दसवीं और 12 वीं के बच्चों की अब 99 प्रतिशत अंक तक आने लगे है। वो दिन दूर नहीं जब बच्चे 110 अंक तक भी प्राप्त करने लगे। अकादमिक दुनिया में बच्चे तेज रफ्तार घोड़े बने हुये हैं और अभिभावक हंटर लिये महत्वकांक्षाओं के साथ उनके ऊपर चढ़े हुये है। बाजारवाद की इस खोखले दौर में नब्बे फीसद से कम अंक लाने वाले बच्चों को सामाजिक रूप से खारिज कर दिया जाता है और ‘फ्लाइंग नंबर्स’ लाने वालों को सिर आंखों पर रखा जाता है। लेकिन सवाल ये है कि, ज्यादा अंक लाने वाले बच्चे, क्या बेहतर समाज का प्रतिनिधित्व करेंगे और आने वाले समय में क्या ये महत्वकांक्षायें भीषण सामाजिक टाइम बम में बदल सकती है ? इसकी समीक्षा करने से पहले ज्यादा जरूरी उस घटना का विशलेषण करना जरूरी है, जिसने इस अंधी दौड़ की एतिहासिक बुनियाद रखी।
नब्बे के दशक के शुरुआत में भारत में नवउदारवादी नीतियां (Economic Reformation) लागू हो गई थी। देश में कारपोरेट नौकरियों के साथ ही कारपोरेट एजुकेशन की भी आमद हुई। इन कारपोरेट नौकरियों को करने के लिये अंग्रेजी में दक्ष युवा चाहिये थे। नब्बे के दशक से पूर्व अंग्रेजी स्कूलों के नाम पर मिशनरियों के ऑल सेंट्स कान्वेंट स्कूल हुआ करते थे। जहां कम फीस पर अच्छी गुणवत्ता की पढ़ाई होती थी। लेकिन ये संख्या में कम थे। कारपोरेट सेक्टर को स्किल लेबर की जरूरत थी, लिहाजा, देश में कुकरमुत्तों की तरह कारपोरट उच्च शिक्षण संस्थान खुले।
इसी तरह स्कूली पढ़ाई में बढ़े पूंजीपतियों ने निवेश किया और देश में हजारों की तादाद में पब्लिक कारपोरेट स्कूल और इंटरनेशनल स्कूल खुले। पहले जहां बुजर्वा, पूंजीपति और सामंतवादी परिवारों के बच्चों के लिये दून स्कूल, शेरवुड स्कूल, वुड स्टॉक, सेंट लारेंस सरीखे इंटरनेशनल स्कूल थे। वहीं नब्बे के दशक में देश में हजारों इंटरनेशनल स्कूल खुले। देहरादून में ही पिछले दस सालों में दस इंटरनेशनल स्कूल खुले। उधर, पब्लिक कारपोरेट स्कूलों में बच्चों का दाखिला हर मध्य वर्गीय परिवारों का सपना होने लगा। अपनी कमाई का आधा हिस्सा इन स्कूलों की फीस देने के बाद अभिभावक अपने बच्चों को एक इनवेस्टमेंट के तौर पर देखने लगे। अभिभावक ‘जौकी’ बन गये और उनके महत्वकांक्षओं के हंटर उनके तेज रफ्तार बच्चों पर पड़ने लगे। बच्चों के बचपन पर डकैती ही पड़ गई।
वहीं, इन स्कूलों से निकले हर बच्चे को आईआईटी, मेडिकल कॉलेज और यूपीएसई में प्रवेश तो मिलता नहीं। लिहाजा, देश में तमाम निजी शिक्षण कॉलेज खुले। जहां पर प्रतिष्ठिन सरकारी शिक्षण संस्थानों में कथित तौर पर असफल माने गए या नब्बे प्रतिशत से कम अंक लाने वाले पढ़ने लगे। इन शिक्षण संस्थान में लाखों रुपये अभिभावकों के खर्च हो जाने बाद पास आउट हुये बच्चों को कारपोरेट सेक्टर में नौकरी मिलने वाली थी। सन 2000 से 2010 तक ऐसे बच्चों को अच्छे पैकेज में तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी मिली भी। उनके अभिभावकों की मेहनत सफल हुई। लेकिन 2010 के बाद बीस साल पूर्व लागू हुई नवउदारवादियां नीति कमजोर पढ़ने लगी और कारपोरेट सेक्टर में नौकरियां घटने लगी। उधर, निजी शिक्षण संस्थान हर साल युवाओं की नई खेप निकालती रही। जिससे कारपोरेट सेक्टर में ‘डिमांड एंड सप्लाई’ का गणित गड़बड़ा गया।
लिहाजा, लाखों रुपये खर्च करने के बाद कारपोरेट एजुकेशन प्राप्त करने वाले युवा किसी कार शोरूम में सेल्समैन, होटल में रिसेप्शन, मार्केटिंग कंपनियों के साथ ही बेरोजगार रहने लगे। लेकिन कहानी अभी और डरावनी होने वाली थी। अब भारत में नवउदारवादी नीतियों में पूरी तरह से हृास (depreciation) लगने जा रहा है। जिस कारण बहुराष्ट्रीय कार निर्माता कंपनी सेवरले बंद हो गई। इसकी तस्दीक आरबीआई के पूर्व चैयरमेन रघुनाथ राजन कर चुके हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में माना है कि भारत में आने वाले वक्त में कुछ गड़बड़ होने वाली है। उधर, मारूति सुजूकी ने भी 2020 से अपने सभी डीजल वाहनों की बिक्री पर रोक लगाने का एलान किया है। इसी तरह कई टेलीकम्युनिकेशन कंपनी समेत आईटी सेक्टर की कंपनियों ने गुड़गांव, पुणे, बैंगलोर, हैदराबाद, कोलकाता और चंडीगढ़ से सामान समेट लिया।
देश में लाखों की तादाद में रोजगार घटा है। ये रोजगार कारपोरेट सेक्टर में ज्यादा घटा है। जिसका बड़ा उदाहरण जेट एयरवेज है। लेकिन विडबंना ये भी है कि इनके साथ ही सरकारी उपक्रम मसलन, बीएसएनल, पोस्ट ऑफिस, रेलवे, एयर इंडिया भी खस्ताहाल हुये है। यानी वहां भी नौकरी नहीं और यहां भी नौकरी नहीं। तो फिर सवाल उठता है, ये जो लाखों की तादात में हर साल युवा अस्सी और नब्बे से ज्याद अंक प्राप्त कर, अपनी शिक्षा में (नर्सरी से 12वीं और बाद में उच्च शिक्षण संस्थान) में करोड़ों रुपये खर्च कर जब नौकरी मांगने जायेंगे। तो उनमें सभी की नौकरी नहीं लगेगी। जिनकी नौकरी नहीं लगेगी, वो क्या करेंगे। क्या वो भविष्य में टाइम बम बनेंगे।