एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

आस्था: मर्यादा पुरूषोत्तम राम की विस्मृत बहन !

दुनिया भर में तीन सौ से ज्यादा रामायण प्रचलित हैं। सभी रामायणों की कथाओं में थोड़ी-बहुत भिन्नताएं हैं। इनके अलावा जाने कितनी लोककथाएं भी हैं राम के बारे में। उत्तर भारत में रामचरित मानस के आधार पर ही हम राम-कथा को जानते-मानते हैं। मानस में राम की किसी बहन का कोई उल्लेख नहीं है। बाल्मीकि रामायण में दशरथ की पुत्री शांता का उल्लेख ज़रूर आया है-'अङ्ग राजेन सख्यम् च तस्य राज्ञो भविष्यति। कन्या च अस्य महाभागा शांता नाम भविष्यति।' दक्षिण भारत की रामायण और लोक-कथाओं के अनुसार शांता चारों भाइयों से बहुत बड़ी थीं। वह राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं जो उस युग की रूढ़ियों और अंधविश्वासों का शिकार हो गई। शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्या में भीषण अकाल पड़ा। चिंतित दशरथ को पुरोहितों ने यह सलाह दी कि उनकी अभागी पुत्री ही अकाल का कारण है जिसका त्याग किए बिना प्रजा का कल्याण संभव नहीं। दशरथ ने पुरोहितों की बात मानकर शांता को अपने एक निःसंतान मित्र और अंग के राजा रोमपद को दान कर दिया। रोमपाद की पत्नी वर्षिणी कौशल्या की बहन थी। रोमपाद ने श्रृंगी ऋषि द्वारा अंग राज्य में आयोजित एक सफल यज्ञ से खुश होकर उनके साथ शांता का ब्याह कर दिया।
इधर अयोध्या में दशरथ और उनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित थीं कि पुत्र नहीं होने पर साम्राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा। कुलगुरू वशिष्ठ ने उन्हें सलाह दी कि आप अपने दामाद ऋंगी ऋषि की देखरेख में पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। दशरथ ने यज्ञ में देश के कई महान ऋषियों के साथ ऋंगी ऋषि को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए आमंत्रित किया। अयोध्या में पुनः अकाल पड़ने के भय से उन्होंने अपनी बेटी शांता को नहीं बुलाया। अपनी पत्नी के अपमान से व्यथित श्रृंगी ने जब आमंत्रण अस्वीकार कर दिया तो विवशता में दशरथ को बेटी शांता को भी बुलावा भेजना पड़ा। ऋंगी ऋषि के साथ शांता के अयोध्या पहुंचते ही राज्य में कई सालों बाद भरपूर वर्षा हुई। भावनाओं में डूबती-उतराती शांता जब दशरथ के सामने आई तो दशरथ ने उन्हें पहचाना नहीं। आश्चर्यचकित होकर पूछा - 'देवी, आप कौन हैं ? आपके पांव रखते ही अयोध्या में चारों ओर वसंत छा गया है।' शांता ने अपना परिचय दिया तो पुत्री और माता-पिता की बरसों से सोई स्मृतियां भी जागीं और भावनाओं के कई बांध भी टूटे। यज्ञ के सफल आयोजन के बाद शांता ऋषि श्रृंग के साथ लौट गई।
इस घटना के बाद शांता की अपने माता-पिता, भाईयों और स्वजनों से भेंट का किसी ग्रंथ में कोई उल्लेख नहीं मिलता। कभी-कभी मन में यह सवाल उठता है कि पुत्र-वियोग में प्राण त्यागने वाले दशरथ को कभी अपनी निर्वासित पुत्री और प्राणिमात्र के लिए करुणा से भरे राम को ऋषि श्रृंगी की निर्जन तपोभूमि में बसी अपनी बहन की याद नहीं आई होगी ?
- ध्रुव गुप्त लेखक,पूर्व आइपीएस अधिकारी