एनपीआरसी चौरा बागेश्वर: 'सपनों की उड़ान' कार्यक्रम में बच्चों ने भरी 'मेधा की उड़ान'

सपनों की उड़ान  कार्यक्रम 2024-2025 का आयोजन एनपीआरसी चौरा में किया गया. जिसमे प्राथमिक एवम उच्च प्राथमिक स्कूलों ने प्रतिभाग किया. इस कार्यक्रम के तहत सुलेख हिंदी, अंग्रेजी, सपनों के चित्र, पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, कविता पाठ,कुर्सी दौड़ इत्यादि का आयोजन संपन्न हुआ. सपनों के चित्र, सुलेख हिंदी  प्रतियोगिता में प्रथम स्थान जीवन कुमार ( राजकीय प्राथमिक विद्यालय तल्लाभैरू ) द्वारा प्राप्त किया गया. इसी विद्यालय की छात्रा दीक्षा ने सुलेख अंग्रेजी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. कुर्सी दौड़ में राजकीय प्राथमिक विद्यालय चौरा के छात्र रोहित ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. सपनों के चित्र प्रतियोगित में उच्च प्राथमिक स्तर पर भैरू चौबट्टा के छात्र करण नाथ ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. इसी विद्यालय की छात्रा पूजा  ने सुलेख हिंदी में प्रथम स्थान प्राप्त किया. इस कार्यक्रम में ममता नेगी, भास्करा नंद ,जयंती, कुलदीप सिंह , मुन्नी ओली, सोहित वर्मा , विनीता सोनी, सुनीता जोशी, अनिल कुमार, संगीता नेगी आदि शिक्षक शामिल हुए.

स्विटजरलैंड ने भारत सरकार को काला धनधारकों की जानकारी सौंपी

स्विटजरलैंड ने भारत सरकार को उन सब खातों की जानकारी सौंप दी है, जो भारतीयों ने उसके बैंकों में खोल रखे हैं। ऐसा नहीं है कि वे सभी खाते काले धन के होंगे या आतंकी धन या ठगी-धन के होंगे लेकिन विदेशों में खुलनेवाले भारतीय नागरिकों के खातों के जरिए अक्सर भारी हेरा-फेरी की जाती है। इस तरह के खाते स्विटजरलैंड के अलावा सिंगापुर, मोरीशस और करेबियाई क्षेत्र के छोटे-मोटे देशों में खोल दिए जाते हैं। भारत के लोग अपने कालेधन की रक्षा के लिए भारत की नागरिकता तक छोड़ देते हैं और ऐसे देशों की नागरिकता पैसे देकर खरीद लेते हैं, जिनकी हैसियत भारत के किसी जिले के बराबर भी नहीं है।
विदेशों में छिपाया धन सिर्फ वही नहीं होता, जो बाकायदा कमाया हुआ होता है बल्कि वह भी होता है, जो रिश्वत, ब्लेकमेल, आतंक, डकैती, चोरी आदि कुकर्मों से जमा किया जाता है। ऐसा धन जमा करनेवालों में कौन नहीं हैं ? उद्योगपति और व्यापारी तो हैं ही, हमारे नेता हैं, उनके नौकरशाह हैं, आतंकवादी हैं, डाॅक्टर हैं, वकील हैं। भारत सरकार ने 2016 में जबसे स्विस सरकार से इन लोगों के खातों की जानकारी के आदान-प्रदान का समझौता किया है, उन लोगों ने जिनीवा में अपने खाते बंद करने शुरु कर दिए हैं या वहां से अपना धन निकालकर कहीं और छिपाना शुरु कर दिया है।
उसका नतीजा यह हुआ है कि अब स्विस बैंकों में भारतीयों के खातों में सिर्फ 6757 करोड़ रु. की राशि रहने का अनुमान है। यह राशि तो ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं है। माना कि यह सारी की सारी राशि सरकार ने जब्त कर ली तो वह कौनसा किला फतह कर लेगी ? जो सरकार रिजर्व बैंक से पौने दो लाख करोड़ रु. उधार ले रही है, उसे ‘काले धन’ की यह राशि कितना टेका लगा सकेगी ? नोटबंदी के वक्त कितना काला धन पकड़ा गया? लोगों ने सरकार को पटकनी मार दी। तू डाल-डाल तो मैं पात-पात !
नोटबंदी के बाद काला धन बनने की रफ्तार तेज हुई है। दो हजार के नोटों और नकली नोटों ने नोटबंदी की कमर झुका दी है। बेहतर तो यह हो कि सरकार आयकर को ही खत्म कर दे और सिर्फ व्यय-कर लगाए। यदि खर्चे पर टैक्स लगेगा तो बचत बढ़ेगी और आय पर टैक्स नहीं लगेगा तो टैक्स-चोरी नहीं होगी। क्या भारत सरकार इतना क्रांतिकारी कदम उठा सकती है ? ऐसा कदम उठाने के पहले सरकार को अपने जी-हुजूर और विरोधी, दोनों अर्थशास्त्रियों से जमकर बात करनी चाहिए। यदि भारत सरकार ऐसी हिम्मत करेगी और उसे सफलता मिलेगी तो हमारे पड़ौसी देश भी खुशी-खुशी वैसा ही करना चाहेंगे।