बीते महीने दिल्ली के जंतर-मंतर पर पुरुष अधिकार समिति और सेव इंडियन फैमिली सहित लगभग कई गैर सरकारी संगठनों ने पुरुष आयोग की मांग के लिए प्रदर्शन किया और उसे पुरुष सत्याग्रह का नाम दिया।
प्रदर्शनकर्ताओं ने बताया कि महिला आयोग होने से अधिकतर कानून महिला हितैषी हैं, जो महिलाओं का समर्थन करते हैं। ज़्यादातर मामलों में पुरुषों पर झूठे मुकदमें दर्ज किये जाते हैं।
ज़रूरत कानून व्यवस्था दुरुस्त करने की है ना कि महिला कानून की निंदा करने की
यदि एक प्रतिशत इसको सत्य मान भी लिया जाए तो कानून का दुरुपयोग केवल दहेज, बलात्कार, घरेलू हिंसा जैसे मामलों में ही नहीं बल्कि भ्रष्टाचार, हत्या, गबन आदि में भी होता है, जिसमें एक पुरुष ही दूसरे पुरुष के खिलाफ झूठे मुकदमें दर्ज कराता है। फिर यह पृष्ठभूमि निराधार है। यहां कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है ना कि महिला सम्बन्धी अधिकारों व कानूनों की निंदा कर पुरुष आयोग बनाने की।
क्यों आधारहीन है पुरुष आयोग की मांग
जहां तक कोई आयोग बनाने की बात होती है, तो उसके पीछे उस विशेष वर्ग व समुदाय के पिछड़े सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि का इतिहास होता, जो उसे हाशिये पर लाकर उसे असुरक्षित कर देता है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो पुरुषों के पास इस तरह का कोई अधीनस्थ इतिहास भी नहीं रहा है।
अकादमिक विमर्शों से यह साबित है कि इतिहास का लेखन पुरुष प्रधान ही रहा है और उन्हें प्रत्येक मामले में वरीयता दी गयी है। वे हमेशा से एक प्रभावशाली स्थिति में ही रहे हैं और अभी भी हैं। संसद से लेकर घर की चारदीवारी तक देखा जाए तो अभी भी पुरुषों का सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक प्रतिनिधित्व ज़्यादा है।
अभी हाल ही के 2019 की एक रिपोर्ट में विभिन्न देशों के राष्ट्रीय संसदों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के प्रतिशत में
193 देशों की सूची में भारत का 149वां रैंक था, जबकि भारत का चिर-प्रतिद्वन्दी पाकिस्तान को 101वां स्थान प्राप्त है।
श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी भी दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। महिलाओं की श्रम में भागीदारी का प्रतिशत
2011 -12 में 31.2 प्रतिशत था, जो 2017-18 में 23.3 प्रतिशत हो गया। जिसकी वजह से उसकी भागीदारी कम हो रही है, उसे घरेलू व अवैतनिक (अनपेड) श्रम मानकर अवहेलना की जाती है।
इस प्रदर्शन को लिंग समानता की तरफ बढ़ता हुआ सकारात्मक कदम भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि जॉन रॉल्स ने अपनी पुस्तक ‘अ थ्योरी ऑफ जस्टिस’ में सामाजिक न्याय के दो सिद्धांत बताये हैं,
- प्रथम- प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता का वह समान अधिकार प्राप्त होना चाहिए, जो दूसरों को ठीक वैसी ही स्वतंत्रता के साथ निभा सके।
- द्वितीय, सामाजिक और आर्थिक विषमताएं इस ढंग से व्यवस्थित की जाएं कि निम्न स्थिति वाले लोगों को अधिकतम लाभ हो और अवसर की उचित समानता सबके लिए सुलभ हो।
अमर्त्यसेन भी रॉल्स के न्याय के सिद्दांत से सहमत थे और अपनी क्षमता उपागम के माध्यम से न्याय के सिद्धांत में और सुधार किया।
इस आधार पर तो महिलाएं अभी तक अनेक नीतियों, कानूनों के बावजूद पुरुष के समकक्ष नहीं पहुंच पाई हैं, तो पुरुष इस तरह की बेबुनियादी मांग के लिए कैसे दावा कर सकते हैं।
दरअसल, पुरुष आयोग की मांग, पुरुषों की अपने अधिकारों व हितों की मांग की लड़ाई नहीं है बल्कि उसके अपने वर्चस्व और वर्तमान स्थिति को यथावत बनाये रखने की लड़ाई है। यह बेबुनियादी मांग उनके इसी वर्चस्व के टूटने की छट-पटाहत को दर्शाती है, क्योंकि पितृसत्तात्मक सोच कभी भी बराबरी के लिए मोल-भाव करने की अनुमति नहीं देता, इसमें एक को स्वामी और दूसरे को दास होना ही होता है, जिसमें एक बलपूर्वक अपनी इच्छा को थोपने तथा दूसरा अनुनय करने के लिए मजबूर होता है। जबकि नारीवादी आंदोलन महिलाओं और पुरुषों के इसी अनुनय और बलपूर्वक संबंधों को समाप्त करने के रास्ते से होकर समानता की मंज़िल तक पहुंचने का ऐसा अधूरा सफर है, जिसे अभी बहुत दूर तक जाना है।
नेहा राय ,फोटो सोर्स- Save Family Foundation