एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

त्रिभाषा का पाखंड: द्विभाषा लाइए


देश की नई शिक्षा नीति का जो प्रारुप नए शिक्षा मंत्री को सौंपा गया है, उसका तमिलनाडु में तगड़ा विरोध शुरु हो गया है। अभी वह प्रारुप ही है। वह अभी तक भारत सरकार की नीति नहीं बना है। फिर भी उसका विरोध तमिलनाडु के सभी दल एक स्वर से कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं? क्यों कि उसमें त्रिभाषा सूत्र की बात को दोहराया गया है। इसका अर्थ यह है कि सभी प्रांतों के स्कूलों में बच्चों को तीन भाषाएं पढ़ाई जाएंगी। प्रांतीय भाषा, राजभाषा हिंदी और अंग्रेजी। जवाहरलाल नेहरु के जमाने में बने इस सूत्र को तमिल पार्टियों ने तब भी रद्द कर दिया था और 1965 में लालबहादुर शास्त्री के जमाने में हिंदी के विरोध में इतना जर्बदस्त तमिल आंदोलन हुआ था कि उसमें दर्जनों लोग मारे गए और सरकार ने त्रिभाषा सूत्र को ताक पर रख दिया। वास्तव में त्रिभाषा-सूत्र अपने आप में बड़ा पाखंड है, क्योंकि हिदी क्षेत्रों के बच्चे कोई भी अन्य आधुनिक भाषा या अन्य प्रांतीय भाषा पढ़ने की बजाय संस्कृत पढ़ते हैं। हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी। हो गया त्रिभाषा सूत्र ! लेकिन अहिंदी प्रांतों के बच्चे हिंदी, अंग्रेजी और अपनी भाषा पढ़ते हैं। वे ईमानदारी बरतते हैं और हम बेईमानी ! इसीलिए जब तमिलनाडु के लोग कहते हैं कि हम हिंदी क्यों पढ़ें? आप तो तमिल पढ़ते नहीं और हम पर हिंदी थोपे चले जा रहे हैं। हिंदी को आप हम पर थोपेंगे तो आप पर हम युद्ध बोल देंगे। तमिलनाडु को भारत से अलग कर देंगे। हमारे पास उनके सवालों का कोई जवाब नहीं है। हमारे पास याने सरकार के पास ! सारी सरकारें इस मामले में निकम्मी सिद्ध हुई हैं, क्योंकि नेताओं को सोचने की फुर्सत ही नहीं है। वे नौकरशाहों के नौकर होते हैं। यदि भाषा के सवाल पर आप गंभीरता से विचार करें तो पूरे भारत में त्रिभाषा सूत्र की जगह द्विभाषा सूत्र लागू किया जाना चाहिए। अपनी स्वभाषा याने प्रांत-भाषा सीखो और हिंदी याने भारत-भाषा सीखो। प्रत्येक हिंदीभाषी छात्र के लिए एक अहिंदीभाषा सीखना अनिवार्य होना चाहिए। बच्चों को अंग्रेजी सिखाना बंद करो। हिरण पर यह घास लादने के समान है। कालेज पहुंचकर जो छात्र अंग्रेजी या कोई अन्य विदेशी भाषा सीखना चाहे, वह जरुर सीखे। संस्कृत भी जरुर सीखे। शिक्षा में अंग्रेजी इसलिए लादी जाती है कि वह सरकारी नौकरियों में अनिवार्य है। उसकी अनिवार्यता हर जगह से खत्म की जाए। संसद में अंग्रेजी बोलनेवाले को कम से कम छह महिने की सजा दी जाए, चाहे वह राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री हो। समस्त भारतीय भाषाओं को उचित सम्मान मिले तो तमिल बगावती तेवर क्यों अपनाएगी ?
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक