दो राय नहीं हो सकती कि गायन की दुनिया में सबसे ज्यादा फैन क्लब सिर्फ और सिर्फ मोहम्मद रफ़ी के नाम हैं। आज ही के दिन 1980 को उनका इंतक़ाल हुआ था। उनका जन्म अमृतसर के पास एक गांव कोटला सुल्तानपुर में 24 दिसंबर 1924 को हुआ था।
रफ़ी की गायकी की बारीकियों के बारे में बात करना सूरज को दिया दिखाने के समान है। वो बेमिसाल थे। हर तरह के गाने गा सकते थे। चाहे क्लासिकल हो या वेस्टर्न। गंभीर हो या कॉमेडी। उनकी आवाज़ का फ़लक़ बेहिसाब था।
अगर उन्हें मालूम होता था कि उनका गाना फलां कलाकार पर फ़िल्माया जाना है तो फिर कहने ही क्या। वो खुद अदाकार बन जाते थे। धीर-गंभीर दिलीप कुमार हों या चुलबुले जानी वॉकर या फिर विद्रोही स्टार शम्मी कपूर। वो उनकी आवाज़ बन जाते। प्रदीप कुमार, राजेंद्र कुमार और देवानंद की भी रफ़ी बरसों स्थायी आवाज़ रहे।
अदाकारी की निचली पायदान माने जाने वाले बिस्वाजीत (पुकारता चला हूँ मैं.…) और जॉय मुखर्जी (आँचल में छुपा लेना कलियां…) सरीखे अभिनेताओं के बारे में कहा जाता था कि वो अगर फ़िल्मों में खड़े हो पाये तो उन पर फिल्माए रफ़ी के गानों की वज़ह से।
रफ़ी जितने बेहतरीन गायक थे उतने ही बेहतरीन इंसान भी। किसी भी नए कलाकार को अपनी आवाज़ देने में कोई संकोच नहीं था उनमें। कॉमेडियन को भी आवाज़ को आवाज़ देकर इज़्ज़त बख़्शने वाले रफ़ी साहब पहले थे। इस श्रंखला में जॉनी वॉकर का नाम टॉप पर रहा।
मुफ़लिसी के दौर से गुज़र रहे संगीतकार निसार बज़मी की 'खोज' के लिए रफ़ी ने एक रूपये में गाया। उन दिनों बज़्मी साब को कोई घास नहीं डालता था। बाद में बज़्मी पाकिस्तान चले गए और बहुत बड़े संगीतकार बन गए।
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को भी शुरुआती दौर में पैर ज़माने में रफ़ी साहब ने बहुत मदद की। उनकी पहली फिल्म 'छैला बाबू' के लिए पहला गाना बिलकुल मुफ़्त में गाया। उन्हें नई फिल्मे भी दिलाईं। 'दोस्ती' में 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे…से लक्ष्मी-प्यारे कहां से कहां पहुंच गए। इसके लिए रफ़ी साब को बेस्ट सिंगर का फिल्मफेयर पुरुस्कार भी मिला। संगीतकार रोशन के पुत्र राकेश रोशन की पहली फिल्म 'आपके दीवाने' के लिए रफ़ी साहब ने सिर्फ एक रुपए मेहनताना लिया था। दुनिया जानती है कि बतौर निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन आज किस बुलंदी पर हैं।
बाद के कैरियर में कुछ विवाद उठने के कारण रफ़ी साब अलोकप्रिय भी हुए थे।
लता जी से उनके झगड़े की कई कहानियां अफ़वाह फ़ैक्टरी में बनायीं गयीं। लेकिन रिकॉर्ड में यह है कि उनका झगड़ा फिल्मों में गाने की रॉयल्टी को लेकर हुआ। लताजी गाने के लिए मेहनताने के साथ-साथ रॉयल्टी भी चाहती थी। प्रोड्यूसर इसके विरुद्ध थे और रफ़ी उनका पक्ष लेते थे। इस मुद्दे पर बात इतनी गर्म हुई कि रफ़ी साहब ने ऐलान किया कि वो लता जी के साथ नहीं गाएंगे। यही स्टैंड लता जी ने भी लिया। यह भी एक डिस्प्यूट है कि पहले किसने गाने से मना किया।
कुछ लोग बताते हैं कि 'माया' फिल्म में एक गाने (तस्वीर तेरी दिल में जिस दिन से उतारी है.…) की चंद पंक्तियों के कारण संबंध ख़राब हुए थे। संगीतकार सलिल चौधरी ने लता का साथ दिया। एक इंटरव्यू में उषा तिमोती ने बताया था कि ये सब तो बहाने थे। असल वज़ह थी कि रफ़ी जी अपनी आदत के अनुसार हमेशा नए गायक को प्रमोट करते थे। इसी कड़ी में उन्होंने सुमन कल्याणपुर को प्रमोट किया। लताजी को ये बात पसंद नहीं आई। यों लता जी संगीतकार शंकर-जयकिशन के शंकर के साथ भी गायिका शारदा को प्रमोट करने के मुद्दे को लेकर भी नाराज़ हुई थीं।
उस ज़माने में लोगों को हैरानी होती थी कि आख़िर रिश्तों में इतनी खटास क्योंकर आ गयी कि एक-दूसरे को भाई-बहन मानने वाले रफ़ी और लता एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं गंवाते दिखे।
संगीतकार जयकिशन ने 1967 में रफ़ी और लता की सुलह करा दी। अच्छी गायकी के चाहने वालों ने दिल खोल कर स्वागत किया। इसके बाद दोनों के कई गाने रिकॉर्ड हुए।
कोई पांच साल पहले फिर विवाद खड़ा हो गया। लता जी ने एक समारोह में बताया कि रफ़ी साहब ने उनसे लिखित माफ़ी मांगी थी। जबकि रफ़ी के बेटे शाहिद रफ़ी का कहना है कि माफ़ी नहीं मांगी गयी थी और अगर ऐसा था तो लता जी माफ़ीनामा दिखायें। वो माफ़ीनामा अभी तक पेश नहीं हो सका है।
बहरहाल, इन तमाम विवादों के बावजूद रफ़ी साब का कद कम नही हुआ। दुनिया उन्हें एक ऐसे गायक के रूप में याद रखती है जिसका कोई सानी नहीं।
रफ़ी साहब एक सच्चे मददगार होने के अलावा बेहद भावुक भी थे। मन तड़पत हरी दर्शन को आज.… और बाबुल की दुआएं लेती जा.…बताते हैं वो इन गानों की रिकॉर्डिंग पर फूट फूट कर रोये थे। कई कई दिन तक रियाज़ किया।
सर्वश्रेष्ठ गायन के लिए फिल्मफेयर अवार्ड में रफ़ी 21 बार नॉमिनेट हुए और छह बार वो जीते। एक बार राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला था।
उनकी अमर आवाज़ आज भी कानों में गूंजती हैं - सुहानी रात ढल चुकी…ओ दुनिया के रखवाले…हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए.…देखी ज़माने की यारी, बिछुड़े सभी बारी बारी…मिली ख़ाक में मोहब्बत …मधुवन में राधिका नाचे रे.…मैं ज़िंदगी में हरदम रोता ही रहा हूं.…सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए.…तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना…और कर चले हम जानो तन साथियों…मेरी आवाज़ सुनो प्यार का राग सुनो…ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे, अफ़सोस हम न होंगे…हर शोक को हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...
जब तक फ़िज़ा है रफ़ी रहेंगे। अमर आवाज़ें कभी ख़त्म नहीं होतीं।
-वीर विनोद छाबड़ा