भगवान श्री बद्रीनाथ की मुझ पर बड़ी असीम कृपा रही है उन्होंने बार-बार ,कई बार अपने चरणों में मुझे बुलाया और लगातार 1 वर्ष तक सेवा करने का अवसर भी प्रदान किया .आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा भारत में स्थापित चार धामों में उत्तर का महत्वपूर्ण धाम बद्रिकाश्रम यानी बद्रीनाथ धाम है यह वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन है . इसी धाम में लक्ष्मी मां भगवान विष्णु से अलग ध्यान में विराजमान हैं . मान्यता है की बद्रिकाश्रम में प्रत्येक प्रकार की सेवा पूजा अर्चना का फल 1000 गुना प्राप्त होता है ।
सबसे पहले वर्ष 1983 में मुझे बद्रीनाथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ यह वह वक्त था जबकि बद्रीनाथ पहुंचने का मार्ग बहुत दुर्गम था और बद्रीनाथ में देवदर्शनी से पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस तक कोई व्यावसायिक आबादी नहीं थी . तीर्थयात्रियों की संख्या भी सीमित थी .
वर्ष 1990 में उत्तर प्रदेश पुलिस के सब इंस्पेक्टर पद पर आने के बाद वर्ष 1991 में तत्कालीन राष्ट्रपति श्री आर वेंकटरमन के बद्रीनाथ आगमन पर वी बी.आई पी. भ्रमण के कार्यक्रम की व्यवस्था संबंधित जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई .तब से बद्रीनाथ के महत्वपूर्ण निवासियों और ब्यवसायियो से परिचय प्रारंभ हुआ ।
वर्ष 1994 -1995 यात्रा सीजन में बतौर थाना प्रभारी सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ ,यह वह समय था जब उत्तराखंड आंदोलन अपने चरण में था ,यहां के निवासियों और नौकरी पेशा लोगों के भीतर भी अलग उत्तराखंड राज्य बनने का विश्वास और उसको लेकर कुछ सपने जाग गए थे , यह वह वक्त भी था जब यात्रा ने विस्तार लेना प्रारंभ कर दिया था ऋषिकेश से माणा तक का दुर्गम मार्ग सीमा सड़क संगठन ने अपनी कडी़ मेहनत से यात्रा के लिए थोड़ा चौड़ा और सुगम बना दिया था .परिणाम स्वरूप यात्रा बढ़ने लगी थी. इसी दौर में गोविंदघाट घांघरिया में भी कई छोटे होटल ढाबे स्थापित हुए और हेमकुंड साहिब की यात्रा भी विस्तार पाने लगी . उन दिनों यात्रा सीजन मई-जून में औसतन 2 से 3 हजार यात्री बद्रीनाथ दर्शन के लिए पहुंचते थे .कभी-कभी यह संख्या 5000 भी पहुंच जाती थी .जिस दिन यह संख्या 5000 पहुंचती थी .उस दिन धर्मशाला ,होटल भर जाते थे. और बद्रीनाथ की व्यवस्था धड़ाम हो जाती थी . यात्रा के चरमोत्कर्ष पर मंदिर में दर्शनार्थियों की लाइन मुश्किल से 50 -100मीटर ही लगती थी . जुलाई-अगस्त का माह तब बद्रीनाथ में बरसात के कारण लगभग ऑफ सीजन हो जाता था कुछ व्यापारी वापस ऋषिकेश हरिद्वार लौट आते थे लेकिन अधिकांश स्थानीय व्यापारी और निवासी बद्रीनाथ में ही प्रवास करते थे.
उन दिनों जोशीमठ में उपाध्याय जी जो कि आर्मी मेजर से रिटायर थे एसडीएम हुआ करते थे .वह अपनी हनक के लिए भी जाने जाते थे, तब स्थानीय नागरिकों में श्री शशिकांत ध्यानी जी ,गुणानंद जी , राजीव गोस्वामी साकेत वाले, श्री मंदरवाल जी प्रबंधक जीएमवीएन , परमार्थ लोक के स्वामी मंगलानंद जी राधा कृष्ण भट्ट जी श्री बलदेव मेहता जी विष्णु जी जो बाद में मंदिर के रावल भी हुए , हम सब जुलाई माह में रोज अलग-अलग स्थानों पर बैठकर गपशप मारते थे और बेहतर बद्रीनाथ बनाने के लिए योजनाएं भी बनाते थे जिन्हें एसडीम उपाध्याय तथा श्री मनोहरकांत ध्यानी जी तत्कालीन मन्दिर समिति अध्यक्ष के माध्यम से अमलीजामा पहनाए जाने के पुरजोर प्रयास भी किए गए , उन्हीं बैठकों में बद्रीनाथ जी पैदल मार्ग में तप्त कुंड के ऊपर एक नया पुल बनाने , थाने के नीचे पावर हाउस से देवदर्शनी तक एक अलग बाईपास बनाने , देवदर्शनी के सामने बामणी गांव के नीचे एक अलग मोटर पुल बना कर वहां चार पहिया वाहनों की पार्किंग के साथ ही पुराना बद्रीनाथ मार्ग जो चरण पादुका ,बामणी गांव होकर मंदिर तक पहुंचता है को भी पैदल मार्ग के रुप में सुचारू करने की बातें होती थी .
इस वर्ष प्रधानमंत्री ड्यूटी के बहाने लगातार तीन दिन बद्रीनाथ में प्रवास करने का मौका मिला बहुत से पुराने लोगों से मुलाकात हुई , कुछ साथी अब इस दुनिया में नहीं रहे तो कुछ स्वास्थ्य कारणों से बद्रीनाथ नहीं आते . बद्रीनाथ भ्रमण में उन दिनों के हमारे कई ड्रीम प्रोजेक्ट अब पूरे हो गए हैं उन्हें देख कर अच्छा लगा , जैसे तप्त कुन्ड के ऊपर नए पुल का बन जाना,देवदर्शनी तक नया मार्ग बनना मगर इस मार्ग में भारत सेवा संघ आश्रम की एक दीवार आ जाने से मार्ग सुचारू नहीं है अन्यथा वन वे ट्रैफिक किया जाना आसान होता . मौजूदा समय में बद्रीनाथ में सीजन के समय औसतन 15000 यात्रियों का आगमन होता है यानी यात्रा का वॉल्यूम 5 गुना बढ़ गया है लेकिन हमारी तैयारियां और इंतजाम उस अनुपात में नहीं बड़े हैं , पहले साकेत तिराहे पर मंदिर समिति का एक शानदार स्वागत कक्ष होता था जहां से यात्रियों को सभी आवश्यक जानकारियां मिलती थी लेकिन अब वह स्वागत कक्ष चलन में नही है , यात्रियों को सूचना का कोई स्वतः सुलभ तंत्र स्वागत कक्ष आदि उपलब्ध नहीं है जिस कारण उन्हें भटकना पड़ता है . मंदिर दर्शन हेतु यात्रियों की लाइन अब ब्रह्म कपाल से आगे तक कोई 800 मीटर से एक किलोमीटर तक लगती है , दर्शन हेतु यात्रियों की बारी 2 से 3 घंटे के बीच आती है. इस मार्ग में बारिश से बचाव हेतु शेड तो है लेकिन यात्रियों की सुविधा और भक्ति भाव बढ़ाने के लिए 500, 500 मीटर पर वाटर कूलर लगानेके साथ ही मध्यम ध्वनि तथा एलईडी के माध्यम से भक्ति भावना बढ़ाए जाने के लिए सुब्बलक्ष्मी का विष्णु सहस्त्रनाम पाठ, विष्णु नामावली तथा उत्तराखंड पर्यटन के अन्य केंद्रो की जानकारी और सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाने वाला चलचित्र अथवा आडियो सिस्टम विकसित किए जाने की आवश्यकता है ।तांकि यह 3 घंटे बोझिल ना हो और भक्ति भाव बना रहे . मंदिर समिति में अब नया स्टाफ बहुत है .उन्हें उनके कार्य वितरण के आधार पर प्रशिक्षण और एक निश्चित ड्रेस कोड लागू किए जाने की आवश्यकता है तांकि भीड़ में यात्री मंदिर समिति के कर्मचारियों की अपने मददगार के रूप में पहचान कर सकें.
मंदिर समिति के मौजूदा अध्यक्ष श्री मोहन प्रसाद थपलियाल जी भी पुराने परिचित और सज्जन व्यक्ति हैं .उनसे इन बिंदुओं पर विचार विमर्श हुआ वह कुछ करना भी चाहते हैं. भगवान बद्री विशाल उनके संकल्पों को बल दें .देश के अन्य तीर्थ स्थलों की व्यवस्था जैसे वैष्णो देवी मंदिर ट्रस्ट, शिरडी का सांई धाम , तिरुपति बालाजी इन स्थानों पर यात्रियों की संख्या हमारे तीर्थ स्थलों से हमेशा ही अधिक रहती है लेकिन बहाव सुगम बना रहता है. इनकी व्यवस्थाओं का अध्ययन कर स्थानीय पंडा समाज के हितों को संरक्षित करते हुए उत्तराखंड में अब तीर्थाटन और पर्यटन के विकास के लिए अलग से विस्तृत अधिकारों वाले प्राधिकरण की आवश्यकता महसूस हो रही है .जिसका वर्षभर अपना तंत्र सक्रिय रहे, आखिर एक राज्य के रूप में पर्यटन और पर्यावरण ही तो हमारी प्राथमिकता हैं .
प्रमोद शाह