कांग्रेस लगातार दूसरी बार लोकसभा में सिर्फ सत्ता से ही नहीं पिछड़ी, बल्कि मुख्य विरोधी दल बनने की हैसियत में भी वह फिर नहीं बची। इसे क्या समझा जाए? कांग्रेस नेताओं का फिसड्डीपन या उसके अध्यक्ष राहुल गांधी का सक्षम नहीं होना! कहा जा सकता है, कि 2014 में कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी थीं। लेकिन सभी को पता है, चुनाव के कुछ ही महीनों पहले राहुल गांधी उपाध्यक्ष बन गए थे, और चूंकि सोनिया गांधी अस्वस्थ थीं, इस नाते पार्टी की कमान राहुल गांधी ही संभाले हुए थे। अतः 2014 की हार की ज़िम्मेदारी भी राहुल की ही बनती है। और 2019 का चुनाव तो लड़ा ही राहुल के नेतृत्त्व में गया, इसलिए वे बरी नहीं हो सकते। इसमें कोई शक नहीं, कि कांग्रेस देश की सबसे पुरानी और सर्वाधिक विश्व्स्त राजनीतिक दल है। हर एक को मालूम है, कि कांग्रेस भविष्य में आएगी ही, और कभी भी कांग्रेस-मुक्त भारत नहीं हो सकता। लेकिन दुख इस बात का है, कि राहुल गांधी के नेतृत्त्व में कांग्रेस का उबरना बहुत मुश्किल है। कांग्रेस के नेताओं को विचार करना चाहिए।
यह कह देने से काम नहीं चलेगा, कि राहुल गांधी अनुभवहीन हैं, या वे अभी दांव-पेंच में माहिर नहीं हैं। अगर ऐसा है, तो उन्हें अध्यक्ष क्यों चुना गया? वे जवाहरलाल नेहरू के परनाती हैं या इन्दिरा गांधी के पोते और दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पुत्र हैं, यह कोई योग्यता नहीं होती। सच तो यह है, कि वे नाकारा हैं और दूसरों के सिखाए पर चलने वाले रोबोटमात्र हैं। अगर कांग्रेस ने उन्हें नहीं बदला तो कांग्रेस का मोदी से मुक़ाबला मुश्किल होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतने कुशल राजनीतिक खिलाड़ी हैं, कि वे विपक्ष की दशा और दिशा स्वयं तय कर देते हैं, इसलिए विपक्ष वही बोलता है, जो वे चाहते हैं। यही कारण है, कि 2019 में पाँच साल की एंटी-इंकम्बेंसी के बाद भी वे 2014 के मुक़ाबले अपनी पार्टी करीब 25 सीटें और दिला दे गए। मगर कांग्रेस अध्यक्ष फिसड्डी साबित हुए। दरअसल राहुल गांधी को अगर सीरियसली कांग्रेस को अवसाद और हार की निराशा से उबारना है, तो सबसे पहले अपनी सलाहकार मंडली को बदलना होगा। उनकी सलाहकार मंडली में जो अल्ट्रा लेफ्ट और हिन्दू-विरोधी बुद्धिजीवी घुस आए हैं, उन्हें बाहर करना होगा। जो लोग हिन्दू समाज में आज भी जातिवाद फैलाकर अपनी राजनीति करने को आतुर हैं, उन पर रोक लगानी होगी। वरना ये खुद तो डूबेंगे ही, एक अच्छी-ख़ासी पार्टी को ले डूबेंगे।
याद करिए, जब 2014 में केंद्र में नरेंद्र दामोदरदास मोदी सत्तारूढ़ हुए थे, उसी दिन से अल्ट्रा लेफ्ट तत्त्वों ने स्यापा डालना शुरू कर दिया था। अब केंद्र में जो भी दल सत्तारूढ़ हुआ है, उसको बधाई देना और शुभकामनाएँ प्रेषित करना एक सामान्य शिष्टाचार है। किन्तु अल्ट्रा लेफ्ट तत्त्वों ने रोना-पीटना और मोदी को गालियां देनी शुरू कर दीं। मुझे याद है, कि 1977 में जब जनता पार्टी सत्तारूढ़ हुई थी, तब सीपीआई से जुड़े प्रगतिशील लेखक संघ की कानपुर इकाई के सचिव ने मुझसे कहा था, कि यह फासिस्ट तत्त्वों की जीत है, और अब लेखन नहीं हो सकता। ठीक इसी तरह मोदी के आते ही वामपंथ से जुड़े साहित्यकारों ने रोना-चिल्लाना शुरू कर दिया, कि लेखकीय स्वायत्ता का गला घोंटा जा रहा है। जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ। लेकिन दिल्ली में इंडिया इंटरनेशनल क्लब, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी तथा ऐसे ही तमाम संस्थानों में ऐश कर रहे वाम-विचारकों को अपनी सुविधा में खलल पड़ते दिखा, इसलिए वे चीखने लगे थे। वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल माहेश्वरी कहते हैं, कि लेफ्ट बुद्धिजीवी अब इतने सुविधापरस्त हो गए हैं, कि केंद्र में उनके मनमाफिक दल के न आने की आहट से ही वे बेचैन हो जाते हैं। वे बताते हैं कि गत दिनों जब वे आजमगढ़ गए हुए थे, तब वहाँ के मुसलमानों ने उन्हें मोदी अथवा योगी राज्य से कोई भी दिक्कत नहीं बताई। लेकिन वाम बुद्धिजीवी एक सुर से यह राग आलाप रहे हैं, कि देश का मुसलमान खतरे में है। वाम-बौद्धिकों की यह आभाषी लड़ाई मुसलमानों को भी मुख्य-धारा में नहीं आने दे रही।

मोदी दरअसल 2014 में ही हर दल के लिए चुनौती बन गए थे, लेकिन कोई भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था। वे मोदी को एक चाय वाला, संघ प्रचारक या राजनीति का नौसिखुआ खिलाड़ी ही समझते रहे। उनको लगता रहा, कि अरे गुजरात से आया यह आरएसएस का पूर्व प्रचारक भला इतने सशक्त और पुराने खुर्राट राजनेताओं का क्या बिगाड़ पाएगा? अपने इसी अहंकार में वे न तो नरेंद्र मोदी को समझ पाए, न अमित शाह की क्षमताओं को। नतीजा सामने है। अपने देश कि जनता का मिजाज़ अलग है। यहाँ कभी किसी को अपशब्द बोलकर, उसे खुल्लम-खुल्ला हीन बता कर आप “नायक” नहीं बन सकते। कांग्रेस के अन्दर के अल्ट्रा लेफ्ट नेताओं ने यही किया। वे हिन्दुओं को सरेआम गालियाँ देने लगे। मणिशंकर अय्यर तो थे ही, पी. चिदंबरम भी उसी हवा में बह गए। अब परिणाम प्रत्यक्ष है। अगर नहीं समझा गया, तो आगे मोदी की चुनौती और प्रचंड होती जाएगी। खासकर कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय राजनीतिक दल के लिए यह पराभव बहुत खतरनाक है। क्षेत्रीय दलों को केंद्र की सत्ता पाने की न तो ज्यादा हवश होती है, न उनके लिए अकेले संभव होता है। लेकिन कांग्रेस के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। लगातार दो लोकसभा में विपक्ष का नेता बन पाने तक की उसकी हैसियत नहीं रह गई है, तो कैसे वह आगे सत्ता में वापसी की आस लगाएगी!
ऐसे में कांग्रेस को एक मध्य-मार्गी दल होने के नाते इस पर विचार करना होगा, कि वह एक अलग स्टैंड निर्धारित करे। किन्तु मौजूदा अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए यह संभाव नहीं है, क्योंकि इसके लिए जो साहस, लगन और निरंतरता चाहिए, वह राहुल गांधी के लिए मुश्किल है। राहुल गांधी एक परिवार की विरासत से प्राप्त संपत्ति के उत्तराधिकारी बने हैं। इसे पाने के लिए उन्होंने कोई संघर्ष भी नहीं किया, न ही इस संपत्ति का संरक्षण और संवर्धन उनके वश का है। बेहतर तो यही होगा कि कांग्रेस अपने समावेशी चरित्र को बचाने के लिए नेहरू-इन्दिरा परिवार से बाहर से किसी अनुभवी और तेज़-तररक नेता को चुने। और यह भी तय करे कि अध्यक्ष और प्रधानमंत्री का चेहरा सदैव अलग-अलग व्यक्ति होगा। इससे संगठन भी मजबूत बनेगा और पार्टी के अंदर सरकार चलाने वाला नेता एक नई शक्ल से उभरेगा।"
शंभूनाथ शुक्ल,सीनियर जर्नलिस्ट