एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

सिनेमा : साहेब बीवी और गुलाम के पीछे

जब कभी इंडियन सिनेमा के बेस्ट क्लासिक्स की बात होती है तो गुरूदत्त की 'साहेब बीवी और गुलाम' (1962) का ज़िक्र ज़रूर होता है। इंडियाटाइम्स मूवीज़ की 25 बेस्ट मूवीज़ लिस्ट में भी इसका ज़िक्र है। ऑस्कर अवार्ड की बेस्ट फॉरेन फ़िल्म केटेगरी में भी इसे भेजा गया। 1963 के बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में भी बेस्ट फ़िल्म के लिए नॉमिनेट हुई। देश में इसे बेस्ट हिंदी फीचर का नेशनल अवार्ड मिला। फ़िल्मफ़ेयर ने चार अवार्ड दिए, बेस्ट फिल्म (गुरुदत्त), बेस्ट डायरेक्टर (अबरार अल्वी), बेस्ट सिनेमाटोग्राफर (वीके मूर्ति) और बेस्ट एक्ट्रेस (मीना कुमारी). विमल मित्रा के बांग्ला उपन्यास पर आधारित इसकी कहानी उन्नीसवीं शताब्दी की है जब ब्रिटिश राज में सामंती व्यवस्था फल-फूल रही थी। केंद्र बिंदु थी, छोटे बाबू की पत्नी छोटी बहु यानी मीना कुमारी जो व्यभिचारी और शराबी पति का प्यार पाने के लिए तरसती रहती है और पति का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए खुद भी पीने लगती है। जब पति को लकवा मार जाता है तो अवसाद में पीने लगती है। बीच-बीच में वो हवेली में रहने वाले भोले-भले भूतनाथ (गुरूदत्त) का सहारा भी लेती है। उसका अंत बहुत ख़राब होता है। मझले बाबू उसकी भूतनाथ से संबंधों के शक़ में हत्या करवा देते हैं। वास्तव में छोटी बहु और भूतनाथ के बीच प्लेटॉनिक लव था। 
यों 'साहेब बीवी और गुलाम' मीना कुमारी की आल टाईम बेस्ट परफॉरमेंस के लिए ज़्यादा याद की जाती है। बाज़ क्रिटिक्स का कहना है कि मीना ने अगर सिर्फ़ यही फ़िल्म की होती तो भी अमर हो जातीं। छोटी बहु के किरदार के पीछे एक दिलचस्प किस्सा है। इस किरदार को वहीदा रहमान बड़ी शिद्दत से चाहती थीं। गुरूदत्त की भी यही इच्छा थी। मगर सिनेमाटोग्राफर वी.के.मूर्ति ने कुछ शॉट लेने के बाद मना कर दिया, छोटी बहु के मैच्योर किरदार के लिए वहीदा की उम्र बहुत कम है। तब दृश्य में मीना कुमारी आयीं। मज़े की बात ये है कि वहीदा ने फिर भी काम करने की इच्छा जताई। उन्हें जबा का रोल दिया गया, जिसकी बाद में गुरू यानी भूतनाथ से शादी होती है। गुरू ने उन्हें समझाया भी कि उनका किरदार बहुत छोटा है और टाईटल में मीना के बाद नाम आएगा। मगर इसके बावजूद वो तैयार हो गयीं। वहीदा ने कभी एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने ये फ़िल्म गुरू के प्रति आभार प्रकट करने के लिए की थी, क्योंकि ये गुरू ही थे जिन्होंने उसे 'सीआईडी' (1956) में ब्रेक दिया था। वहीदा से संबंधों को लेकर गुरू की निज़ी ज़िंदगी में बहुत उथल-पुथल थी। उनकी पत्नी गीतादत्त ने फ़िल्म में तीन गाने गाये, मगर वहीदा पर फ़िल्माये गाने 'भंवरा बड़ा नादान है...' के लिए प्लेबैक नहीं दिया। इसे आशा भोंसले ने गाया। 
फ़िल्म की शूटिंग बंगाल स्थित किसी हवेली में हुई थी लेकिन मीना कुमारी वहां नहीं गयीं। बंबई के गुरूदत स्टूडियो में उनके लिए ख़ासतौर पर सेट बनवाया गया। भोले-भाले भूतनाथ के किरदार के लिए सबसे पहली पसंद शशि कपूर थे, मगर वो गुरू से मिलने ढाई घंटे लेट पहुंचे। दूसरी पसंद बिस्वाजीत थे, मगर उन्होंने गुरू के लिए एक्सक्लूसिव कॉन्ट्रैक्ट साइन करने से मना कर दिया। तब ख़ुद गुरू ने इस किरदार को करने का फ़ैसला किया। हालांकि कुछ क्रिटिक का कहना था, इस किरदार के लिए गुरू की उम्र कुछ ज़्यादा थी। 
गुरू ने 'कागज़ के फूल' (1959) की नाक़ामी से मायूस होकर दोबारा डायरेक्शन नहीं देने का अटल फ़ैसला किया था। इसलिए 'चौदहवीं का चाँद' (1960) का डायरेक्टर एम.सादिक़ को और 'साहिब बीवी और ग़ुलाम' का अबरार अल्वी को दिया, जो उनकी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट राइटिंग करते थे। इतनी ख़ूबसूरत फ़िल्म देने पर कुछ ने अल्वी की क़ाबलियत पर शक़ करते हुए उड़ाया कि अल्वी के पीछे गुरू रहते थे। लेकिन इसके एडिटर वाई.जी.चह्वाण, वहीदा और तमाम यूनिट के मेंबर्स ने तस्दीक़ की कि असल डायरेक्टर अल्वी ही थे। शुरू में म्युज़िक का काम एस.डी.बर्मन को सौंपा गया। मगर उनकी ख़राब सेहत के रहते हेमंत कुमार को बुलाया गया। शकील बदायुनी के अर्थपूर्ण गानों को बहुत प्यारी धुनों से सजाया था उन्होंने। कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ...पीया ऐसो जीया में समाये गयो रे...ना जाओ सैंयाँ छुड़ा के बईयां...मेरी जां मेरी जां...भंवरा बड़ा नादान है...साक़िया आज मुझे नींद नहीं आएगी...मेरी बात रही मेरे मन में...और इसके अलावा एक गाना उन्होंने अपनी आवाज़ में भी रिकॉर्ड किया, साहिल की तरफ कश्ती ले चल...बैकग्राउंड में चल रहे इस गाने में मीना को गुरू की गोद में सर रखे दिखाया गया था। लेकिन जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो सभ्य समाज ने हंगामा खड़ा कर दिया, संभ्रांत घराने की शादी-शुदा औरत ग़ैर-मर्द की गोद में भला कैसे सर रख सकती है? गुरू ने पूरा गाना ही स्क्रेप कर दिया। लेकिन हेमंत कुमार ने इसकी धुन बेकार नहीं जाने दी। कुछ साल बाद 'अनुपमा' (1966) में कैफ़ी आज़मी के गाने को ये धुन दी, या दिल की सुनो दुनिया वालों या मुझको अभी चुप रहने दो...जिसे धर्मेंद्र पर फ़िल्माया गया। समाज के एक हिस्से ने छोटी बहु को शराबी दिखाने पर गुरू को लथाड़ा भी था। 
 - वीर विनोद छाबड़ा