युद्ध के मैदान में लड़ने वाले योद्धा होते हैं, समीक्षक नही। समीक्षक तभी बनते हैं जब आप खेल के मैदान से दूर खड़े हों। कुमार विश्वास के साथ दिक्कत ये है कि वो योद्धा और समीक्षक दोनो बने रहना चाहते हैं इसीलिए अपनी नौकरी छोड़ के राजनीति में आने के भावुक किस्सों को कैश करवाते हुए जब वो चुनाव लड़ रही सोनिया गाँधी/स्मृति ईरानी के एजुकेशन एफिडेविट पर बात करते हैं तो बड़े मासूम नजर आते हैं।
1. कुमार विश्वास अदभुत वक्ता हैं लेकिन स्मृति ईरानी भी निःसंदेह इस वक़्त भारतीय राजनीति की कुछ सबसे बेहतरीन वक्ताओं में एक हैं।
2. कुमार विश्वास एक आंदोलन के बाद 2012 में राजनीति में आये तो स्मृति ईरानी के दादा स्वयंसेवक संघ और माँ जनसंघ से जुड़ी रहीं। खुद स्मृति ईरानी पिछले 16 साल से भारतीय जनता पार्टी के लिए काम कर रही हैं।
3. कुमार विश्वास जहाँ 6 साल पार्टी अनुशासन में नही बंध पाए वहीं एक समय नरेंद्र मोदी का इस्तीफ़ा माँगने वाली स्मृति ईरानी आज बीजेपी के सर्वाधिक चर्चित नेताओं में शामिल हैं। एक चुनाव लड़कर अपनी जमानत जब्त करवा चुके और अभी तक केवल 5 साल की सक्रिय राजनीति करने वाले कुमार विश्वास जब व्यंग की बोली में ही खुद को आडवाणी बताते हैं तो वो अपने व्यंग की शिकार रहीं जया प्रदा/स्मृति ईरानी/मायावती/सोनिया गांधी के सामने हद से ज्यादा बौने नजर आते हैं। क्योंकि ये सभी योद्धा हैं और कुमार विश्वास समीक्षक।
4. कुमार विश्वास ने खुद ही अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ना स्वीकार किया और दूसरी बार राज्यसभा का टिकट ना मिलने पर सारी राजनीतिक मर्यादाओं को तार-तार कर दिया। जबकि स्मृति ईरानी को हमेशा उनकी पार्टी ने हारने के लिए चुनाव लड़वाया। दिल्ली में कपिल सिब्बल के खिलाफ और अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ। 2010 में भारतीय जनता पार्टी की महिला इकाई की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी स्मृति ने कभी पार्टी को अपने लिए सुरक्षित सीट तलाशने को नही बोला। आज के समय में भी जब जितिन प्रसाद तक लखनऊ लड़ने से मना कर देते हैं उस समय भी स्मृति ईरानी अमेठी के लिए उफ्फ तक नही करती क्योंकि वो समीक्षक नही प्लेयर हैं।
4. कुमार विश्वास ने अमेठी में खड़े होकर कहा था कि 'मैं हार जाऊँ या जीतूँ लेकिन अमेठी कभी नही छोडूंगा।' बाद में कुमार पिछले 5 सालों में सिर्फ एक शाम को एक कवि सम्मेलन के लिए 4 घंटे अमेठी रुके। जब कुमार अमेठी में खड़े होकर अमेठी का हो जाने का वादा कर रहे थे उसी वक़्त जावेद जाफरी लखनऊ के चुनाव में अपने कभी लखनऊ ना छोड़ने के एफिडेविट की फ़ोटो कॉपी बँटवा रहे थे। और इस दोनो 'मर्दों' से अलग खड़ी वो अंडर ग्रेड्यूएट 'औरत' जब ये कह के गयी थी कि अमेठी आज से मेरी है, तो आज तक उसने अपनी बात की लाज रखी क्योंकि वो कोई समीक्षक नही खुद प्लेयर है।
5. जिस परिवारवाद के खिलाफ जिंदगी भर लड़ाई लड़ने का दावा करके कुमार विश्वास होली पर रंगों से डूब के टीवी पर कविताएं करने लगे, उसी परिवारवाद की मिट्टी पर स्मृति ईरानी ने कुदाल मारकर राहुल गाँधी को वायनाड से पर्चा भरवा दिया क्योंकि वो कोई समीक्षक नही खुद प्लेयर हैं।
असल में आप जिस काम को खुद नही कर पाते हैं तो आपका अहंकार ये चाहता है कि उस काम को कोई ना कर पाए क्योंकि फिर आपकी लोकप्रियता और यश पर प्रश्नचिन्ह लगेगा !
बाकी कुमार साहब का एक शेर है जो इस वक़्त बेहद मुफ़ीद है -
'वो तो ज्ञानी हैं उन्हें सिर्फ़ बात काटनी है,
मैं तो जुगनू हूँ मुझे स्याह रात काटनी है।'।
डॉ रूद्र प्रताप,लेखक,पत्रकार,लखनऊ निवासी