एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

गाँव और शहर के बीच बढती दूरियां

भारत सरकार के कृषि, किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कृषि उत्पादन की लागत घटाकर किसानों की आय बढ़ाने और जैविक खेती को बढ़ावा देने जैसी बातों के साथ ही ग्रामीण विकास के लिए गाँवों में भी शहरों जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने की जो जरूरत व्यक्त की वह बहुत देर से सोची गई अच्छी बात है।
कृषि और किसान की बेहतरी के लिए केंद्र सरकार ने अनेक योजनायें और कार्यक्रम चला रखे हैं। फसल का अधिकतम मूल्य और उन्हें नगद सहायता राशि जैसे कदम भी उठाये गये लेकिन श्री तोमर के बयान में शहरों जैसी मूलभूत सुविधाओं को ग्रामीण अंचलों तक पहुँचाने जैसी बात एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। गाँवों से आबादी के पलायन के पीछे केवल बेरोजगारी ही कारण नहीं है। आज भी कृषि क्षेत्र लोगों को काम देने का सबसे बड़ा जरिया माना जाता है।
लेकिन गाँवों में एक जबर्दस्त विरोधाभास नजर आने लगा। एक तरफ तो खेतों में काम करने हेतु श्रमिक नहीं मिलते वहीं दूसरी ओर काम की तलाश में लोग शहरों का रुख करते देखे जा सकते हैं। मझले किस्म के नगरों से लेकर महानगरों तक में फुटपाथों पर सोने वाले करोड़ों लोगों में से सभी को रोजगार नहीं मिलता लेकिन एक बार जिसने शहरों की चकाचौंध देख ली वह अपने गाँव लौटकर नहीं जाना चाहता।
हालाँकि अब अधिकतर ग्रामीण इलाकों में भी बिजली और सड़क पहुंच चुकी हैं लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मामलों में अभी भी काफी विषमता है। दुर्भाग्य से महात्मा गांधी की माला जपने वाले हुक्मरानों ने उनके ग्राम स्वराज जैसे विचार को केवल 2 अक्टूबर और 30 जनवरी के दिन याद रखने की चीज बना दिया है। स्व. अटलबिहारी वाजपेयी ने प्रधानमन्त्री बनने के बाद ग्रामीण सड़क योजना शुरू करते हुए जो क्रांतिकारी कदम उठाया था उसके बाद से ग्रामीण इलाकों में सम्पर्क और परिवहन आसान हो गया।
बीते कुछ सालों में वहां बिजली भी पहुंच गयी। मोदी सरकार ने दूसरी पारी में गाँव के हर घर को पानी की पाईप लाइन से जोडऩे का जो संकल्प लिया वह भी बड़ा ही जरूरी है लेकिन जब तक ग्रामीण अंचलों में बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था नहीं होती तब तक वे शहरों के मुकाबले पीछे ही माने जायेंगे और वहां से पलायन रोकना भी सम्भव नहीं होगा।
यदि श्री तोमर वाकई ईमानदारी से ग्रामीण इलाकों को भी शहरों के समकक्ष मूलभूत सुविधाओं से लैस करना चाहते हैं तब उन्हें इस दिशा में सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर आगे बढऩा चाहिए। ग्रामीण विकास का आधार ही शहरों जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता है जिनके अभाव में शहरी क्षेत्रों में आबादी का दबाव बढ़ता ही जा रहा है वहीं ग्रामों में काम करने वाले हाथों का अभाव हो रहा।
- रवीन्द्र वाजपेयी