एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

सिनेमा : इंतज़ार



वहीदा रहमान ने राजकपूर के साथ दो फ़िल्में की हैं, रमेश तलवार की 'एक दिल सौ अफ़साने' (1963) और शैलेन्द्र की 'तीसरी क़सम'(1966)। 

वहीदा रहमान बहुत बढ़िया किस्सागो हैं। जो उन्हें जानते हैं, वे बताते हैं, जब वो किस्सों का पिटारा खोलती हैं तो सुबह से शाम कब हो जाती है, पता ही नहीं चलता। उनका किस्सागोई का अंदाज़ भी बहुत दिलचस्प होता है। 
पिछले दिनों कपिल के कॉमेडी शो में वहीदा जी ने एक दिलचस्प वाक्या सुनाया। राज साहब सेट पर बहुत देर से आते थे। सुबह नौ बजे की शिफ़्ट है, लेकिन राज साहब दो बजे आये। टाइम की पाबंद बेचारी वहीदा इंतज़ार करते करते सूख जाती थी, सारा उत्साह जाता रहता। लाख अनुरोध के बावजूद राज साहब अपनी आदत नहीं बदल पाए। एक दिन तय हुआ कि सुबह नौ बजे की शिफ्ट के बजाये दोपहर दो बजे की शिफ्ट कर दी जाए। 
वहीदा ने कहा, हां ये ठीक रहेगा। 
लेकिन राज साहब को लेट आने की बीमारी थी। वो दो बजे की बजाये शाम पांच बजे आये। 
तब वहीदा ने राज साहब से बात की, देखिये ये ठीक नहीं है। आप बड़े और सीनियर आर्टिस्ट हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम जैसों की कद्र न हो। दूसरी जगह का शूटिंग शेड्यूल गड़बड़ा जाता है। 
राज साहब ने वहीदा की बात को ध्यान से सुना और सर हिला दिया, ठीक है कल सुबह नौ बजे पक्का पहुँच जाऊँगा। 
अगले दिन सुबह सात बजे राज साहब का वहीदा को फोन आया, अरे मैं यहाँ स्टूडियो में काफी देर से बैठा हूँ। तुम अभी तक घर से निकली नहीं? 
वहीदा को तो काटो खून नहीं। लेकिन फिर उन्होंने साहस बटोर कर कहा, राज साहब बहुत दिनों तक आप मुझे इंतज़ार कराते रहे, अब थोड़ी देर इंतज़ार आप भी करें। 
वीर विनोद साहब.लखनऊ निवासी