एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

विश्लेषण : 23 मई को तय होगा हरीश रावत का भविष्य



उम्मीद थी कि देवभूमि में मतदान का आंकड़ा 65के पार पहुंचेगा, मगर उत्तराखंड की पांचों सीटों पर कुल मतदान मात्र 61.50 फीसदी पर ही सिमट कर रह गया । मतदान प्रतिशत से यह तो साफ है कि माहौल न बहुत मोदी के पक्ष में ही रहा और न बहुत विरोध में । अब रहा सवाल नतीजों का ? उत्तराखंड में नतीजा एकतरफा भाजपा के पक्ष में नहीं भी रहा, तो भी इतना तय है कि बढ़त पर भाजपा ही होगी । कारण साफ है, कांग्रेस एक संगठन के तौर पर तो मैदान में थी ही नहीं । प्रदेश में नाम भर की कांग्रेस जिन दो नेताओं के बीच झूल रही है, वह दोनो ही चुनाव मैदान में थे। कममतदान प्रतिशत से घबराहट तो भाजपा के खेमे में भी है लेकिन बेचैनी कांग्रेसी दिग्गजों हरीश रावत और प्रीतम सिंह को ज्यादा है । होगी भी क्यों नहीं ? उत्तराखंड में कांग्रेस के पूरे प्रदर्शन का दारोमदार इन दोनो पर टिका है । इनकी हार जीत से ही राज्य में कांग्रेस का भविष्य भी जुड़ा है ।
उत्तराखंड में लोकसभा चुनाव के नतीजे राज्य में भाजपा के गणित के लिए तब बहुत मायने नहीं रखते, जब तक कि बड़ा फेरबदल न हो जाए। लेकिन कांग्रेस के भविष्य के लिए इस चुनाव के नतीजे बेहद अहम हैं । दरअसल मौजूदा समय में उत्तराखंड में कांग्रेस की वोट में हिस्सेदारी 34 फीसदी से भी नीचे आ गयी है , जबकि भाजपा की हिस्सेदारी 55 फीसदी पार कर चुकी है । यह सही है कि भाजपा मजबूत है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भाजपा इसलिए ज्यादा मजबूत नजर आती है क्योंकि कांग्रेस मरणासन्न है । पिछले कुछ चुनाव में तो कांग्रेस का कैडर वोट भी घटा है । यह सच्चाई है कप्रदेश में कांग्रेस धरातल पर कहीं है ही नहीं । पार्टी में अब सिर्फ नेता ही नेता हैं कार्यकर्ता कोई है ही नहीं । प्रमाण सामने हैं इस बार चुनाव में दर्जनों बूथ ऐसे रहे जहां कांग्रेस को बस्ता सजाने वाला एक कार्यकर्ता भी नहीं मिला । आखिर मिलता भी कैसे ? जो बची कुची कांग्रेस है वह नेताओं में बंटी हुई है, हर कोई इसे अपनी जेबी पार्टी बनाने की फिराक में है ।
आम कार्यकर्ता की पूछ तो पार्टी में तब होती जब नेता अपने पुत्र, पुत्री, भाई और अन्य परिजनों नातेदारों के मोह और गुटबाजी से बाहर निकलते । राज्य बने बीस साल होने को है, मगर प्रदेश कांग्रेस की मुख्य धारा में कोई नया नेतृत्व नहीं उभर पाया । ऐसा नहीं है कि नयी पीढ़ी में नेतृत्व की संभावना और कांग्रेस की स्वीकार्यता नहीं है। संभावनाएं पूरी है लेकिन उन्हें आगे आगे आने ही नहीं दिया जाता । गिनती के उन्हीं चार नेताओं के बीच कांग्रेस की सियासत घूम रही है । हर किसी की नजर सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है और हर कोई एक दूसरे को ठिकाने लगाने की फिराक में हैं । इन नेताओं को प्रदेश की तो छोड़िये पार्टी संगठन तक की परवाह नहीं है, परवाह है तो सिर्फ अपने राजनीतिक अस्तित्व की । नेताओं की महत्वाकांक्षा, पद और कुर्सी की जंग, गुटबाजी और आपसी अंतर्कलह और राज्य के मुद्दों के प्रति उदासीनता ने कांग्रेस को हाशिए पर पहुंचा दिया है ।
इस चुनाव में भी कांग्रेस के लिए डगर बहुत कठिन थी । भाजपा के बड़े वोट बैंक के बावजूद पांचों सीटों पर कांग्रेस के लिए भरपूर संभावनाएं थी,बशर्ते कांग्रेस पूरी योजना के साथ एकजुट होकर चुनाव लड़ती । चलिये टिहरी से शुरू करते हैं, जहां कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह खुद मैदान में रहे । भाजपा का यहां पिछले चुनाव में 33 फीसदी तो कांग्रेस का 18 फीसदी वोट रहा है,दिलचस्प यह कि 49 फीसदी वोट यहां ऐसा है जो बड़ा उलटफेर कर सकता है । प्रीतम सिंह और उनके रणनीतिकारों ने अगर इस पर फोकस किया है तो जीत निश्चित होगी। खुद भाजपा ने 2014में इसी बिखरे वोट में सेंध लगायी। उस वक्त 60फीसदी वोट बिखरा हुआ था । टिहरी सीट पर भाजपा उम्मीदवार रानी राजलक्ष्मी से नाराजगी के चलते इस बार भाजपा का वोट बैंक बढ़ने की संभावना कतई नहीं है । मगर कांग्रेस की यहांजीत सिर्फ इस पर निर्भर करती है कि 49 फीसदी बिखरे वोटरों में से कांग्रेस कितना खींच पायी।

पौड़ी, यह सीट भाजपा की मजबूत सीट मानी गयी है । भाजपा से भुवन चंद खंडूरी को इस सीट पर अजेय माना जाता है । शायद यही कारण रहा कि कांग्रेस ने इस सीट पर आश्चर्यजनक तरीके से मनीष खंडूरी को उम्मीदवार बनाया । मनीष खंडूरी को उम्मीदवार तो बनाया लेकिन किस भरोसे? क्या सिर्फ इस भरोसे कि वह भुवन चंद्र खंडूरी के सुपुत्र हैं ? पौड़ी सीट भुवन चंद्र खंडूरी की कोई जागीर तो नहीं है । माना मतदाता मूर्ख है, मगर इतना मूर्ख भी नहीं कि ऐसे हल्के दांव भी न समझे । इस सीट पर ऐसे उम्मीवार की जरूरत थी जो यहां के सियासी समीकरणों से अच्छे से वाकिफ हो ।

ऐसा नहीं है कि संभावनाएं नहीं थीं पौड़ी में, यहां 51 फीसदी मतदाता भाजपा और कांग्रेस से छिटका हुआ है ।यहां भाजपा का वोट प्रतिशत 32 फीसदी तो कांग्रेस का मात्र 17फीसदी है । दिलचस्प यह है कि फेरबदल की संभावनाएं इस सीट पर भी पूरी थी । कांग्रेस भुवन चंद्र खंडूरी के मैदान में न होने की स्थिति में मजबूत कांग्रेसी नेता को मैदान में उतार कर 51 फीसदी बिखरे वोटर पर फोकस कर सकती थी ।
आते हैं हरिद्वार सीट पर, 2004 में इस सीट पर कांग्रेस का कोई पता नहीं था । उस वक्त यहां 17 फीसदी वोट हासिल कर विजयी रही जबकि 13 फीसदी वोट लेकर बसपा दूसरे स्थान पर रही, भाजपा का वोट तब 12 फीसदी था । वक्त बदला और 2009 में कांग्रेस 25 फीसदी वोट हासिल कर हरिद्वार सीट जीत गयी । बसपा और सपा हाशिए पर पहुंच गयीं और मुकाबले में भाजपा अकेले रह गयी । इसके बाद 2014 की मोदी लहर में भाजपा ने अपना वोट प्रतिशत 36 फीसदी तक पहुंचाकर बड़ी जीत दर्ज कर ली।

खास बात यह रही कि कांग्रेस सीट जरूर हारी लेकिन उसका 25फीसदी वोट जस का तस रहा । ऐसा नहीं है कि हरिद्वार में कांग्रेस के लिए इस बार संभावनाएं नहीं थीं । तकरीबन 40 फीसदी के करीब जो वोट भाजपा कांग्रेस की पहुंच में नहीं था, कांग्रेस के लिए उसमें काफी उम्मीदें थी । यह वोट बैंकहरिद्वार में किसी भी बड़े फेरबदल की स्थिति में है । इस बार देखना यही होगा कि इस वोटर का रुख क्या रहा ?
अल्मोड़ा, फेरबदल की संभावनाएं आंकड़ों के लिहाज से यहां सबसे अधिक थी । इस आरक्षित भाजपा और कांग्रेस का अंतर भी बहुत ज्यादा नहीं है । दरअसल इस सीट पर भाजपा को वोट प्रतिशत 2014 से पहले मात्र 17 फीसदी था, लेकिन इस चुनाव में भाजपा ने उस 64 फीसदी वोट पर सेंध लगायी जो भाजपा कांग्रेस से इतर बिखरा हुआ था । मोदी लहर में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़कर 27 हो गया और कांग्रेस का वोट प्रतिशत 20 फीसदी ही रहा । अभी इस सीट पर 53 फीसदी वोट ऐसा है जिसमें सेंध लगायी जा सकती थी । भाजपा के उम्मीदवार अजय टम्टा के खिलाफ यहां नाराजगी कांग्रेस के लिए और मददगार सबित हो सकती थी, बशर्ते कांग्रेस ने रणनीतिक तरीके से काम किया होता । देखना होगा यहां पर कांग्रेस की ओर से प्रदीप टम्टा का प्रदर्शन कैसा रहता है ।
अंत में बात नैनीताल की, वोटों के समीकरण के लिहाज से नैनीताल कांग्रेस के मिजाज की मानी जाती रही है । लेकिन पिछले चुनाव में भाजपा ने इस सीट पर सबसे बड़े अंतर से जीती दर्ज की थी। भाजपा का वोट 39 फीसदी वोट और कांग्रेस का 21 फीसदी रहा । यह माना जाता है किपिछले चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत का कारण मोदी फेक्टर के साथ ही इस सीट पर भाजपा का बड़ा चेहरा भगत सिंह कोश्यारी का होना भी रहा है ।
भगत दा अब मैदान में नहीं है, उनकी जगह अजय भट्ट को उम्मीदवार बनाया गया। कांग्रेस के लिए यह फायदेमंद माना जा रहा है । हरीश रावत का नैनीताल सीट से मैदान में उतरने का निर्णय भी उन्हीं परिस्थतियों में हुआ तब भगत दा को भाजपा ने मैदान में नहीं उतारा । हालांकि मोदी लहर के भरोसे सीधी गणित में भाजपा यह मान रही है कि इस सीट पर 2 लाख 80 हजार का अंतर कम हो सकता है, लेकिन जीत प्रभावित नहीं होगी । मगर आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो इस सीट पर तकरीबन 40 फीसदी वोट ऐसा है जो जीत हार के समीकरणों को नए सिरे से तय कर सकता है । यह वह वोट है जो कभी कांग्रेस से छिटका हुआ है ।
गौर कीजिये, 2004 में इस सीट पर कांग्रेस का वोट प्रतिशत 45 फीसदी था और भाजपा का वोट था 37 फीसदी । इसके बाद2009 में भी इस सीट पर कांग्रेस का वोट थोड़ा घटकर 43 फीसदी हो गया, लेकिन सीट कांग्रेस के पास ही रही ।
ऐसा नहीं था कि अकेले कांग्रेस का वोट घटा,भाजपा का वोट भी घटकर 30फीसदी हो गया था । अब बात 2014 की जब मोदी नाम की आंधी चली तो इस सीट पर भाजपा का वोट 39 फीसदी रहा यानी 2004 के मुकाबले मात्र दो फीसदी वोट बढ़ा और सीट बड़े अंतर से भाजपा की झोली में आ गयी । इस बार कांग्रेस का वोट 43 फीसदी से गिरकर 21 फीसदी रहा गया, यानी 22 फीसदी वोट कम हुआ । सवाल यह उठता है कि कांग्रेस का वोट आखिर कहां गया? क्या 22 फीसदी वोट भाजपा के पाले में चला गया ? नहीं, आंकड़ों से स्पष्ट है कि यह वोट भाजपा के खाते में भी नहीं गया ।
दरअसल कांग्रेस का यह वोट बिखर गया ओर यही कारण है कि इस सीट पर बिखरे वोट का आंकड़ा 40फीसदी तक जा पहुंचा है । जाहिर है इसमें बड़ा वोट कांग्रेस का है, कोई शक नहीं कि हरीश रावत की जीत हार इसी वोट पर निर्भर करती है। अगरटीम हरीश ने इस वोट पर फोकस किया होगा तो यहां कांग्रेस को संजीवनी मिल सकती है ।
बहरहाल संभावनाएं कांग्रेस के लिए खत्म नहीं हुई हैं, बशर्ते कांग्रेस के नेता समय रहते संभल जाएं । नतीजों के बाद देखना यह होगा कि कांग्रेस का ऊंठ किस करवट बैठता है । इस चुनाव की कामयाबी 2022 के लिए राज्य में कांग्रेस का भविष्य और उसके नेताओं का कद भी तय करेगा ।

- योगेश भट्ट,देहरादून निवासी.दिग्गज पत्रकार