद भी कभी मंत्रिमंडल में कोई जिम्मेदारी नही उठायी, एक अध्यक्ष जिसे लोकसभा पहुँचने के लिए अपनी परंपरागत सीट के अलावा भी एक और सीट पर लड़ने की आवश्यकता है, एक अध्यक्ष जो मीडिया इंटरव्यू से कोसो दूर हो, एक अध्यक्ष जिसकी भाषण शैली में अनगिनत कमियाँ हैं, एक अध्यक्ष जिसके पास वो समर्थ चेहरा ही नही जिससे क्षेत्रीय दल उनके नीचे इकट्ठा हो सके और एक अध्यक्ष, जो लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने की जिम्मेदारी तक उठाने में कतराता हो और बावजूद इसके अगर वो प्रधानमंत्री बनने का विपक्षी चेहरा का सबसे बड़ा दावेदार हो तो पार्टी को खुद को चेक करना चाहिए की गलती कहाँ हो रही है।
- डॉ रूद्र प्रताप दुबे,राजनीतिक एक्सपर्ट