एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

'पारम्परिक शिल्प को संरक्षित करें'


यह हुनरबाजी अब गुमनामी की सीढ़ी चढ़ने लगी है। कभी पहाड़ी किसान का काम आसान बनाने वाले ये कलाकार कई प्रकार की सुंदर वस्तुओं को रचा करते थे। यह कलाकारी रिगाल और बाँस से की जाती थी। टोकरी, डाली, ओड़िया (छोटी टोकरी), छापरी (रोटी रखने वाली टोकरी), ढकनी (हरेला बोने में उपयोगी), कण्डी (फल सब्जी लाने वाली हेंडिल वाली टोकरी), चंगोरे (छोटे बच्चों के झूले), पिटारे (कपड़े रखने में उपयोगी), नाली (पारम्परिक तोल लगाने वाला पात्र), माना (अनाज मापने वाला पात्र), गजेठी (पारम्परिक रूप से छाँछ फाड़ने वाला उपकरण) आदि बेशकीमती उपयोगी वस्तुओं का निर्माण करने वाले ये हुनरबाजी उत्तराखंड में काफी प्राचीन काल से जीवित थी। लेकिन आज इस काम को करने वाले लोग बहुत कम ही बचे हैं। अब इनकी नई पीढ़ियाँ इस पारम्परिक कला से मुँह मोड़ चुकी है।

पंकज बिष्ट  CCRT (सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केन्द्र नई दिल्ली) जो कि संस्कृति मंत्रालय का एक उपक्रम है, की सहायता से इस प्रकार की पारम्परिक हस्तशिल्प कला को संरक्षित करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। जिसके अंतर्गत उनके द्वारा इन पारम्परिक विधाओं पर रिसर्च कर विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। इन शिल्पकलाओं को इनके हुनरबाजों की सहायता से उन्ही के नाम से विभिन्न प्रकार से जैसे साहित्य निर्माण, वीडियों डाक्यूमेंटेशन, फोटो डाक्यूमेंटेशन आदि रूप में संरक्षित किया जा रहा है। इनमें काष्ठ शिल्प, रिगाल व बाँस आधारित शिल्प, पत्ती व प्राकृतिक रेशा आधारित शिल्प, धातु शिल्प, ऐपण आदि प्रमुख हैं। 


यदि आप भी ऐसे किसी शिल्पी को जानते हैं जो किसी खास पारम्परिक शिल्प में निपुण हो और इस अभियान में अपना सहयोग देना चाहे तो कृपया पंकज जी से सम्पर्क करा सकते हैं। इस प्रकार आप भी अपने उत्तराखंड की पारम्परिक शिल्प कला के संरक्षण में योगदान कर सकते हैं।

(पंकज सिंह बिष्ट CCRT फैलो 7830232888 )