एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

व्यंग्य : एक महाभारत कथा और


महासमर में कौरवों का विनाश हो चुका था। कुरुक्षेत्र क्षत-विक्षत शवों से पटा था। विजय के पश्चात भी पांडुपुत्र अपने स्वजनों-परिजनों की मृत्यु के कारण अवसाद में डूबे हुए थे। पांडवों को सांत्वना देने के पश्चात कृष्ण सम्राट धृतराष्ट्र से मिलने जा पहुंचे। पुत्र-वियोग में शोकाकुल धृतराष्ट्र उन्हें देखते ही आर्तनाद करने लगे। कृष्ण कुछ देर शांत होकर उन्हें देखते रहे। सम्राट का रुदन थमा तो कृष्ण ने उनका हाथ हाथ में लेकर कहा - 'इस महाविनाश का अनुमान तो आपको युद्ध के आरम्भ से ही था। मैंने ही नहीं, महामंत्री विदुर ने भी आपको युद्ध के दुष्परिणामों की चेतावनी दी थी। अब इस विलाप का क्या अर्थ, कुरुनंदन ?'
धृष्टराष्ट्र ने कोई उत्तर देने की जगह उनसे सीधा प्रश्न कर डाला - 'माधव, युद्ध में मारे गए मेरे पुत्रों को क्या मुक्ति मिलेगी ?'
कृष्ण ने कहा - 'सम्राट, आपके पुत्रों का अंत अधूरी इच्छाओं के साथ हुआ है। उनकी तत्काल मुक्ति की कोई संभावना नहीं। उनके प्रेत कलिकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहेंगे। कलियुग के अंतिम चरण में विनाश की अपनी अपार इच्छाओं के साथ आपके साथ उनका भी पुनर्जन्म होगा।'
धृतराष्ट्र ने भावुक होकर कृष्ण से पूछा - 'हमारा यह जन्म तो व्यर्थ गया। कलिकाल में मेरे, मेरे और पांडुपुत्रों के पुनर्जन्म और उनके कृत्यों के बारे में कृपया विस्तार से बताएं, देवकीनंदन !'
कृष्ण ने कहा - 'सबसे पहले आप, सम्राट ! आप कलियुग के अंतिम चरण में हस्तिनापुर में एक राष्ट्रवादी दल के नायक के रूप में पुनः सिंहासन पर आरूढ़ होंगे। मामा शकुनी उस दल के अध्यक्ष के रूप में आपके सलाहकार और सारथि बनेंगे। वे राष्ट्र के कोने-कोने में छल-छद्म और धार्मिक ध्रुवीकरण के मार्ग पर चलते हुए आपके साम्राज्य को विस्तार देने में सफल होंगे। गुरु द्रोण का अवतार राष्ट्र के एक धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन के प्रमुख मोहन भागवत के रूप में होगा। वे राष्ट्र भर में प्रशिक्षण शिविर चलाकर राष्ट्रवादी मंत्रियों और उत्तराधिकारियों की कई पीढ़ियों का निर्माण करेंगे I पितामह भीष्म लालकृष्ण अडवाणी के रूप में अवतरित होंगे। इस बार किसी कठिन प्रतिज्ञा के कारण वे स्वयं सत्ता का परित्याग नहीं करेंगे, सत्ता स्वयं उनके निकट आकर उनका परित्याग करेगी। उन्हें अंतिम निराशा आपसे मिलेगी। महाभारत का आंखों देखा हाल सुनाने वाले संजय कलियुग मे गोदी मीडिया के नाम से प्रकट होंगे और दूरदर्शन के माध्यम से आपका अखंड यशगान करते हुए नाना उपाधियों से अलंकृत होंगे। अंगराज कर्ण की आत्मा करोड़ों टुकड़ों में विभाजित होकर भक्त नाम की एक अद्भुत प्रजाति को जन्म देगी। यह प्रजाति सुख में या दुख में, मान में या अपमान में सदा आपका समर्थन करेगी। इस प्रजाति में ऐसे लोग होंगे जो आपके शासन की बुराईयां जानते हुए भी न आपकी निंदा करेंगे और न आपकी निंदा सुन सकेंगे।'
'मेरे कलियुगी शासन में मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या होगी, कान्हा ?'
'अपनी नेत्रहीनता के कारण इस जन्म में आप संसार देखने से वंचित रहे। अगले जन्म में आप विश्व का कोना-कोना छान मारेंगे। दुनिया भर का सौंदर्य आपकी आंखों के सामने होगा। संसार के समस्त शासक आपके स्वागत में बिछे मिलेंगे। आपकी वाक्कला ऐसी होगी कि मिथ्या भाषणों और झूठी दिलासाओं के बल पर भी आप पांच वर्षों तक भारत भूमि पर अखंड राज करेंगे। इस जन्म की भांति अगले जन्म में भी प्रजा पर भारी कर लादकर आप अपना राजकोष भरेंगे, लेकिन जैसे इस जन्म में उसका उपभोग विलासिता के लिए मामा शकुनि और आपके पुत्रों ने किया, कलियुग में उसका उपभोग आपकी प्रजा नहीं, आपको सत्ता तक पहुंचाने वाले सेठ-साहूकार, उद्योगपति करेंगे।'
'मेरे प्रिय पुत्रों के भविष्य के बारे में बताईये, केशव !'
'आपके पुत्रों ने युद्ध में क्षत्रियोचित मृत्यु का वरण किया है। कलियुग में उनका जन्म वैसे तो साधुओं, साध्वियों, योगियों, धर्म-प्रचारकों, संघियों, बजरंगियों, हिन्दू सैनिकों और गोरक्षकों के रूप में होगा, लेकिन उनका विनाशक स्वभाव तब भी बना रहेगा। राष्ट्र के दूसरे समुदायों और विधर्मियों के प्रति अपने हिंसक व्यवहार और वक्तव्यों से वे आपके साम्राज्य में अराजकता उत्पन्न करते रहेंगे। उनकी धर्म आधारित पक्षपाती नीति के कारण देश में गृहयुद्ध का वातावरण बनेगा और विश्व में आपकी निंदा होगी। आप मोहवश उनकी करतूतों को जानते हुए भी उनको दंडित नहीं कर सकेंगे। यही मोह एक बार पुनः आपके साम्राज्य के पतन का कारण बनेगा।'
'अर्थात अगले जन्म में भी मेरा परिवार शांति से नहीं रह पाएगा। छोडिए, यह तो बता दीजिए कि मेरे कलियुगी शासन में पांडु-पुत्रों की क्या दशा होगी ?'
'राजन, एक को छोडकर सभी पांडव मोक्ष को प्राप्त होंगे। उनके पुनर्जन्म की कोई संभावना नहीं। एक भीम का प्रेत अपनी अंतहीन क्षुधा के कारण कलियुग तक भटकता रहेगा। कलियुग में गदाधारी भीम भारत में अरुण जेटली के रूप में अवतरित होगा। आपने उसकी हत्या का प्रयास कर इस जन्म में जो पाप किया है, उसका मूल्य कलिकाल में आपको उसे साम्राज्य का समूचा कोषागार देकर चुकाना होगा। इस बार उसकी भूख पेट की नहीं, धन की होगी। राजकोष भरने के लिए वह प्रजा से इतनी विधियों और इतनी निर्ममता से कर-संग्रह करेगा कि लोक में त्राहि-त्राहि मच जाएगी। उसके इस लोभ के कारण आप एक निर्मम शासक के रूप में अलोकप्रिय होंगे। अपनी अमानवीय कर-प्रणाली से वह पांडवों के प्रति आपके अन्याय का प्रतिशोध लेगा और अंततः विशाल राजकोष पर बैठे-बैठे ही परमपद को प्राप्त होगा। आपके योद्धाओं द्वारा चक्रव्यूह में घेरकर मारा गया सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु आपकी अपार लोकप्रियता के बीच भी मतदान में आपको पराजित कर आपके साम्राज्य की नाक के नीचे इंद्रप्रस्थ नगर पर शासन करेगा। तब उसका नाम अरविन्द होगा। यद्यपि उसका राज्य इंद्रप्रस्थ की सीमा से आगे नहीं बढ़ेगा और उसके शासनाधिकार सीमित होंगे, लेकिन वह आपके लिए असीमित समस्याएं उत्पन्न करता रहेगा। अश्वत्थामा द्वारा सोते समय मारे गए द्रौपदी के पांच पुत्र पांच प्रमुख विपक्षी दलों के प्रधान बनेंगे जो आपस में गठबंधन कर आपको शासन से विस्थापित कर देंगे।'
'और अंत में, कलि काल में जब सर्वत्र अधर्म का बोलबाला होगा तब धर्म की पुनर्स्थापना के लिए आप तो आएंगे न, वासुदेव ?'
कृष्ण के अधरों पर मुस्कान खेल गई - 'पृथ्वी की मेरी यात्रा द्वापर युग तक ही है, सम्राट। अभी गया तो पुनः लौट कर नहीं आना है मुझे। वैसे भी कलि काल में पक्ष हो या विपक्ष दोनों के मूल में अधर्म ही होगा। अधर्म ही अधर्म से लड़ेगा। एक अधर्म दूसरे अधर्म को मारेगा। मरा अधर्म पुनर्जन्म लेकर पुनः पहले अधर्म को मारेगा। शनैः शनैः अधर्म इतना बढ़ेगा कि सृष्टि का स्वतः विनाश हो जाएगा। जब धर्म ही न होगा तो उसकी पुनर्स्थापना के लिए मुझ कृष्ण को पुनः महाभारत रचने की क्या आवश्यकता होगी ?
- ध्रुव गुप्त