एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

ये कौन चित्रकार है !


दीवारों पर रंगों की नदियों जैसी लहरदार पेंटिंग्स की कुछ तस्वीरों ने कल मुझे विस्मय में डाल दिया था। मैंने गूगल से इसके कलाकार के बारे में जानना चाहा तो यह जानकार हैरान रह गया कि यह अद्भुत कलाकृति किसी मनुष्य ने नहीं, खुद हमारी प्रकृति ने बनाई है। रूस के येकातेरिनबर्ग में मीलों लंबी कई निर्जन सुरंगें ऐसी असंख्य कलाकृतियों से भरी पड़ी है। पिछली सदी में पहली बार जब इन अज्ञात सुरंगों की तस्वीरें रूस के एक खोजी छायाकार मिखाइल मिशेनिक ने ज़ारी की तो दुनिया के कलाप्रेमियों में हलचल मच गई। 
वैज्ञानिक शोध से पता चला कि इन सुरंगों की दीवारों पर यह अद्भुत चित्रकारी लाखों साल पुरानी है जो नमक के एक समुद्र के सूख जाने से बनी थी। समुद्र के सूख जाने के बाद सुरंगों की दीवारों पर करनालाईट नाम का एक खनिज पदार्थ जमा रह गया जिसका रंग पीला-सफ़ेद या लाल-नीला होता है। 




समुद्र की लहरों के कारण इस खनिज की घुमावदार पैटर्न्स से ये बहुरंगी कलाकृतियां बनी हैं। इन अद्भुत सुरंगों को साइकेडेलिक साल्ट माइन्स कहा जाता है। प्रकृति की इस अद्भुत कृति को संरक्षित रखने के लिए और लोगों को जहरीले गैस और लैंडस्लाइड के खतरों से बचाने के लिए वहां पर्यटकों को नहीं जाने दिया जाता। वहां सिर्फ खोजकर्ताओं और वैज्ञानिकों की पहुंच हो सकती है जिन्हें वहां जाने के लिए रूस सरकार से एक विशेष परमिट लेनी होती है।
सच है, हमारी प्रकृति से बड़ा कलाकार कोई हो ही नहीं सकता !
- ध्रुव गुप्त