एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

वर्मा डेंटल हॉस्पिटल : रूट कैनाल पद्धति क्या है ?



बीते जमाने में दाँत खोखले होने पर निकालने के सिवा कोई चारा नहीं होता था। आज दंत चिकित्सा विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है। अब खोखले दाँतों को बचाना आसान हो गया है। रूट कैनाल ट्रीटमेंट मूल दाँतों को बचाने का तरीका है।
दाँतों की ऊपरी सतह यानी इनेमल पर सड़न हो तो उसे फिलिंग करके ठीक कर लिया जाता है, लेकिन जब सड़न जड़ (पल्प) तक पहुँच जाती है तो मरीज को बेहद दर्द होता है। ऐसे दाँतों को अब रूट कैनाल पद्धति से बचा लिया जाता है, जबकि पहले इन्हें निकाल दिया जाता था। दाँत निकालने का नुकसान यह होता था कि निकले हुए दाँतों के खाली हो चुके स्थान पर आसपास के दाँत खिसकने लगते थे। इससे एक तो मुँह का शेप बिगड़ता था, दूसरे खाना चबाने में तकलीफ होती थी। इसका एक ही उपाय था नकली दाँत लगाना। नकली दाँत भी दो तरीके से लगाए जाते हैं। एक किस्म का नकली दाँत निकल सकने वाला होता है, दूसरे किस्म के नकली दाँत को फिक्स कर दिया जाता है।

प्रत्येक दाँत में एक या एक से अधिक रूट कैनाल होती है। हर कैनाल में पल्प मौजूद रहता है। पल्प के अंदर नाड़ियाँ, खून की नलिकाएँ तथा जोड़ने वाले ऊतक होते हैं। सड़ने के कारण पल्प नष्ट हो जाता है जिससे असहनीय पीड़ा होती है।
क्या है रूट कैनाल पद्धति-
सड़े हुए दाँत के ऊपरी हिस्से यानी क्राउन से ड्रिल करके कैनाल को खोल लिया जाता है। इसके साथ पूरा पल्प निकाल लिया जाता है। इसके बाद पूरे कैनाल की हाइड्रोजन पैराक्साइड एवं सोडियम हायपोक्लोराइड से सफाई की जाती है। फिर फिलर से इसे पूरी तरह भर दिया जाता है। इसके बाद सिल्वर फिलिंग या टूथ कलर फिलिंग से दाँत को सील कर दिया जाता है। दाँत को मजबूती प्रदान करने के लिए रूट कैनाल ट्रीटमेंट के बाद इस पर कैप अथवा क्राउन लगाना आवश्यक होता है। क्राउन नहीं लगाने पर दाँत टूट सकता है।
कितना समय लगता है -
प्रारंभिक अवस्था में इलाज कराने पर एक अथवा दो सिटिंग में ही इलाज पूरा किया जा सकता है। पहली सिटिंग में ट्रीटमेंट टाइम 30-40 मिनट तक हो सकता है। अगर मरीज की लापरवाह से वहाँ संक्रमण हो जाए तो 4 से 5 सिटिंग लग सकती हैं।
आधुनिक उपकरण-
दंत चिकित्सा विज्ञान के आधुनिक उपकरणों ने जहाँ मरीजों की पीड़ा को कम किया है वहीं दंत चिकित्सक का काम भी आसान कर दिया है। वायरलेस डिजिटल एक्स-रे के उपयोग से रूट कैनाल ट्रीटमेंट अधिक कुशलतापूर्वक और कम समय में किया जा सकता है। मरीज को लैपटॉप पर उसके दाँत का एक्स-रे दिखाया जा सकता है। दाँत का आकार भी इसमें बड़ा और स्पष्ट दिखाई देता है। इससे चिकित्सक का काम भी आसान हो जाता है।
कितना दर्द होता है-
दंत चिकित्सा में मरीज को कितना कम या ज्यादा दर्द हो रहा है, इसका बड़ा महत्व है। लगभग सभी मरीज रूट कैनाल ट्रीटमेंट में होने वाले दर्द के बारे में जानना चाहते हैं। मरीज को सबसे पहले एंटीबायोटिक्स दिए जाते हैं। इससे मरीज को संक्रमण का जोखिम कम हो जाता है। यदि मरीज को असहनीय दर्द हो तो लोकल एनेस्थेसिया दिया जाता है। अगर इससे भी दर्द न मिटे तो पल्प डिवाइटालाइजर का प्रयोग किया जाता है। इससे मरीज को बिलकुल दर्द महसूस नहीं होता.