एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

उत्तराखंड में इंसानियत की मौत !

उत्तराखंड में इंसानियत की मौत !

यह बेहद नृशंस है,अमानवीय है. उत्तराखंड की टिहरी जिले की नैनबाग तहसील के श्रीकोट गांव में एक दलित युवक इसलिए पीट-पीट कर मरणासन्न कर दिया गया क्योंकि वह शादी में खाना खाने के लिए कुछ सवर्णों के सामने बैठ गया ? 23 साल के जीतेंद्र दास को इसीलिए बेरहमी से पीटा गया कि वह कतिपय सवर्णों लोगों के सामने विवाह समारोह में कुर्सी पर खाना खाने बैठ गया.अखबारी रिपोर्टों के अनुसार 26 अप्रैल को घटित इस घटना में विजय दास को इतना बुरे तरीके से पीटा गया कि उसका हाथ टूट गया,कमर और गुप्तांगों पर भीगंभीर चोट के निशान थे.पिटाई के चलते विजय दास बेहोश हुआ तो फिर कभी होश में नहीं आयाऔर फिर 5 मई को देहरादून के एक अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया.इस मामले में मृतक की बहन ने नामजद रिपोर्ट दर्ज करवाई है पर अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है.

यह कैसी विकृत मानसिकता है, जिसके लिए जाति का नकली श्रेष्ठता बोध और अहंकार,मनुष्य के जीवन से भी बड़ा है ? किसी दलित के कुर्सी पर बैठ जाने से कतिपय सवर्णों का धर्म ऐसा खतरे में आ गया कि उन्होंने एक नौजवान का जीवन ही खत्म कर दिया ! कुर्सी पर बैठ कर खाना खाने मात्र से किसी को जीवन से हाथ धोने पड़े,क्या यह बात समझ में आने वाली है?जिनका जातीय श्रेष्ठता का दावा है, आखिर किस बात के लिए श्रेष्ठ हैं, वे?21वीं सदी में पहुंच कर भी यदि किसी को लगता है कि पैदा होने मात्र से कोई श्रेष्ठ हो जाता है तो वह कूढ़मगज है, मानसिक व्याधि से ग्रसित है. जो श्रेष्ठता किसी को हत्यारा बना दे,उससे अधिक नीचता और क्या हो सकती है? जाति-धर्म की बंदिशों में जब तक लोग जकड़े रहेंगे,तब तक तो ऐसे हत्यारे पैदा होते ही रहेंगे.जाति और धर्म के नकली श्रेष्ठता के अहंकार से बाहर निकलिये,मनुष्य बनिये,यही मनुष्यता के लिए श्रेयस्कर होगा.


- इन्द्रेश मैखुरी ,पत्रकार