यूं तो उत्तराखंड की धरती पर तमाम पौराणिक और बड़ी आस्था के देवालय हैं, लेकिन यहां के कुछ मंदिरों के साथ लोगों की गहरी आस्था आज भी जुड़ी है। ऐसे ही पवित्र स्थानों में दो नाम हैं कपकोट के शिखर और भनार मंदिर। शिखर मंदिर में भगवान मूलनारायण और भनार में बजैंण देवता की पूजा होती है। शिखर से हिम श्रंखलाओं का सुंदर नजारा है।
बागेश्वर से करीब 60 किमी दूर भनार गांव के चोटी में स्थित श्री 1008 मूलनारायण देवता का भव्य एवं आकर्षक मंदिर है। मूलनारायण मंदिर, बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र में आता है और आसपास के लोगों के लिए अपार श्रद्धा का केंद्र है। इस मंदिर में नवरात्र में नवमी की रात को मेला लगता हैं यहाँ लोग झोड़ा, चाचरी के साथ मेले का खूब आनन्द लेते है। इस मंदिर में कई गांवों के डंगरिए अवतरित होकर आते है।
यहां आने वाले भक्त कभी खाली हाथ नहीं जाते कहा जाता है डंगरिए जब अवतरित होकर फल फैकतें है, जिसके पास यह फल जाता है उसकी मन्न्त पूरी होती है। शिखर मूलनारायण मंदिर की ऊंचाई समुद्रसतल से लगभग 9124 फिट तथा 2700 मीटर है। यहां हर वर्ष भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां के लोगो की मान्यता है। कि फसल का पहला अनाज (सीक) के रूप में श्री 1008 मूलनारायण देवता को चढ़ाया जाता है।
यहां के पंडित जी का कहना है। कि यह मंदिर पहले छोटा सा था, बाद में इसे बद्रीनारायण दास जी ने बनवाया, उनका कहना है कि पहले इस मंदिर के बारे में लोगों पता नहीं था। शिखर मूलनारायण मंदिर बांज के घने वृक्षों के बीच घीरा हुआ बहुत ही शान्त एवं अपार श्रद्धा का केन्द्र है। इस मंदिर से आप हिमालय की चोटी का सुन्दर नजारा देख सकते है। यहां से पंचाचूली, नंदा देवी पर्वत, तथा पूरे हिमालय की चोटी का दर्शन कर सकते है। शिखर मूलनारायण मंदिर तक पहुचने के लिए काफी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। भगवान मूलनारायण के दो पुत्र भी इसी शिखर से कुछ दूरी में स्थित है। इनके एक पुत्र का नाम बंजैण तथा दूसरे पुत्र का नाम नौलिंग है।
भनार– जहां पर भगवान बंजैण जी का मंदिर है। यह मंदिर भी एक भव्य बांज के पड़ो के बीच घिरा हुआ है। यह मंदिर शिखर जाने के रास्ते में पड़ता है। सनगाड़– शिखर पहुचने के लिए दूसरा रास्ता जो रीमा से है। रीमा से सनगाड़ 4 किलोमीटर की दूरी पर है सनगाड़ में नौलिंग भगवान का भव्य मंदिर है। इस मंदिर में श्रद्धालु दूर-दूर से आते है। यहां नवरात्र में नवमी के दिन मेला भी लगता हैं। जिसमे लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है।
यह दोनों ही स्थल अत्यंत रमणीक हैं। इनसे भी अधिक शिखर पर्वत का सौंदर्य है। जहां से हिमालय की चोटियां काफी नजदीक से महसूस होती हैं। तमाम संभावनाओं के बावजूद यह स्थल पर्यटन के साथ नहीं जुड़ सके और आज भी व्यापक पहचान के लिए तरस रहे हैं। 1991 में पंजाबी अखाड़े के महंत बद्रीनारायण ने यहां के मंदिरों का नवनिर्माण कराया।
आप यहा तक आसानी से पहुच सकते है। हवाई- पन्त नगर हवाई अड्डे तक आप बाईयर आ सकते है। वहा से आप बस अथवा कार से आसानी से आ सकते है।पन्त नगर से शिखर की दूरी 243 किलोमीटर हैं| टैक्सी- बागेश्वर से आप टैक्सी से जा सकते है। बागेश्वर से 60 किलोमीटर की दूरी पर है।
क्रेडिट- उत्तराखंड दर्शन