एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

राजनीति पर रुपैया भारी

यदि अगस्त का पहला हफ्ता भारत में कश्मीर के पूर्ण विलय का हफ्ता माना जाएगा तो अगस्त का यह आखिरी डेढ़ हफ्ता भारतीय अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने का माना जाएगा। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने मंदी को सुधारने के 32 उपाय प्रतिपादित किए। उद्योगपति और व्यवसायी लोग अपने धंधों को गति दे सकें और बैंक उनकी मदद कर सकें, इसलिए बैंकों को सरकार ने 70 हजार करोड़ रु. देना तय किया !
26 अगस्त को रिजर्व बैंक ने भारत सरकार को 1.7 लाख करोड़ रु. देने की घोषणा कर दी और 28 अगस्त को वित्तमंत्री ने ऐसी घोषणाएं कर दीं, जिनसे भारत में विदेशी विनियोग में आसानी होगी। इसके अलावा गन्ना किसानों को छह हजार करोड़ से ज्यादा की सहायता दे दी और 75 नए मेडिकल कालेज खोलना भी तय कर
शीघ्र ही सरकार भवन-निर्माण के क्षेत्र में और आयकर में भी बहुत-सी रियायतों की घोषणा करनेवाली है। यह सब सरकार को इतनी हड़बड़ी में क्यों करना पड़ रहा है ? इसीलिए करना पड़ रहा है कि देश का सकल उत्पाद काफी घटने का डर है। बेरोजगारी पिछले 6-7 साल में इतनी बढ़ गई है कि जितनी पिछले 70 साल में कभी नहीं बढ़ी। इस समय देश में लगभग डेढ़ करोड़ लोग बेरोजगार हो गए हैं। अकेले मोटर-कार उद्योग में साढ़े तीन लाख लोग घर बैठ गए हैं।
बिस्कुट कंपनी पार्ले ने 10 हजार कर्मचारी छांट दिए हैं। भवन-निर्माण उद्योग लगभग दीवालिया हो गया है। हजारों फ्लेट खाली पड़े हैं। उन्हें खरीददार नहीं मिल रहे हैं। आम आदमी की क्रय—शक्ति घट गई है। नोटबंदी ने लाखों मजदूरों और व्यापारियों के घुटने तोड़ दिए हैं। जीएसटी भी ऐसे लचर-पचर ढंग से लागू की गई कि उससे लोगों को फायदा कम, नुकसान ज्यादा हो गया।
बैंकों का अरबों-खरबों रु. नेताओं और कर्जदारों की मिलीभगत के कारण डूब गया है। उम्मीद है कि अभी वित्त मंत्रालय आनन-फानन जो कदम उठा रहा है, उससे स्थिति कुछ सम्हलेगी वरना यह निश्चित है कि कश्मीर का पूर्ण विलय और बालाकोट जैसी राजनीतिक घटनाओं के जरिए सरकार ज्यादा दिन तक अपनी छवि बनाए नहीं रख पाएगी। ज्यों ही बेरोजगारी और मंहगाई बढ़ी कि सारे देश में हा-हाकर मचना शुरु हो जाएगा। विरोधी दलों की आवाज़ें अपने आप बुलंद होती चली जाएंगी।
पांच-खरब की अर्थ-व्यवस्था का सपना देखनेवाली सरकार की सारी ताकत खुद को बचाए रखने में खर्च हो जाएगी। राजनीति पर रुपैया भारी पड़ जाएगा। इस समय जरुरी यह है कि सरकार देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों के साथ मुक्त संवाद कायम करे और अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए साहसिक कदम उठाए l 
डॉ. वेदप्रताप वैदिक