एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

ऐसे नहीं निपटा जाएगा पर्यावरण के संकट से





पूरी दुनिया में पर्यावरण का संकट गहराता जा रहा है,जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण आज पूरे विश्व की चिंता है । अपने देश में यह चिंता अभीे भले ही सेमिनारों से बाहर न निकल पा रही हो , लेकिन कई देश वाकई इस संकट को लेकर गंभीर हैं । तमाम दूसरे देशों में पर्यावरण को बचाने के लिए छोटी छोटी पहल शुरू हो चुकी हैं । मसलन,हाल ही में पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरे को भांपते हुए फिलीपींस ने अपनी शिक्षा प्रणाली से पर्यावरण को जोड़ा है । फिलपींस में ग्रेजुएट होने से पहले प्रत्येक छात्र को अनिवार्य तौर पर कम से कम दस पेड़ लगाने होंगे । अनुमान है कि फिलीपींस में इस फैसले से साल भर में ही करोड़ों की संख्या मे पेड़ लग जाएगा ।

यही नहीं आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में पानी का नल खुला छोड़ने को अपराध घोषित किया गया है । सिडनी में अब नल खुला छोड़ने पर कैद हो सकती है । यह फैसला हालांकि पानी को बर्बाद होने से बचाने के लिए लिया गया है, मगर इसका सीधा संबंध भी पर्यावरण संरक्षण से है । इसके अलावा और भी कई देशों में इस तरह की पहल शुरू हो चुकी है, किसी ने प्लास्टिक को पूरी तरह प्रतिबधित किया है तो किसी ने खुद को कार्बन मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है । अमेरिका के कोस्टा रिका ने तो खुद को कार्बन मुक्त करने के लिए अपनी पूरी परिवहन व्यवस्था को बदलने की तैयारी की है, 2021 तक परिवहन में यहां पेट्रोल डीजल का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद हो जाएगा । एक हम हैं न जाने कब चेतेंगे , करोड़ों करोड़ टन कचरा हर साल बढ़ाते चले जा रहे हैं ।
पर्यावरण दिवस के मौके पर आयोजित होने वाले सेमिनारों में जिन प्लास्टिक की बोतलों का पानी पीकर गला तर किया जाता है, अपने यहां तो वही पर्यावरण की बड़ी दुश्मन बनी हुई हैं। देश भर में दस हजार के करीब कंपनियां प्लास्टिक में पानी भर भरकर पिला रही है, सालाना आठ हजार करोड़ से ऊपर का कारोबार है । अंदाजा लगाइये अकेले इसी से कितना पर्यावरण बिगड़ता होगा । यकीन मानिये अपने उत्तराखंड के हाल तो बेहाल हैं, दूर से देखने मे पहाड़ सुंदर जरूर नजर आतें हों लेकिन पहाड़ों की स्थिति बहुत खराब है। पर्यावरण, जैव विविधता सब खतरे में है, लेकिन सिस्टम लाचार और जनता बेफिक्र है । आने वाली पीढ़ियों की फिक्र किसी को नहीं ।
काश , स्टार होटलों के एसी सभागारों में बैठकर पर्यावरण की चिंता करने वाले प्रदेश के नीति नियंता पहाड़ पर पैदल निकलते तो शायद उन्हें नजर आता कि पहाड़ के तमाम ढलान किस कदर प्लास्टिक कचरे से अटे पड़े हैं । दुखद पहलू यही है कि पर्यावरण की चिंता चंद लोगों के बीच उठती है और सम्मान समारोह के साथ वहीं खत्म भी हो जाती है । जबकि पर्यावरण के संकट से बिना जन सहभागिता के और बिना सख्ती के निपटना संभव ही नहीं है । खैर छोड़िये, न जाने हमारे देश और प्रदेश मेंकब शुरू होंगी ऐसी छोटी सार्थक पहल जो पर्यावरण बचाने में मील का पत्थर साबित हो सकें । कहा नहीं जा सकता, कभी होंगी भी या नहीं । फिलहाल इन हालात में तो ऐसा कुछ नजर आता नहीं....
By Yogesh Bhatt