एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

Drishti Center for Advanced Eye Care, Haldwani : आधे घंटे में चश्में से छुटकारा

आंखें भगवान ने इंसान को सबसे प्यारी और नायाब चीज दी है। यह पूरी दुनिया में सबसे कीमती चीज है जिसे भगवान ने हमें दिया है। आंखे जितनी खास और खूबसूरत होती है उतनी ही कोमल भी होती है। आंखों में किसी भी तरह की तकलीफ होने से इंसान घबरा जाता है और तुरंत डॉक्टर का सहारा लेता है। आप लोग देख ही रहें है की आज कल की भाग दौड़ भरी ज़िंदगी में लोग अपना ख्याल रखना भूल जाते है। मगर आंखो में कोई भी तकलीफ होने पर हम तुरंत डॉक्टर की सलाह पर चश्मा पहनते हैं। मगर बदलते वक़्त के साथ आप चश्मे की जगह लेसिक सर्जरी ने ले ली है। पहले डॉक्टर जहां चश्मा पहनने की हिदायत देते थे वही अब लेसिक सर्जरी करने के लिए कहते हैं। चलिए आज आपको बतातें है लेसिक सर्जरी आपके आंखों के लिए कितना अच्छा और बुरा है।
लेसिक सर्जरी आखिर क्या है: लेसिक सर्जरी वही लोग करा सकते हैं जिनके चश्मे का पावर -1 से -10 के बीच है। अगर आपका पावर इतना है तो तुरंत लें अपने डॉक्टर की राय और फिर बिना कोई देर किये करा लें लेसिक सर्जरी अपने आंखों की। आपको बता दें की लेसिक सर्जरी बाकि सभी प्रकार के सर्जरी से बहुत ही आसान है। यह बाकि किसी भी सर्जरी के मुक़ाबली कम ख़तरनाक है। सबसे अच्छी बात यह है की दूसरे सर्जरी के मुकाबले कॉर्निया को कम नुकसान पहुचाहता है।
यह सर्जरी बाकि सर्जरी के मुकाबले बहुत ही कम समय लेता है। यह सर्जरी केवल 30 से 35 मिनट के बीच हो जाता है।
डॉक्टर्स ज्यादा से ज्यादा लोग को लेसिक सर्जरी की सलाह देते हैं। इस सर्जरी से लोगो को कोई तकलीफ नहीं होती और साथ में वह अपने चश्मे से निजात भी पा लेते हैं। यह सस्ता होने के साथ आंखों के लिए काफी फायदेमंद होती है।
आंखों में लगा है चश्मा और आपको लगता है डर तो आपको बता दें की आंखों से जुडी कैसी भी समस्याओं और खतरों को काफी हद तक लेसिक सर्जरी कम कर देती है।
लेसिक लेजर या कॉर्नियोरिफ्रेक्टिव सर्जरी नजर का चश्मा हटाने की तकनीक है। इससे जिन दोषों में चश्मा हटाया जा सकता है, वे हैं:
1. निकट दृष्टिदोष (मायोपिया): इसमें किसी भी चीज का प्रतिबिंब रेटिना के आगे बन जाता है, जिससे दूर का देखने में दिक्कत होती है। इसे ठीक करने के लिए माइनस यानी कॉनकेव लेंस की जरूरत पड़ती है।
2. दूरदृष्टि दोष (हायपरमेट्रोपिया): इसमें किसी भी चीज का प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनता है,जिससे पास का देखने में परेशानी होती है। इसे ठीक करने के लिए प्लस यानी कॉनवेक्स लेंस की जरूरत होती है।
3. एस्टिगमेटिज्म: इसमें आंख के पर्दे पर रोशनी की किरणें अलग-अलग जगह फोकस होती हैं,जिससे दूर या पास या दोनों की चीजें साफ नजर नहीं आतीं।
कैसे करता है काम- लेसिक लेजर की मदद से कॉर्निया की सतह को इस तरह से बदल दिया जाता है कि नजर दोष में जिस तरह के लेंस की जरूरत होती है, वह उसकी तरह काम करने लगता है। इससे किसी भी चीज का प्रतिबिंब एकदम रेटिना 
खासियतें - चश्मा हटाने के ज्यादातर ऑपरेशन आज-कल इसी तकनीक से किए जा रहे हैं। सिंपल लेसिक में पहले से बने एक प्रोग्राम के जरिए आंख का ऑपरेशन किया जाता है, जबकि सी-लेसिक में आपकी आंख के साइज के हिसाब से पूरा प्रोग्राम बनाया जाता है।
- सर्जन का अनुभव, कार्यकुशलता, लेसिक लेजर से पहले और बाद की देखभाल की क्वॉलिटी लेसिक लेजर सर्जरी के नतीजे के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है।
- चश्मे का नंबर अगर 1 से लेकर 8 डायप्टर है तो लेसिक लेजर ज्यादा उपयोगी होता है।
- आज-कल लेसिक लेजर सर्जरी से -10 से -12 डायप्टर तक के मायोपिया, +4 से +5 डायप्टर तक के हायपरमेट्रोपिया और 5 डायप्टर तक के एस्टिग्मेटिज्म का इलाज किया जाता है।
कैसे करते हैं ऑपरेशन - इस ऑपरेशन में पांच मिनट का वक्त लगता है और उसी दिन मरीज घर जा सकता है। ऑपरेशन करने से पहले डॉक्टर आंख की पूरी जांच करते हैं और उसके बाद तय करते हैं कि ऑपरेशन किया जाना चाहिए या नहीं। ऑपरेशन शुरू होने से पहले आंख को एक आई-ड्रॉप की मदद से सुन्न (एनेस्थिसिया) किया जाता है। इसके बाद मरीज को कमर के बल लेटने को कहा जाता है और आंख पर पड़ रही एक टिमटिमाती लाइट को देखने को कहा जाता है। अब एक स्पेशल डिवाइस माइक्रोकिरेटोम की मदद से आंख के कॉर्निया पर कट लगाया जाता है और आंख की झिल्ली को उठा दिया जाता है। इस झिल्ली का एक हिस्सा आंख से जुड़ा रहता है। अब पहले से तैयार एक कंप्यूटर प्रोग्राम के जरिए इस झिल्ली के नीचे लेजर बीम डाली जाती हैं। लेजर बीम कितनी देर के लिए डाली जाएगी, यह डॉक्टर पहले की गई आंख की जांच के आधार पर तय कर लेते हैं। लेजर बीम पड़ने के बाद झिल्ली को वापस कॉर्निया पर लगा दिया जाता है और ऑपरेशन पूरा हो जाता है। यह झिल्ली एक-दो दिन में खुद ही कॉर्निया के साथ जुड़ जाती है और आंख नॉर्मल हो जाती है। मरीज उसी दिन अपने घर जा सकता है। कुछ लोग ऑपरेशन के ठीक बाद रोशनी लौटने का अनुभव कर लेते हैं, लेकिन ज्यादातर में सही विजन आने में एक या दिन का समय लग जाता है। पर बनने लगता है और बिना चश्मे भी एकदम साफ दिखने लगता है।