कल रात यूट्यूब पर अरसे बाद यह गीत सुना तो अतीत के कई दरवाज़े एक साथ खुल गए। राज कपूर और नरगिस अभिनीत 1956 की एक क्लासिक फिल्म 'चोरी चोरी' मेरे जीवन की पहली फिल्म थी। हमारे कस्बे गोपालगंज के एकमात्र जनता सिनेमा हॉल में यह फिल्म 1960 में लगी थी। बड़े लोगों से राज कपूर और नरगिस के इश्क़ के जाने कितने किस्से सुन रखे थे मैंने। एक रात पिता की कपड़ों की दुकान से कुछ पैसे चुराकर पहुंच गया सिनेमा के रात के शो में। पांच आने में थर्ड क्लास का टिकट खरीदा और पहली बार किसी सिनेमा हॉल का भीतर से दीदार किया।

तब सिनेमा हॉल का अगला एक तिहाई हिस्सा थर्ड क्लास होता था जिसमें जमीन पर दरियां और फटे हुए बोरे बिछे होते थे। पीछे बेंच वाला सेकंड क्लास और उसके भी पीछे कुर्सियों वाला फर्स्ट क्लास। तब पीछे बैठे लोगों को देखकर मुझे ताज़्ज़ुब हुआ था कि ये कैसे ज़ाहिल लोग हैं जिन्होंने ज्यादा पैसे खर्च कर अपने लिए हॉल के पीछे की जगहें चुनी हैं। मुझे थर्ड क्लास के अपने चुनाव पर गर्व हुआ और मैं सबसे आगे का एक बोरा पकड़ कर बैठ गया। स्क्रीन के सबसे निकट। फिल्म शुरू हुई तो धीरे-धीरे उसका जादू सर पर चढ़ने लगा। स्क्रीन के निकट से राज और नरगिस जी की विशालकाय छवियों ने मंत्रमुग्ध किया। फिल्म के दो गीतों - 'पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में' और 'ये रात भींगी-भींगी ये मस्त फिज़ाएं' ने तो जैसे ज़मीन से उठाकर किसी दूसरे ही आयाम तक पहुंचा दिया मुझे। आज भी इन दोनों गीतों को सुनकर मुझे कुछ अलग-सा, अतीन्द्रिय-सा अहसास होता है। उस रात घर लौटकर मैं देर तक इन दोनों गीतों को गुनगुनाता रहा।

गीत की एक पंक्ति 'ऐसे में कहीं क्या कोई नहीं भूले से जो हमको याद करे' गुनगुनाकर जाने क्यों आंखें भर आती थीं। बावजूद इसके कि उम्र का वह दौर प्यार का नहीं, मोहल्ले की लड़कियों से लड़ाई-झगड़ों और मारपीट का था। उस समय न घर में रेडियो था और न टेलीविज़न का दौर ही तब शुरू हुआ था। सो अगले एक सप्ताह तक हर रात सिनेमा हॉल के पास मंडराता रहा। इन गानों की आवाज़ आई नहीं कि थर्ड क्लास के दरवाज़े पर कान लगा देता था। कभी गेटकीपर जी मेहरबान हुए तो दरवाज़ा थोड़ा-सा खोलकर राज और नरगिस जी के दर्शन भी करा दिया करते थे। एक ज़माना बीत गया, लेकिन जीवन में पहली बार देखी हुई फिल्म 'चोरी चोरी' की भींगी-भींगी रात का जादू आज भी बरक़रार है। जीवन का पहला प्यार आखिर पहला प्यार ही होता है न !