एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

नैनीताल : खूबसूरती पर कलंक


सरोवर नगरी नैनीताल की सड़कें पेशाब से सन चुकी हैं। पैदल रास्तों पर नाक दबा कर चलना भी संभव न रहा। बारिश में सारी गंदगी झील में समा जाएगी, इसी पानी को शहर के लोग पीएंगे। पार्किंग फुल है, वाहन एक किलोमीटर की दूरी आधे घंटे में तय कर रहे हैं। आसपास के जंगल शराब, बियर और पानी की बोतलों से पटे हैं। पालीथिन कचरा इतना कि बरसाती गधेरों से बहना संभव नहीं। अभद्र लड़के-लड़कियां बात-बात पर ऐसी गाली बकते हैं कि सभ्य व्यक्ति परिवार के साथ सड़कों पर नहीं चल सकता। इनका पहनावा देखा नहीं जाता, हरकतें देख शर्म आती है।

...ये कहां से आए और किसलिए। इन्हें संस्कृति, सभ्यता की समझ नहीं। व्यापारियों ने खूबसूरत इलाके आबारगी और मौज-मस्ती के अड्डे बना दिए हैं। सरकार का जोर पर्यटन को बढ़ावा देने पर है, शहर में कोई सुविधा नहीं है। शुलभ शौचालयों में हर समय भीड़ रहती। आवारा लड़के जहां दीवार दिखे वहीं खड़े हो जाते हैं। रात में तो इन्हें सारी हरकतें खुले में करने का शौक सुमार हो जाता है। उजाला होने पर रास्तों किनारे नजर गई तो पेट का खाना हलक पर आता है।



...मैदानी इलाकों में जरा ताप बढ़ा तो हजारों लोग पहाड़ का मौसम खराब करने पहुंच जाते हैं। होटल व्यवसायी मौज-मस्ती की हर चीज उपलब्ध कराते हैं। यहां सारे अवैध काम चोरी-छिपे सुलभ रहते हैं बांकी चीजें महंगे दामों पर खुलेआम बिकती हैं। पुलिस इनको संरक्षण देती है। यहां के रहवासी किसी से कुछ कह दें तो मेहमानों के साथ अभद्रता का जुर्म भुगतना होता है। ऐसे लोगों का सार्वजनिक स्थलों पर जाना बैन होना चाहिए। 
...प्रकृति ने पर्वतीय समाज को कई मायनों में भिन्न बनाया है। यहां बारहों महीने लोग पूरे कपड़े पहना करते हैं। हाफ कमीज भी अटपटी लगती है। बोलचाल में विनम्र होते हैं, झगड़ा हो तब भी जुबान से गंदी गालियां नहीं निकलतीं। सभी के पक्के मकान होते हैं। घर, रास्ते और जंगल साफ रखते हैं। प्रकृति से बेहद प्रेम करते हैं। कहीं भी मकान बनाएं एक-दो पेड़ अवश्य लगाते हैं। सुंदर स्थल देखने हों तो सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करें। मनोरम रास्ते धीरे-धीरे पूरा करें। मूल निवासियों के जीवन में खलल न डालें। जंगलों में ऐसी वस्तुएं न छोड़ें कि उनमुक्त जंगली जानवरों की जान पर बन आए। इस ताल के किनारे कुछ नहीं है। पहाड़ घूमना हो तो वर्षभर घूमें। रोज नई, सुंदर, मनोरम जगहें दिखेंगी। मन प्रसन्न, चित शांत होगा। बेहुदी हरकतों के लिए यहां कोई स्थान नहीं है।
चंद्रशेखर जोशी.यह लेखक के निजी विचार है.फेसबुक वाल से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.