एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

स्टीव बुकनर की इंडियन टीम से खुन्नस रही




एक अंपायर होते थे, स्टीव बुकनर। जमैका के रहने वाले, छह फुट तीन इंच ऊंचे। कहा जाता था कि ऊंचे कद के कारण वो प्रोसीडिंग को अच्छी तरह से देख सकते थे। क्रिकेट अंपायरिंग से पूर्व वो फुटबाल के फ़ीफ़ा कप एक मैच में भी रेफरी रह चुके थे। उन्होंने 1989 से 2009 के बीच 128 टेस्ट्स और 181 ओडीआई में अंपायरिंग की। मगर उनका पूरा कार्यकाल विवादों से भरा रहा। उनके निर्णयों से बैट्समैन तो कभी खुश नहीं ही रहे, विपक्षी टीम भी ऐतराज जताती थीं। निर्णय देने में ज़रूरत से ज़्यादा समय लेते थे। इतने समय में तो बैट्समैन आश्वस्त हो जाता था कि वो नॉट आउट है, मगर अचानक ही उनकी उंगली जाती थी, बेचारा हक्का-बक्का और निराश सा बैट्समैन भारी कदमों से लौट आता था। इसीलिए उनका निक नेम था, स्लो डेथ। 
इंडिया के प्रति बुकनर की ख़ास खुन्नस तो जग ज़ाहिर रही। इसकी शुरुआत हुई 1992-93 के जोहानेसबर्ग टेस्ट से। साउथ अफ्रीका के पहली इनिंग में एक स्टेज पर 73 रन पर पांच विकेट गिर चुके थे, यानी बहुत ही ख़राब स्थिति। तभी जोंटी रोड्स के विरुद्ध रन आउट की अपील हुई। मगर बुकनर ने नॉट आउट दिया। इंडियन फील्डर्स की बार बार कॉंफिडेंट अपीलों के बावजूद थर्ड अंपायर को रेफेर नहीं किया। उन दिनों रन आउट की अपीलें थर्ड अंपायर को रेफेर करना अनिवार्य भी नहीं होती थीं। बाद में एक्शन रीप्ले में साफ़-साफ़ देखा गया कि रोड्स क्लीयर रन आउट थे। बुकनर द्वारा दिए इस जीवन दान का लाभ उठाते हुए रोड्स ने 91 रन बनाये जो अंततः ड्रा का कारण बने। 
1999 में पाकिस्तान के विरुद्ध कोलकोटा टेस्ट में शोएब अख़्तर द्वारा रास्ता रोकने के कारण सचिन तेंदुलकर के रन आउट का विवादास्पद मामला बुकनर ने ही थर्ड अंपायर को रेफर किया था जिसके कारण दंगा हुआ और स्टेडियम खाली कराके मैच पूरा किया गया जो पाकिस्तान के हक़ में गया। जबकि बुकनर इस पोज़िशन में खड़े थे कि साफ-साफ दिख रहा था कि शोएब ने अगर रास्ता न रोका होता तो सचिन आराम से क्रीज़ में पहुंच जाते। 2003-04 सीरीज़ के ब्रिस्बेन टेस्ट में सचिन तेंदुलकर के विरुद्ध जेसन गिलेप्सी ने एलबीडब्ल्यू की ज़ोरदार अपील की। मगर बुकनर खामोश रहे। निराश गिलेप्सी वापस अगली गेंद डालने के लिए अपने रन-अप की तरफ चल दिए और सचिन मुस्तैद होकर अगली गेंद का इंतज़ार करने लगे। मगर तभी स्लो डेथ बुकनर ने धीरे से उंगली उठा दी। तहलका मच गया।
 मगर अंपायर तो अंपायर, डीआरएस सिस्टम था नहीं। सचिन शून्य पर विदा हुए। हालांकि वो टेस्ट अंततः ड्रा हुआ। उसी सीरीज़ के अंतिम टेस्ट में बुकनर ने जस्टिन लैंगर और डेमियन मार्टिन के विरुद्ध एलबीडब्ल्यू की कॉंफिडेंट अपीलें ठुकरा दी, जबकि रीप्ले में वो आउट होते दिखे। सिर्फ इतना ही नहीं विकेट कीपर पार्थिव पटेल को उन्होंने बार-बार अपील करने पर बुरी तरह धिक्कारा। कप्तान सौरव गांगुली को बुकनर का ये व्यवहार इतना ख़राब लगा कि उन्होंने आईसीसी को बाकायदा शिकायत करते हुए ज़बरदस्त नाराज़गी ज़ाहिर की। 
इस सीरीज़ के फ़ौरन बाद ओडीआई ट्राई-नेशन सीरीज़ के ज़िंबाबवे के विरुद्ध मैच में राहुल द्राविड़ की गलती से च्यूंगम गेंद पर लग गयी। मैच रेफरी क्लाइव लायड ने उन पर पचास परसेंट मैच फी का जुरमाना लगाया। ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध अगले मैच में बुकनर ने द्राविड़ की तरफ देखते हुए गेंद पर च्यूंगम लगाने की मिमिक्री की। इसे अत्यधिक अपमानजनक मानते हुए टीम मैनेजमेंट ने रेफरी से शिकायत दर्ज कराई। पाकिस्तान के विरुद्ध 2005 में कोलकोटा टेस्ट की दूसरी इनिंग में सचिन को बुकनर ने विकेट के पीछे कैच आउट दिया जबकि गेंद और बैट के मध्य बहुत बड़ा फासला साफ़ दिखाई दे रहा था। शांत स्वभाव के सचिन भी उबल गए। उनका गुस्सा टीवी कैमरों ने साफ़ साफ़ दिखाया। 
2007 में इंडिया-ऑस्ट्रेलिया के सिडनी टेस्ट में तो इंतहा हो गयी। एंड्रयू साइमंड्स पर बुकनर बहुत ज़्यादा मेहरबान हो गए। पहली इनिंग में वो 30 रन पर साफ़-साफ़ कैच आउट थे, मगर बुकनर ने आंख बन रखी। साइमंड्स ने इसका फायदा उठाया और 162 रन ठोक डाले। बरसों बाद साइमंड्स ने स्वीकार किया कि वो वास्तव में आउट थे। दूसरी इनिंग में भी बुकनर की कृपा जारी रही। साइमंड्स को ज़ीरो पर अनिल कुंबले ने प्लंब कर दिया। मगर बुकनर की बंद आंख तब भी बंद रही। साइमंड्स 61 रन बना गए। किस्सा यहीं नहीं ख़त्म हुआ। इंडिया की दूसरी इनिंग में द्राविड़ को बुकनर ने विकेट के पीच कैच आउट दिया जबकि गेंद पैड से लग कर गयी थी। इस पर बहुत बड़ा हंगामा खड़ा हो गया। पूर्व अंपायर डिक्की बर्ड सहित तमाम विद्वानों ने माना बुकनर ज़्यादती पर हैं और उनकी समझ बूढ़ी हो चुकी है। इंडियन क्रिकेट बोर्ड को भी दखल देना पड़ा। तब खेल की उच्चता और भावना को ज़िंदा रखने के लिए आईसीसी ने अगले टेस्ट पर्थ में बुकनर को हटा कर बिली बोडेन को अंपायर नियुक्त किया। ज़ाहिर है, बुकनर ने इसे अच्छी स्परिट में नहीं लिया, उलटे इंडिया पर इलज़ाम लगाए। अगर वो मान लेते कि आखिर इंसान हूँ, गलती हो ही जाती है तो विवाद काफी हद तक ठंडा पड़ जाता। बहरहाल, ज्ञातव्य है कि बुकनर रहित वो पर्थ टेस्ट इंडिया ने 72 रन से जीता। 
साभार - वीर विनोद छाबड़ा