अवसाद यानी डिप्रेशन को ढूँढ़ने की कोशिशें मस्तिष्क के अलावा कहीं किसी अन्य अंग में चलें , यह थोड़ा मुश्किल जान पड़ता है। मनोभावों की पीठिका मस्तिष्क है और ऐसे में मनोभावों से सम्बन्धित रोगों के उद्भव और विकास को और कहाँ खोजा जाए ? ऐसे में ताज्जुब तब होता है जब शोध यह बताने लगते हैं कि डिप्रेशन होने की वजहों में से अनेक रोगियों की आँतों में छिपी हुई हैं।
संसार-भर के पाँच में से एक व्यक्ति को जीवन में कभी डिप्रेशन से सामना करना पड़ेगा। इनमें से पच्चासी फ़ीसदी जो एक बार डिप्रेशन-ग्रस्त हुए , उनको यह दोबारा फिर झेलना पड़ेगा। संसार-भर के मनोचिकित्सक इस रोग से लड़ने में कॉग्निटिव थेरेपी और एंटीडिप्रेसेंट दवाओं का प्रयोग करते आ रहे हैं , लेकिन सफलता बहुधा एक तिहाई से अधिक नहीं मिलती। ऐसे में डिप्रेशन का सम्बन्ध आँतों में मिलना सचमुच अपनी ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है।
आँतों में नाना प्रकार के जीवाणु बसे हुए हैं , ये केवल खाना पचाकर मल बनाने वाली नलियाँ नहीं हैं। इन खोखली ट्यूबों का अपना सम्पूर्ण पर्यावरण है , जिसमें लाखों-लाख प्रजातियाँ आपसी सन्तुलन बनाये जीवनयापन कर रही हैं। उनके होने से खाना पचता है , वह मल में बदलता है , रोग रुकते हैं। अन्यथा मानव-जीवन इतना सरल-सहज-स्वास्थ्यकर कहाँ हो सकता था !
लेकिन हम वैसे नहीं रहे , जैसे प्रकृति के अन्य आँतधारी जीव रहते आये हैं। हमें प्रॉसेस्ड भोजन करना शुरू कर दिया , कीटनाशक-युक्त अनाज उगाने लगे। भोजन में प्रिज़रवेटिव डालने लगे , मामूली ज़ुकाम-खाँसी में भी एंटीबायटिक खाने लगे। सफ़ाई की तो लत पाल ली : घर अगर चमचमाये न , तो वह रहने लायक ही न समझा गया ! इन सब ग़लतियों से हमारी आँतें प्रभावित हुईं क्योंकि हमें इनमें रहने वाली बड़ी जीवाणु-जनसंख्या को मिटा डाला !
डिप्रेशन केवल मानसिक रोग नहीं है। इसके साथ प्रतिरक्षा-तन्त्र भी प्रभावित होता है , अंतःस्रावी तन्त्र भी। डिप्रेशन से पाचन और अवशोषण भी पहले जैसा नहीं रह जाता। समूचे शरीर में एक तनाव यानी स्ट्रेस का माहौल बना रहने लगता है। आँतों में बदली जीवाणु-जनसंख्या प्रतिरक्षा-तन्त्र में बदलाव लाती है और ऐसे रसायनों का शरीर में स्तर बढ़ जाता है , जो इन्फ्लेमेशन-कारी होते हैं। साथ ही यह भी बात सामने आ रही है कि डिप्रेशन के मरीज़ों में आँतें अधिक लीकी यानी छिद्रदार हो जाती हैं जिसके कारण उनसे अनेक हानिकारक रसायन बन-छनकर ख़ून और फिर मस्तिष्क में पहुँचने लगते हैं।
वे कौन-कौन से जीवाणु है जो डिप्रेशन-रोगियों में अधिक पाये जाते हैं ? क्या अवसाद के उपचार के लिए दही या प्रोबायटिक का सेवन कोई भूमिका निभा सकता है ? ढेरों शोध हुए हैं , ढेरों जारी हैं। अभी ऐसे कोई भी पुख़्ता अतिसरलीकृत नतीजे निकाल लेना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन यह तो तय ही है कि आँतें मस्तिष्क से सन्देश लेती भर नहीं , उन तक इशारे भेजती भी हैं। आन्त्र-मस्तिष्क का यह सम्बन्ध दोनों ओर से लेनदेन का है और इसे जितना हम समझते जाएँगे , उतना मानसिक रोगों और आँतों की बीमारियों, दोनों का बेहतर-से-बेहतर उपचार कर पाएँगे।
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