एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

सबके लिए एक-जैसा कानून

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक ताजा फैसलों में भारत की अब तक की सभी सरकारों की मरम्मत कर दी है। उसने कहा है कि संविधान की धारा 44 में सारे देश के लिए एक-जैसी नागरिक संहिता बनाने का जो संकल्प था, उसे आज तक किसी भी सरकार ने पूरा क्यों नहीं किया है। उसका जो कारण मुझे समझ में आया है, वह यह है कि कोई भी सरकार घर बैठे मुसीबत मोल नहीं लेना चाहती।
वह सांपों के पिटारे में हाथ नहीं डालना चाहती। सबके लिए एक-जैसा कानून तो सैकड़ों मामलों में बना ही हुआ है लेकिन शादी-ब्याह, संपत्ति का बंटावारा, तलाक, बहुविवाह, मैत्री-सहवास आदि कुछ मामले ऐसे हैं, जिन्हें धर्मों से जोड़ दिया गया है। उनमें यदि कोई भी सुधार आप करेंगे तो आपके खिलाफ सारे धर्मध्वजी एकजुट हो जाएंगे और देश में बगावत फैला देंगे। जब 1956 में हिंदू कोड बिल बना था तो हिंदुत्ववादी संगठनों ने उसका विरोध किया था।
अब जैसे ही एक-जैसे नागरिक कानून की बात होती है, हमारे इस्लामी, पारसी, यहूदी, सिख और ईसाई धर्मध्वजी आपत्ति करने लगते हैं। हमारे नेताओं का आध्यात्मिक और नैतिक स्तर इतना ऊंचा नहीं है कि उनकी सर्वहितकारी बातों को भी वे लोगों के गले उतार सकें। वरना वे सभी धर्मों के लोगों को विश्वास दिला सकते हैं कि नया कानून उनके धर्म की मूल भावना को बिल्कुल चोट नहीं पहुंचाएगा। वह हिंदुओं को निकाह पढ़ने या मुसलमानों को फेरे पड़ने या ईसाइयों और यहूदियों को वेदपाठ करने के लिए मजबूर कतई नहीं करेगा। उन्हें विवाह जिस पद्धति से करना है, करें। पांच हजार साल पुरानी अपनी धार्मिक पद्धति को अपनाना है तो जरुर अपनाएं लेकिन सैकड़ों-हजारों साल पुराने घिसे-पिटे कानूनों को आंख मींचकर मानने की क्या तुक है ? कानून तो मनुष्यों ने बनाए हैं।
वे देश-काल के मुताबिक बनते हैं, बदलते हैं। आज भी दुनिया के संविधानों में कितने संशोधन होते रहते हैं। आज बहुपत्नी या बहुपति-प्रथा, दहेज, तीन तलाक, संपत्ति पर सिर्फ पुत्र का अधिकार, बाल विवाह, विधवा विवाह निषेध, सती प्रथा, मामा-भानजी विवाह जैसी गई बीती, अनैतिक और अव्यवहारिक कुप्रथाओं को मानना जरुरी क्यों है ? देश के समाज-सुधारकों को अपने-अपने क्षेत्र में जबर्दस्त आंदोलन चलाने चाहिए और हिंदू कोड बिल, मुस्लिम व्यक्तिगत कानून और केनन लाॅ जैसे धार्मिक कानूनों के स्थान पर सारे देश के नागरिकों के लिए एक-जैसा कानून सरकार को प्रस्तावित करना चाहिए। उस प्रस्तावित समान नागरिक संहिता पर साल-छह माह तक खुली बहस होनी चाहिए और फिर संसद उसे सर्वसम्मति से पारित करे। वह अन्य देशों के लिए अनुकरणीय बन जाए, ऐसी पहल भारत को करनी चाहिए।
डॉ. वेदप्रताप वैदिक