एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

22 अप्रैल : 'पृथ्वी दिवस' का संदेश !



हमारी यह पृथ्वी संभवतः ब्रह्मांड की सबसे सुन्दर रचना है। यहां अथाह सौन्दर्य भी है, विविधताओं से भरा जीवन भी और जीवन के पैदा तथा विकसित होने की सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियां भी। हम और हमारा विज्ञान कितनी भी तरक्की कर ले,पृथ्वी से बेहतर एक ग्रह की रचना नहीं कर सकता। आप पर्वतों-सी विशालता, समुद्र-सी गंभीरता, नदियों-सी पावनता, झरनों सा कोई तिलिस्म गढ़ सकेंगे ? आप एक पेड़ से सुन्दर कोई कविता लिख सकते हैं ?
हवा की सरसराहट-सा कोई संगीत सुना हैं आपने ? आप एक फूल से बेहतर प्रेम पत्र की कल्पना कर सकते हैं ? दुनिया की कोई भी मशीन शीतलता का वह एहसास दे सकती है जो बदन पर गिरी बारिश की बूंदें छोड़ जाती हैं ? आपके सारे धर्म और दर्शन मिलकर एक बच्चे की मासूमियत को जन्म दे पाएंगे ? पृथ्वी और उसकी प्रकृति के रूप में ईश्वर ने ख़ुद को अभिव्यक्त किया है। पृथ्वी पर जो भी वीभत्स, गंदा, अवांछित है वह हमारी देन है।
अपने स्वार्थों के लिए और विकास के नाम पर हम जिस तरह अपनी पृथ्वी और प्रकृति का दोहन कर रहे हैं, उससे वह अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से दो-चार है। जल के तमाम स्रोत सूख भी रहे हैं और गंदे भी हो रहे हैं। हवा में जहर घुल रहा है। वृक्ष गायब हो रहे हैं। पक्षी विलुप्त हो रहे हैं। ज़मीन बंजर हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग का दैत्य मुंह बांए सामने खड़ा है। क्या हम अपने बाद एक ऐसी प्रदूषित, बंजर, बदसूरत पृथ्वी छोड़कर जाना चाहेंगे जहां हमारे बच्चें दो बूंद पानी और ताज़ा हवा के एक झोंके के लिए भी तरस जाएं ?

ध्रुब गुप्त साहब,पूर्व आईपीएस अधिकारी,देशभर में मशहूर लेखक